चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२३ इनमें वात से उत्पन्न स्वरभेद मे— स्वर रूक्ष, निर्बल और कम्पित होता है, पित्त के कारण—तालु और कण्ठ मे दाह होता है, रोगी बोलना पसन्द नहीं करता, उसे बोलने मे कष्ट होता है । कफ के कारण—स्वर मन्द ( धीमा ), बधा ( रुका ) हुआ, खुरखुर करता है, रक्त से उत्पन्न मे—रक्त का विबन्ध होने से स्वर बैठा हुआ और बहुत कष्ट से प्रवृत्त होता है, खाँसी के अतिवेग के कारण स्वरभेद मे स्वरयन्त्र खराब हो जाता है, पीनस (प्रतिश्याय) से उत्पन्न स्वरभेद के लक्षण कफजन्य, वातजन्य प्रतिश्याय के समान होते है ॥५३-५५॥ पार्श्वशूलं त्वनियतं संकोचायामलक्षणम् । ( ३ ) पार्श्वशूल—सकोच तथा विस्तार निश्चित नही है, यह लक्षण (पार्श्व- शूल ) भी अवश्यम्भावी नही है, पार्श्वशूल कभी सक्रोच मे होता है, और कभी आयाम अवस्था मे होता है । पार्श्वशूल—यक्ष्मा मे कभी ता फेफड़ो के सकुचित अवस्था मे होता है, और कभी फेफडो के फूलने की अवस्था मे होता है, निमो- निया की तरह एक अवस्था मे निश्चित नही रहता । शिरःशूलं ससंतापं यक्ष्मणः स्यात्सगौरवम् ॥ ५६ ॥ ( ४ ) यक्ष्मा के रोगी को शिर मे शूल, सन्ताप ( दाह ) और भारीपन प्रतीत होता है ॥ ५६ ॥ अतिखिन्ने शरीरे तु यक्ष्मिणो विषमाशनात् । कण्ठात्प्रवर्तते रक्त श्लेष्मा चोत्क्लिष्टसंचितः ॥ ५७ ॥ रक्तं विबद्धमार्गत्वान्मासादीन्नानुपद्यते । आमाशयस्थमुत्क्लिष्टं बहुत्वात्कण्ठमेति वा ॥ ५८ ॥ ( ५ ) शरीर के आते शिथिल या दुर्बल होने के कारण, विषम भोजन करने पर, रागी के कण्ठ द्वारा उत्क्लेश से सञ्चित रक्त और कफ की प्रवृत्ति होती है । मार्गों के रुके होने से रक्त मास आदि धातुओ मे वह पहुँचता ( वह फुस्फुसो मे सञ्चित हो जाता ) है, अथवा आमाशय मे सञ्चित होने (बढ़ने) पर उत्क्लेश के कारण कण्ठ की ओर आ जाता है। रक्त का वमन होता है ॥५७-५८॥ वातश्लेष्मविबन्धत्वादुरसः श्वासमृच्छति । दोषैरुपहते चाग्नौ सपिच्छमतिसार्यते ॥ ५६ ॥ ( ६ ) छाती के वायु और कफ से भरे हाने पर श्वास (श्वास मे कठिनता) रोग उत्पन्न होता है । वातादि दोषों द्वारा अग्नि के मन्द हो जाने से पिच्छा- युक्त अतिसार होता है ॥ ५६ ॥ पृथग्दोषैः समस्तैर्वा जिह्वाहृदयसंश्रितैः । जायतेऽरुचिराहारैस्तुष्टेरर्थैश्च मानसैः ॥ ६० ॥