चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 281, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंपा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २६७ प्रचुर घी, इलायची, केशर, कर्पूर आदि का गन्ध, दही और अनार रस मिला कर इस प्रकार से पकावे जिसमे कि गुटिकायें टूटे नही । इन गुटिकाओं को खाने से तथा मास रस को पीने से शुक्र की वृद्धि होती है। इसी प्रकार से अन्य मेध्य (मेदुर या भक्ष्य) मासों को, गुटिकाओं को मास रस में विद्ध करके प्रयोग करने से वीर्य की वृद्धि होती है ॥११-१४॥ माषानङ्कुरिताञ्छुद्धांन्निस्तुषान् साञ्जडाफलान् । घृताढ्ये माहिषरसे दधिदाडिमसारिके ॥ १५ ॥ प्रक्षिपेन्मात्रया युक्तान् धान्यजीरकनागरैः । भुक्त पीतश्च स रसः कुरुते शुक्रमक्षयम् ॥ १६ ॥ इति वृष्यो माहिषरसः । माहिष रस-उड़दों को जड़ाकर अंकुरित कर ले। इनको धोकर छिलके उतार दे। इसी प्रकार से कौंच के फलों का भी छिलका उतार दे। इनको प्रचुर घी, भैंसे का मांस रस, दही और अनार के रस के साथ पकावे । पकते समय इसमें परिमाण से धनिया, जीरा और सोंठ मिला दे। इनको खाने तथा पीने से शुक्र अत्यन्त बढ़ता है ॥ १६ ॥ आर्द्राणि मत्स्यमांसानि भृष्टांश्च शफरींश्च वा । तप्ते सर्पिषि यः खादेत्स गच्छेत्स्त्रीषु न क्षयम् ॥ १७ ॥ इति वृष्यघृतभृष्टमत्स्यमांसानि । मछलियों (खासकर रोहित) का ताज़ा मास और शफरी मछली को घी में भून कर खाने से संभोग के समय शुक्र क्षरित नहीं होता ॥१७॥ घृतभृष्टान् रसे छागे रोहितान् फलसारिके । अनुपीतरसान् सिद्धानपत्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ १८ ॥ इति गर्भाधानकरा योगः । सन्तान को चाहने वाले व्यक्ति रोहित (रोहू) मछली को घी में भूनकर बकरे के मास रस में डालकर अनार के रस के साथ पकाकर इनको खाये तथा मास रस पीये ॥ १८ ॥ कुट्टकं मत्स्यमांसानां हिङ्गुसैन्धवधान्यकैः । युक्तं गोधूमचूर्णेन घृते पूपलिकाः पचेत् ॥ १६ ॥ पूपलिका योग-मछलियों के मास को कूटकर इसमें हींग, सैन्धानमक, धनिया मिलाकर गेहूँ के आटे में सान घी मे पूपलिकायें (कचौरिया) पकावे । अथवा गेहूँ के आटे में मछलियों के मास का कीमा भरकर कचौरी की तरह पकावे ॥ १६ ॥