चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६८ चरकसंहिता [ अ० २ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~
माहिषे च रसे मत्स्यान् स्निग्धाम्ललवणान् पचेत् । रसे चानुगते मांसं पोथयेत्तत्र चावपेत् ॥ २० ॥ मरिचं जीरकं धान्यमल्पं हिङ्गु नवं घृतम् । माषपूपलिकानां तद् गर्भार्थमुपकल्पयेत् ॥ २१ ॥ एतौ पूपलिकायोगौ बृंहणौ बलवर्धनौ । हर्षसौभाग्यजननौ परं शुक्राभिवर्धनौ ॥ २२ ॥ इति वृष्यौ पूपलिकायोगौ । मछलियों के मास को घी, अनार का रस और सैन्धानमक के साथ भैंस के मास रस में पकाना चाहिये। जब मास रस शुष्क हो जाये तब मास को कूट कर इसमें मरिच, जीरा, धनिया, थोड़ा सा हींग और ताज़ा घी मिलाना चाहिये । अब उड़द के आटे में इसको पिठ्ठी के रूप में भरकर घी में तल लेवे। ये दोनो प्रकार की पूपलिकायें बृंहण (पुष्टिदायक) बलवर्द्धक, प्रहर्ष और सौभाग्य को उत्पन्न करनेवाली तथा शुक्रवर्द्धक हैं ॥ २०-२२ ॥ माषात्मगुप्तागोधूमशालिषष्टिकपौष्टिकम् । शर्कराया विदार्याश्च चूर्णमिक्षुरकस्य च ॥ २३ ॥ संयोज्य मसृणे क्षीरे घृते पूपलिकाः पचेत् । पयोऽनुपानास्ताः शीघ्रं कुर्वन्ति वृषतां परम् ॥ २४ ॥ इति वृष्या माषादिपूपलिकाः । माषादि पूपलिका-उड़द, कौंच, गेहूँ, शाली चावल, साठी चावल, इन सब का आटा, शर्करा, विदारीकन्द का चूर्ण, तालमखाने का चूर्ण, इनको दूध के साथ गूधकर घी में तल लेवे। इनको खाकर ऊपर से दूध पीले। ये अत्यन्त शुक्रवर्धक हैं ॥ २३-२४ ॥ शर्करायास्तुलाका स्यादेका गव्यस्य सर्पिषः । प्रस्थो विदार्याश्चूर्णस्य पिप्पल्याः प्रस्थ एव च ॥ २५ ॥ अर्घाढकं तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्याभिनवस्य च । तत्सर्वं मूच्छितं तिष्ठेन्मृत्तिके घृतभाजने ॥ २६ ॥ मात्रामग्निसमां तस्य प्रातः प्रातः प्रयोजयेत् । एष वृष्य. परं योगो बल्यो बृंहण एव च ॥ २७ ॥ इति वृष्ययोगः । वृष्य योग-खाण्ड १ तुला (१०० पल), गाय का घी १ तुला, विदारी- कन्द का चूर्ण १ प्रस्थ, पिप्पली एक प्रस्थ, वंशलोचन आधा आढक, ताजा