चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context३४४ चरकसंहिता [ अ०४ द्राक्षारसस्येक्षुरसस्य नस्य क्षीरस्य दूर्वास्वरसस्य चैव । यवासमूलानि पलाण्डुमूलं नस्यं तथा दाडिमपुष्पतोयम् ॥१००॥ प्रियालतैल मधुकं पयश्च सिद्ध घृतं माहिषमाजकं वा । आम्रास्थि पूर्णैः पयसा च नस्य ससारिदैः स्यात्कमलोत्पलैश्च ॥१०१॥ निम्न वस्तुओ का नस्य देवे—( १ ) अगूर का रस, गन्ने का रस, दूध, दूब का स्वरस, जवासे की जड का स्वरस, प्याज का रस और अनार के फूल के रस को नंस्य के लिये देवे । ( २ ) पियाल के तैल को मलहठी के कल्क और दूध के साथ सिद्ध करके उसका नस्य देवे । ( ३ ) अथवा पियाल के तैल या मुलहठी को दूध के साथ पीस कर उसका नस्य देवे । ( ४ ) भैस या बकरी के घी को आम की गुटली के साथ, लाजवन्ती और धाय के फूल के साथ, मोच- रस और लोध के साथ, अगूर के रस, गन्ने के रस, दूब, दूब का स्वरस, जबसे की जड़का रस, प्याज का रस या अनार के फूल के रस के साथ सिद्ध करके देवे । ( ५ ) अथवा भैस या बकरी के घी को अनन्तमूल, कमल और नीलो- त्पल के फूलो के कल्क से पका कर नस्य देवे । पकाने मे सब द्रव्य घृत के समान, कल्क घी से चतुर्थांश लेवे ॥ १००-१०१ ॥ भद्रश्रियं लोहितचन्दनं च प्रपोण्डरीकं कमलोत्पले च । उशीरवानीरजलं मृणालं सहस्रवीर्या मधुक पयस्या ॥ १०२ ॥ शालीक्षमूलानि यवासगुन्द्रामूल नलाना कुशकाशयोश्च । कुचन्दनं शैवलमप्यनन्ता कालानुसार्या तृणमूलमृद्धिः ॥ १०३ ॥ मूलानि पुष्पाणि च वारिजाना प्रलेपनं पुष्करिणीमृदश्च । उदुम्बराश्वत्थमधूकलोध्राः कषायवृक्षाः शिशिराश्च सर्वे ॥१०४॥ प्रदेहकल्पे परिषेचने च तथाऽवगाहे घृततैलसिद्धौ । रक्तस्य पित्तस्य च शान्तिमिच्छन् भद्रश्रियादीनि भिषक्प्रयुञ्ज्यात् ॥१०५॥ भद्रश्रिया ( श्वेत चन्दन ), लाल चन्दन, पोण्डरीक, श्वेत कमल, नीला कमल, खस, बानीर ( जलवेतस ), जल ( गन्धवाला ), मृणाल ( कमल नाल ) सहस्रवीर्या (दूर्वा ), मुलहठी, क्षीरकाकोळी, शालि मूल, गन्ने की जड, जवासे की जड, गुन्द्रा ( तृणविशेष ) की जड़, नड़ सर, कुश, कास की जड़े, कुचन्दन ( लाल चन्दन ), सरवाल, सारिवा, कालानुसारी ( तगर ), गन्धतृण की जड़, ऋद्धि, कमलों की जड और पुष्प, और पोखर ( तालाब ) की मिट्टी का लेप, गूलर, पीपल, महुआ, लोध तथा कषाय रस वाले और शीतक वृक्ष ये सब रक्तपित्त की शान्ति के लिये प्रदेह, परिषेचन, अवगाहन, घी, तैल पाक मे प्रयोग करने चाहिये । इनसे घी आदि सिद्ध करके रक्तपित्त मे बरते ॥१०५॥