चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
Page 359 of 616
Read in contextअ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४५ धारागृह भूमिगृहं च शीत वनं च रम्यं जलवातशीतम् । वैदूर्यमुक्तामणिभाजनाना स्पर्शाश्च दाहे शिशिराम्बुशीताः ॥१०६॥ दाह की शान्ति के लिये—धारागृह (फव्वार वाले घर), भूमिगृह (तहखाने), जल और वायु से शीतल सुन्दर वन, लहसुनिया, मोती, मणि आदि से बने तथा शीतल पानी से ठण्डे किये बर्तनों का स्पर्श करना चाहिये इन पात्रा मे बर्फ का पानी या चन्दनोदक भर कर स्पर्श करे ॥ १०६ ॥ पत्राणि पुष्पाणि च वारिजाना क्षौम च शीत कदलीदलं च । प्रच्छादनार्थं शयनासनाना पद्मोत्पलाना च दलाः प्रशस्ताः ॥१०७॥ बिस्तर और आसन पर बिछाने के लिये जल म उत्पन्न कमल आदि के पत्ते या फूल, शीतल क्षौम वस्त्र, केले के पत्ते, कमल या नीले कमल के पत्ते बिछा कर उन पर सोवे ॥ १०७ ॥ प्रियङ्गुकाचन्दनरूपिताना स्पर्शा. प्रियाण च वराङ्गनानाम् । दाहे प्रशस्ताः सजलाः सुशीताः पद्मोत्पलाना च कलापवाताः ॥१०८॥ दाह मे प्रियगु, श्वेतचन्दन मे लिप्त अगो वाली प्रिय वारागनाओ (स्त्रियों) का स्पर्श, कमल, नीले कमल का स्पर्श अथवा इनका और मोर के पखो से बने पखों को शीतल पानी से भिगो कर हिलाना उत्तम है ॥ १०८ ॥ सरिद्ध्रदाना हिमवद्गरीणा चन्द्रोद्याना कमलाकराणाम् । मनोऽनुकूलाः शिशिराश्च सर्वाः कथाः सरक्त शमयन्ति पित्तम् ॥१०६॥ नदिया, तालाव, पर्वता की गुफाये, चन्द्रमा की किरणे, तालाबो का सेवन, मन के अनुकूल शान्ति देने वाली सब कथाये रक्तपित्त को शान्त करती है॥१०६॥ तत्र श्लोकौ—हेतुं वृद्धि संज्ञा स्थानं लिङ्ग पृथक् प्रदुष्टस्य । मार्गौ साध्यमसाध्य याप्यं कार्यक्रम चैव ॥ ११० ॥ पानान्नमिष्टमेव च वर्ज्यं संशोधनं च शमनं च । गुरुरुक्तवान् यथावच्चिकित्सिते रक्तपित्तस्य ॥ १११ ॥ रक्तपित्त रोग के कारण, वृद्धि, सज्ञा, स्थान, लक्षण (पृथक् पृथक् ), दानो मार्ग, साध्यता असाव्यता, याप्य, चिकित्सा क्रम, हितकर खान-पान, त्याज्य पदार्थ, सशाधन, सशमन ये सब भगवान् आत्रेय ने इस रक्तपित्त चिकित्सा मे कह दिये है ॥ ११०-१११ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने रक्तपित्तचिकित्सित नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥