चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ८ ] चिकित्तिसस्थानम् ४२१ पोषण करता है, रस से रक्त का और रक्त से मास का पोषण होता है। स्रोतों के रुक जाने से, रक्त आदि धातुओं के क्षीण होने से और धातुओ की उष्णिमा के घट जाने से राजयक्ष्मा रोग उत्पन्न हो जाता है। इस अवस्था मे कोष्ठाग्नि आमाशय मे जिस अन्न का परिपाक करती है, उसका अधिक भाग मल बन जाता है। कुछ थोडा सा भाग ही ओज मे परिणत होता है। इसलिये राज- यक्ष्मा के रोगी मे मल की रक्षा करनी चाहिये। क्योकि मल के सिवाय अन्य सब धातु इसमे क्षीण हो जाते है अतः यक्ष्मा रोगी का बल ( शक्ति ) मल ही है¹ । अतः रोगी को अतिसार से बचाना चाहिये। स्रोतो के रुक जाने पर अपने स्थान मे ही रस का सचय अर्थात् वृद्धि होने लगती है, यह रस खासी के वेग के कारण ( आमाशय से ) ऊपर की ओर मुख नाक से अनेक रूपो मे प्रवृत्त होता है। इसके पश्चात् छ. या ग्यारह रोग ( लक्षण यक्ष्मा के ) हो जाते है, जिनके एकत्र समूह को राजयक्ष्मा के नाम से कहते है ॥ ४०-४४ ॥ यक्ष्मा के लक्षण— कासोऽसतापो वैस्वर्य ज्वरः पार्श्वशिरोरुजौ । शोणितश्लेष्मणोश्छर्दिः श्वासः कोष्ठामयोऽरुचिः ॥ ४५ ॥ रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मणः षडिमानि वा । यक्ष्मा के ग्यारह रूप—कास, कन्धो मे ताप, ( पीडा ) स्वरभेद, ज्वर, पार्श्वशूल, शिरोवेदना, रक्तवमन, कफ का आना, श्वास, कोष्ठामय (अतिसार), अरुचि, ये यक्ष्मा के ग्यारह रूप है ॥ ४५-॥ कासो ज्वरः पार्श्वशूल स्वरवचोंगदोऽरुचिः ॥ ४६ ॥ छः रूप—कास, ज्वर, पार्श्वशूल, स्वरभेद, मलभेद और अरुचि ॥ ४६ ॥ सर्वैरधैस्त्रिभिर्वाऽपि लिङ्गैर्मासबलक्षये । युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा ॥ ४७ ॥ १ आहार रस के जीर्ण होते समय पाचकाग्नि से प्रसाद और मल दो भाग बनते है। प्रसाद भाग भी स्थूल और सूक्ष्म दो भागो मे बट जाता है। सूक्ष्म भाग उसी धातु का पोषण करता है, और स्थूल भाग आगे पहुच जाता है, वहा पर अग्रिम धातु की गरमी से तीन भाग बनते है। इस प्रकार होते समय मज्जा से दो ही भाग बनते है, उसमे मलभाग नही होता। यक्ष्मा के रोगी मे मल भाग अधिक बनता है, प्रसाद भाग कम बनता है। ऐसा यत्न करना चाहिये कि शरीर इस मल मे से भी अधिक से अधिक प्रसाद-अश को ले सके, अतः मल की रक्षा करने को कहा है।