भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २६५ इसके आगे 'पुमान्-जात-बलादिक' नामक चतुर्थ वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥१-२॥ पुमान् यथा जातबलो यावदिच्छं स्त्रियो व्रजेत् । यथा चापत्यवान् सद्यो भवेत्तदुपदेक्ष्यते ॥ ३ ॥ न हि जातबलाः सर्वे नराश्चापत्यभागिनः । बृहच्छरीरा बलिनः सन्ति नारीषु दुर्बलाः ॥ ४ ॥ सन्ति चाल्पबलाः स्त्रीषु बलवन्तो बहुप्रजाः । प्रकृत्या चाबलाः सन्ति सन्ति चामयदुर्बलाः ॥ ५ ॥ नराश्चटकवत्केचिद् व्रजन्ति बहुशः स्त्रियम् । गजवच्च प्रसिञ्चन्ति केचिच्च बहुगामिन ॥ ६ ॥ कालयोगबलाः केचित्केचिदभ्यसनध्रुवाः । केचित्प्रयत्नैर्वाह्यन्ते वृषाः केचित्स्वभावतः ॥ ७ ॥ तस्मात्प्रयोगान्वक्ष्यामो दुर्बलानां बलप्रदान् । सुखोपभोगान् बलिना भूयश्च बलवर्धनान् ॥ ८ ॥ पुरुष जिस प्रकार से यथेष्ट स्त्रियों मे रमण कर सकता है और जिस प्रकार से सन्तानवान् हो सकता है, उसका विस्तार से वर्णन करते हैं—संसार में यह आवश्यक नहीं कि जितने भी बलवान् व्यक्ति हैं, वे सब सन्तान वाले हों । ऐसे भी बहुत से पुरुष हैं जो बलवान् और पूरे डीलडौल के हैं, परन्तु स्त्रियों के विषय में कमजोर होते हैं। दूसरे पुरुष शरीर रचना में निर्बल हैं, परन्तु स्त्रियों में बलवान् हैं। इनमें कुछ तो प्रकृति से ही निर्बल होते हैं और कुछ रोग आदि से कमजोर हो जाते हैं। कई व्यक्ति तो चिड़ों के समान बहुत बार (लगातार जल्दी जल्दी) स्त्रियों से मैथुन करते हैं और कई व्यक्ति गज के तुल्य कभी कभी मैथुन करते हैं, वे बहुत बार मैथुन नही करते । जब कभी सहवास करते हैं तो हाथी के समान वे बड़ी मात्रा मे, अधिक शुक्र बहाते हैं। कई व्यक्ति विशेष समय में ही बलवान् होते हैं, और कई बार बार अभ्यास (मैथुन करने) से समर्थ हो जाते है। कई व्यक्ति चुम्बन, आलिंगन आदि प्रयत्नों से बल प्राप्त करते हैं और कई स्वभाव से ही बलशाली, वीर्यसेचन में समर्थ होते हैं१ । इसलिये दुर्बलों के लिये बलप्रद और बली पुरुषों के बल को बढानेवाले ओर उपभोग मे सुखकर वृष्य प्रयोगोका वर्णन करते हैं । १ शुक्र के प्रवाह को नियमित करनेवाले दो केन्द्र हैं। एक मस्तिष्क मे और दूसरा मेरुदण्ड में । प्रथम केन्द्र का सम्बन्ध प्रायः विचारों के साथ और