चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६७ वचासम्पाककैटर्यवयःस्थाहिङ्गुचोरकैः । सिद्धं पलङ्कषायुक्तैर्वातश्लेष्मात्मके घृतम् ॥ २६ ॥ (५) वचा, सम्पाक (अमलतास), कैटर्य (कट्फल), वयःस्था (आवला या गिलोय), हींग, चोरक (चोरपुष्पी सुगन्धित द्रव्य), पलंकषा (गुग्गुलु), इनके कल्क से, चार गुणे पानी मे सिद्ध घृत वातिक, श्लैष्मिक अथवा गुल्म के समान वात, कफ दोनो से उत्पन्न अपस्मार मे हितकारी है ॥२६॥ तैलप्रस्थं घृतप्रस्थं जीवनीयैः पलोन्मितैः । क्षीरद्रोणे पचेत्सिद्धमपस्मारविनाशनम् ॥ २७ ॥ (६) तिल का तैल एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, जीवनीय गण की दस औषधियो मे से प्रत्येक एक-एक पल लेकर इनका कल्क, दूध एक द्रोण, इनमे घृत सिद्ध करे, यह घृत अपस्मार का नाशक है ॥ २७ ॥ कंसे क्षीरेक्षुरसयोः काश्मर्येऽष्टगुणे रसे । कार्षिकैर्जीवनीयैश्च घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २८ ॥ वातपित्तोद्भवं क्षिप्रमपस्मारं नियच्छति । (७) दूध एक आढक, गन्ने का रस एक आढक, काश्मरी (गम्भारी) का क्वाथ घी से आठ गुणा, जीवनीय आदि ओषधिया प्रत्येक एक कर्ष, इनके कल्क से एक प्रस्थ गो घृत सिद्ध करे । यह घृत वातजन्य और पित्तजन्य (अथवा वात-पित्तजन्य) अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ २८-॥ तद्वत्काशविदारीक्षुकुशक्वाथशृतं घृतम् ॥ २९ ॥ (८) इसी प्रकार से कास (सरकण्डा), विदारीकन्द, गन्ना, कुश, इनके क्वाथ मे सिद्ध घृत वातजन्य, पित्तजन्य अपस्मार को नष्ट करता है ॥२९॥ मधुकद्विपले कल्के द्रोणे चामलकीरसात् । तद्वत्सिद्धं घृतप्रस्थं पित्तापस्मारभेषजम् ॥ ३० ॥ (६) आवले का रस एक द्रोण, मुलहठी का कल्क दो पल, घी एक प्रस्थ इनसे यथाविधि सिद्ध घृत पैत्तिक अपस्मार को नष्ट करता है ॥३०॥ अभ्यङ्गः सार्षपं तैल बस्तमूत्रे चतुर्गुणे । सिद्धं स्याद् गोशकृन्मूत्रे स्नानोत्सादनमेव च ॥३१॥ अभ्यंग-(१) बकरे का मूत्र चार सेर, सरसो का तैल एक सेर, इनसे सिद्ध किये तैल का अभ्यंग करे । इसी प्रकार गाय के गोबर से उबटन और गाय के मूत्र से स्नान करे ॥ ३१ ॥