भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

पा० ४] चिकित्त्सितस्थानम् २६६ मधु १ आढक, इन सबको घी से भावित मिट्टी के पात्र में डालकर रखे । इसकी अग्नि-बल के अनुसार मात्रा प्रतिदिन प्रातःकाल खावे । यह योग अत्यन्त वृष्य बल्य एव बृहण है ॥ २७ ॥ शतावर्या विदार्याश्च तथा माषात्मगुप्तयोः । श्वदंष्ट्रायाश्च निष्क्वाथान् जलेषु च पृथक् पृथक् ॥ २८ ॥ साधयित्वा घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पुनः। शर्करामधुसंयुक्तमपत्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ २९ ॥ इत्यपत्यकरं घृतम्। अपत्यकर घृत—शतावरी, विदारीकन्द, कौंच, उड़द, गोखरू इनका पृथक् पृथक् क्वाथ बनावे । इन सब क्वाथों से एव आठ प्रस्थ ( परिभाषा के अनुसार द्विगुण १६ प्रस्थ) दूध के साथ एक प्रस्थ घी पकावे । इस घी को शर्करा और मधु के साथ मिला कर संतानाथीं पुरुष खावे ॥ २८-२९ ॥ घृतपात्रं शतगुणे विदारीस्वरसे पचेत् । सिद्धं पुनः शतगुणे गव्ये पयसि साधयेत् ॥ ३० ॥ शर्करायास्तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्येक्षुरसस्य च । पिप्पल्याः साजडायाश्च भागैः पादाशिकैर्युतम् ॥ ३१ ॥ गुडिकाः कारयेद्वैद्यो यथा स्थूलमुदुम्बरम् । तासा प्रयोगात्पुरुषः कुलिङ्ग इव हृष्यति ॥ ३२ ॥ इति वृष्यगुटिकाः। वृष्य गुटिका—गाय के ८ प्रस्थ घी को ८०० प्रस्थ विदारीकन्द के रस में सिद्ध करे । इस सिद्ध घी को ८०० प्रस्थ गाय के दूध में पकावे । इस प्रकार से सिद्ध घी में खाड, वंसलोचन, शहद, गन्ने का रस, पिप्पली, कौंच ये घी से चतु- र्थाश मिलावे । इसकी मोटे गूलर के समान गोलिया बना कर प्रयोग करे । इसके प्रयोग से पुरुष कुलिंग की भाति हर्षयुक्त होता है । [ यहा पर यदि प्रक्षेप द्रव्य प्रत्येक चतुर्थांश लिया जाये तो गोलिया आराम से बन जायेंगी । ] ॥३०-३२॥ सितोपलापलशतं तदर्धं नवसर्पिषः । क्षौद्रपादेन संयुक्त साध्येज्जलपादिकम् ॥ ३३ ॥ सान्द्र गोधूमचूर्णाना पाद् स्तीर्णे शिलातले । शुचौ श्लक्ष्णे समुत्कीर्य मर्दनेनापपादयेत् ॥ ३४ ॥ शुद्धा उत्कारिका कार्याश्चन्द्रमण्डलसन्निभाः । तासां प्रयोगाद् गजबन्नारीः संतर्पयेन्नरः ॥ ३५ ॥ इति वृष्योत्कारिका।