चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context२७० चरकसंहिता । अ० २ ॰ वृष्योत्कारिका—मिसरी १०० पल, ताज़ा घी ५० पल, मधु २० पल, जल २५ पल इनको यथाविधि मिलावे। पहिले पानी और मिश्री से चास पका कर घी डाले, ठण्डा होने पर मधु मिलावे। इसमें गेहूँ का आटा २५ पल मिला कर मथे। अब इसको साफ़ चिकनी शिला पर फैला कर उत्कारिकायें बनावे। ये उत्कारिकायें चन्द्रमा के मण्डल के समान गोल हों। इनके प्रयोग से पुरुष हाथी के समान स्त्रियों को तृप्त करता है ॥ ३३-३५ ॥ यत्किञ्चिन्मधुरं स्निग्धं जीवनं बृंहणं गुरु। हर्षणं मनसश्चैव सर्वं तद्वृष्यमुच्यते ॥ ३६ ॥ द्रव्यैरेवंविधैस्तस्माद्भावितः प्रमदा व्रजेत्। आत्मवेगेन चोदीर्णः स्त्रीगुणैश्च प्रहर्षितः ॥ ३७ ॥ गत्वा स्नात्वा पयः पीत्वा रस चानुशयीत ना। यथाऽऽप्याय्यते भूयः शुक्रं च बलमेव च ॥ ३८ ॥ यथा मुकुलपुष्पस्य सुगन्धो नोपलभ्यते। लभ्यते तद्विकाशात्तु तथा शुक्रं हि देहिनाम् ॥ ३६ ॥ नर्ते वै षोडशाद्वर्षात्सप्तत्या परता न च। आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति ॥ ४० ॥ अतिबालो ह्यसम्पूर्णसर्वधातु स्त्रियो व्रजन्। उपनश्येत सहसा तडागमिव काजलम् ॥ ४१ ॥ शुष्कं रूक्षं यथा काष्ठ जन्तुजग्ध विजर्जरम्। स्पृष्टमाशु विशीर्येत तथा वृद्धः स्त्रियो व्रजन् ॥ ४२ ॥ वृष्य का लक्षण—जो कोई भी वृष्य मधुर, स्निग्ध, जीवनदायक, पौष्टिक, गुरु, मन में हर्ष उत्पन्न करता है, वह सब वृष्यगुण वाले हैं। अतः वृष्य द्रव्यों के सेवन से, अपने बल तथा कामवेग से प्रेरित, स्त्री के रूप, हाव, भाव आदि गुणों से आकर्षित होकर मैथुन करे। मैथुन के पीछे स्नान करके, दूध या मांसरस को पीकर सो जाने से ह्रास हुआ शुक्र और बल पुनः प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार कि फूल के डोडे में गन्ध का पता नहीं चलता, परन्तु फूल के खिलने पर गन्ध स्पष्ट हो जाती है, इसी प्रकार बाल्यावस्था में शुक्र प्रकट नहीं होता। परन्तु यौवनावस्था में शुक्र प्रकट हो जाता है१। जो पुरुष दीर्घ आयु
१ बारह वर्ष तक अष्ठीला ग्रन्थि तथा शिश्न के अन्दर की ग्रन्थियों का रस आता है जो कि देखने में प्रायः वीर्य से मिलता है। इसमें न तो शुक्राणु होते ह आर न वह सन्तानोत्पत्ति ही कर सकता है।