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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०५ यथा हि बीजमनुपतप्तमृत्तं स्वा स्वां प्रकृतिमनुविधीयते व्रीहिर्वा व्रीहित्वं यवो वा यवत्वं तथा स्त्रीपुरुषावपि यथोक्तं हेतुविभागमनु- विधीयेते ॥ १६ ॥ इस प्रकार से बनते हुए गर्भ में कन्या या पुत्र की उत्पत्ति का कारण हमने प्रथम ही कह दिया है । [ रक्त की अधिकता से कन्या और शुक्र की अधिकता से पुत्र उत्पन्न होता है । ] जिस प्रकार निर्दोष अथवा दूषित बीज अपनी अपनी प्रकृति का अनुसरण करके धान्य से धान्य और जौ के बीजों से जौ को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार कन्या और पुत्र की उत्पत्ति मे भी स्त्री और पुरुष अपने २ कारणानुसार कार्य करते हैं ॥ १५-१६ ॥ तयोः कर्मणा वेदोक्तेन विवर्तनमुपदिश्यते प्राग्व्यक्तीभावात् प्रयु- ञ्जीत सम्यक् । कर्मणां हि देशकालसंपदुपैताना नियतमिष्टफलत्वं, तथेतरेषामितरत्वम् । तस्मादापन्नगर्भा स्त्रियमभिसमीक्ष्य प्राग्व्यक्ती- भावाद् गर्भस्य पुसवनमस्यै दद्यान्—गोष्ठे जातस्य न्यग्रोधस्य प्रागु- त्तराभ्या शाखाभ्यां शुङ्गे अनुपहते आदाय द्वाभ्या धान्यमाषाभ्यां सपदुपैताभ्या वा सह दधिन प्रक्षिप्य पुष्ये पिबेत्, तथैवापराज्जी वकर्षभकापामार्ग-सहचर-कल्काश्च युगपदेकैकशो यथेष्ट वाप्यु- पसस्कृत्य पयसा, कुड्यकीटकं मत्स्यकोद्र चोदकाञ्जलौ प्रक्षिप्य पुष्ये पिबेत्, तथा कनकभयान् राजतानायसांश्च पुरुषकानग्निवर्णानणुप्रमाणान् दध्रि पयस्युदकाञ्जलौ वा प्रक्षिप्य पिबेदनवशेषतः पुष्येण, पुष्येणैव च शा- लिपिष्टस्य पच्यमानस्योष्माणमुपाघ्राय तस्यैव च पिष्टस्योदकसंसृष्टस्य रस देहलीमपनिधाय दक्षिणे नासापुटे स्वयमासिञ्चेत्पिचुना । इति पुस- वनानि। यच्चान्यदपि ब्राह्मणा ब्रूयुराप्ता वा पुसवनमिष्ट तच्चानुष्ठेयम्॥१७॥ पुंसवन विधि—वेदोक्त कर्म के अनुसार ठीक प्रकार से कार्य अनुष्ठान करने या भेदक लक्षणो के उत्पन्न होने से पूर्व ही लिंगादि मे परिवर्त्तन करना सम्भव है । उत्तम गुणयुक्त देश, काल में किये कर्मों मे इष्ट फल अवश्य प्राप्त होता है । उत्तम देश काल के गुणों से रहित कर्मों मे इष्ट फल नहीं मिलता । इस लिये स्त्री में गर्भ रहने पर गर्भ के लक्षणों के स्पष्ट होने से पूर्व ही गर्भ में पुसवन करने का प्रयोग करना चाहिये । [गर्भ के लिंग विभेदकलक्षण दूसरे महीने मे स्पष्ट होते हैं । अतः दूसरे मास से पूर्व पुंसवन कर्म का प्रयोग करे ] (१) गौओं के बैठने के स्थान में लगे बड़ वृक्ष की उत्तर और पूर्व की दिशा की ओर लगी दो शाखाओं से दो शुंग (फुनगो) तोड़ कर उत्तम गुण वाले उड़द