चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६६ चरकसंहिता [ अ० २ पूर्वं शुद्धशरीराणां¹ निरूहान् सानुवासनान्। बलापेक्षां प्रयुञ्जीत शुक्रापत्यविवर्धनान् ॥ ९ ॥ घृततैलरसक्षीरशर्करामधुसंयुताः । बस्तयः संविधातव्याः क्षीरमांसरसाशिनाम् ॥ १० ॥ इति वृष्या बस्तयः । इसके लिये सब से प्रथम शुद्ध और स्वस्थ पुरुष को बल के अनुसार शुक्र और सन्तानवर्धक निरूह तथा अनुवासनबस्ति देनी चाहिये । दूध और मास रस का आहार करनेवाले व्यक्ति के लिये घी, तैल, मास रस, दूध, शर्करा और शहद इनसे युक्त बस्तिया दोषानुसार देनी चाहियें । [ अष्टाग-संग्रह मे विस्तार से बस्तिया दी हैं। चरक में सिद्धिकल्प में बस्तियों का वर्णन है] ॥९-१०॥ पिष्ट्वा वराहमांसानि दत्त्वा मरिचसैन्धवे । कोलवद् गुडिकाः कृत्वा तप्ते सर्पिषि भर्जयेत्² ॥ ११ ॥ ³भर्जेन स्तम्भितातस्ताश्च प्रक्षेप्याः कौक्कुटे रसे । घृताढ्ये गन्धपिशुने दधिदाडिमसाधिते ॥ १२ ॥ यथा न भिन्द्याद् गुडिकास्तथा तं साधयेद्रसम् । तं पिबन् भक्षयंस्ताश्च लभते शुक्रमक्षयम् ॥ १३ ॥ मासानामेवमन्येषां मेध्यानां कारयेद्भिषक् । गुडिकाः सरसास्तासा प्रयोगः शुक्रवर्धनः ॥ १४ ॥ इति वृष्या मांसगुडिकाः । मांसगुडिका—सुअर के मास को पीस कर इसमें मरिच और सैन्धा नमक मिला कर बेर के समान गोलिया बना लेवे । इनको गरम घी में भून ले । भूनने पर जब कठोर हो जायें तब इनको मुर्गे के मास रस मे डुबो दे । इसमे दूसरे का क्रिया के साथ ह । परन्तु एक केन्द्र के उत्तेजित होने पर दूसरा केन्द्र स्वय उत्तेजित हो जाता है। इसलिये शुक्र क्षरण में वीर्य की मात्रा एक ही व्यक्ति में समय भेद से भिन्न २ होती है। वैसे तो सब मनुष्यों में मात्रा भेद रहता है। कोई २४ रत्ती, कोई ६० बूंद, कोई १० से १५ ग्राम मानता है। देखने में बलवान् पुरुष नपुसक न हो, यह कोई नियम नहीं है। कुश्ती, बैठक, दण्ड खास कर बचपन से करने वाले व्यक्ति प्रायः नपुसक होते हैं। स्त्रीसहवास में विशेष रूप से वे जल्दी क्षरित हो जाते हैं । १ 'पूर्व सुस्थशरीराणा' इति च पाठः । २ 'वर्त्तयेत्' इति च पाठ । ३ 'वर्त्तन' इति च पाठः ।