BharatKosha
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 450 of 616

Read in context
Page 450

४६६ चरकसंहिता [ अ० १० अपस्मारे तथोन्मादे श्वयथावुदरेषु च । गुल्मार्शःपाण्डुरोगेषु कामलासु भगन्दरे । अलक्ष्मीग्रहरोगघ्नं चातुर्थिकविनाशनम् ॥ २३ ॥ इति महापञ्चगव्यं घृतम् ॥ (२) महापञ्चगव्य घृत—क्षुद्र और लघु दोनो पञ्चमूल (दशमूल), त्रिफला (हरड़, बहेडा, आंवला), हल्दी, दारुहल्दी, कडे की छाल, सतवन की छाल, चिरचिटा, नील, कुटकी, अमलतास, काकोडुम्बरिका (छठ गूलर) की जड, पोहकरमूल, दुरालभा प्रत्येक वस्तु दो पल, पानी एक द्रोण इनका क्वाथ- विधि से क्वाथ करे। जब चतुर्थांश रह जाये तब छान ले। इसमे भार्गी, पाठा, त्रिकटु (सोठ, मरिच, पिप्पली), निशोथ, निचुल (जलवेतस या समुद्रफल) के फल, श्रेयसी (गर्जपिप्पली), आढकी (तुवर), मूवा, दन्तीमूल, चिरायता, चीता, श्वेत सारिवा और कृष्ण सारिवा, रोहिष तृण, भूतीक (अजवायन), मदयन्तिका (नवमल्लिका) ये द्रव्य प्रत्येक एक कर्ष ले, इनको बारीक पीस कर क्वाथ मे डाले। गाय का घी एक प्रस्थ और घी के बराबर गोबर का रस और गौ के ही दही, दूध और मूत्र लेकर घृत सिद्ध करे। इस घृत का नाम 'महापञ्चगव्य' घृत है। यह घृत अपस्मार, उन्माद ज्वर, कास, शोथ, उदररोग, गुल्म, अर्श, पाण्डु, कामला और हलीमक रोगो मे अमृत के समान है, यह घृत अलक्ष्मी (दुभगता), ग्रह रोगों और चातुर्थिक-ज्वर का विनाश करता है १८-२३ ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशङ्खपुष्पीभिरेव च । पुराणं घृतमुन्मादालक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ॥ २४ ॥ (३) ब्राह्मी घृत—ब्राह्मी का स्वरस, वच, कूठ और शखपुष्पी इन से पुरातन गो-घृत सिद्ध करे। यह घृत उन्माद, अलक्ष्मी, अपस्मार और पाप को नष्ट करता है ॥ २४ ॥ घृतं सैन्धवहिङ्गुभ्या वर्षे बास्ते चतुर्गुणे । मूत्रे सिद्धमपस्मारहृद्रोगमहामयानाशनम् ॥ २५ ॥ (४) बैल और बकरे का मूत्र चार भाग, सैन्धव और हींग का कल्क एक भाग, इनसे सिद्ध किया घृत अपस्मार, हृदय रोग, ग्रह रोगो को नष्ट करता है। [यहा पर गौ और बकरी स्त्री जाति का मूत्र न लेकर नर बैल और बकरे का ही मूत्र लेना चाहिये' ] ॥ २५ ॥ १ यद्यपि चतुष्पाद मे स्त्रीलिंग ही प्रशस्त है, तथापि यहा पर पुल्लिंग ही लेना चाहिये। कहा भी है—स्त्रीणा गुरु च तीक्ष्ण च न तु पुंसा तथाविधम् । पित्ताशिका. स्त्रियो यस्मात् सौम्यास्तु पुरुषाः स्मृताः ॥