चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context४२२ चरकसंहिता [ अ० ८
बल और मास के क्षीण होने पर इन ग्यारह या छः अथवा तीन (ज्वर, कास, रक्तवमन) लक्षणों से युक्त यदि रोगी हो तो उसको असाध्य समझे। परन्तु यदि रोगी का बल और मास क्षीण न हुआ हो और उसको ग्यारह लक्षण भी हो तो भी उसको साध्य समझे ॥ ४७ ॥ घ्राणमूले स्थितः श्लेष्मा रुधिरं पित्तमेव वा । मारुताध्मातशिरसो मारुतः श्यायते प्रति ॥ ४८ ॥ प्रतिश्यायस्ततो घोरो जायते देहकर्षणः । तस्य रूपं शिरःशूलं गौरवं घ्राणविप्लवः ॥ ४९ ॥ ज्वरः कासः कफोत्क्लेशः स्वरभेदोऽरुचिः क्लमः । इन्द्रियाणामसामर्थ्यं यक्ष्मा चातः प्रवर्त्तते ॥ ५० ॥ पिच्छिलं बहलं विस्रं हरितं श्वेतपीतकम् । कासमानो रसं यक्ष्मी निष्ठीवति कफानुगम् ॥ ५१ ॥ (१) वायु से पूर्ण शिर वाले रोगी के नासिका-मूल मे स्थित कफ, रक्त या पित्त जिस समय वायु के प्रति गमन करते है, तब शरीर को कम करने वाला भयानक प्रतिश्याय (जुकाम) उत्पन्न होता है। शिरमे दर्द, भारीपन, नासिका से स्राव बहना, ज्वर, कास, कफ का उत्क्लेश, स्वरभेद, अरुचि, क्लम, इन्द्रियो का अपने विषय मे प्रवृत्त न होना, ये प्रतिश्याय के पूर्वरूप है। पीछे से प्रति- श्याय यक्ष्मा मे बदल जाता है। यक्ष्मा रोगी खाँसते समय कफ से मिश्रित चिकना, घना, दुर्गन्धयुक्त, हरा, श्वेत, पीला रस (थूक) थूकता है ॥४८-५१॥ अंसपार्श्वाभितापश्च तापः पादकरस्य च । ज्वरः सर्वाङ्गगश्चेति लक्षणं राजयक्ष्मणः ॥ ५२ ॥ राजयक्ष्मा का लक्षण—अंस और पाश्र्वो का अभिताप (पीडा), हाथ और पैरो मे दाह, जलन, सर्वशरीरगत ज्वर यह राजयक्ष्मा के लक्षण है ॥५२॥ वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात्कासवेगात्सपीनसात् । स्वरभेदो भवेद्वाताद्रूक्षः क्षामश्चलः स्वरः ॥ ५३ ॥ तालुकण्ठपरीदाहः १ पित्ताद्वक्तुमसूयते । कफान्मन्दी विबद्धश्च स्वरः खुरखुरायते ॥ ५४ ॥ सन्नो रक्तविबन्धत्वात्स्वरः कृच्छ्रात्प्रवर्त्तते । कासातिवेगात्करुणः पीनसात्कफवातिकः ॥ ५५ ॥ (२) स्वरभेद—वायु से, पित्त से, कास से, पीनस से, स्वरभेद होता है।
१ 'परिक्षोषः' इति च ।