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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०७ विपाट्य चोद्धृत्य भिषक् सकोपं१ शस्त्रेण दग्ध्वा व्रणवच्चिकित्सेत् । अदग्ध ईषत् परिशोषितश्च प्रयाति भूयोऽपि शनैर्विवृद्धिम् ॥ ८१ ॥ तस्मादशेषः कुशलैः समन्ताच्छेद्यो भवेद्वीक्ष्य शरीरदेशान् । चिकित्सा—ग्रन्थि रोगी पुरुष को वमनादि से शोधन करके अपक्व ग्रन्थि को स्वेदन द्वारा ढीला करके पत्थर, लकडी, अगूठा, दण्डे आदि से विलीन करना चाहिये और यदि इस प्रकार से शान्त न हो तो शस्त्र से चीरकर सम्पूर्ण कोष (वास्तु ग्रन्थि) को निकाल कर अग्नि से जलावे और फिर मधु, घृतादि से व्रण के समान चिकित्सा करे। यदि ग्रन्थि को जलाया न जाये अथवा इसका कुछ भाग शेष रह जाये तो फिर से यह ग्रन्थि धीरे धीरे बढ़ जाती है। इसलिये कुशल वैद्यों को चाहिये कि चारों ओर से शरीर भागों को भली प्रकार से देख कर इसका सम्पूर्ण रूप में छेदन करे जिससे कहीं पर कोई भाग शेष न रह जाये२ ॥ ८०-८१- ॥ शेषे कृते पाकवशेन शीर्येत्ततः क्षतोत्थः प्रसरेद्विसर्पः ॥ ८२ ॥ उपद्रवं तं प्रविचार्य तज्ज्ञः स्वैर्भेषजैः पूर्वतरैर्यथोक्तैः । ततः क्रमेणास्य यथाविधानं व्रणं व्रणज्ञस्त्वरया चिकित्सेत् ॥८३॥ ग्रन्थि के सम्पूर्ण बाहर न निकलने पर यदि कुछ भाग शेष रह जाये और भाग्य से वह पक जावे तब क्षतजन्य विसर्प ( रोग ) फैलने लगता है । उस समय व्रण के उपद्रव तथा इसकी चिकित्सा को समझने वाला वैद्य भिन्न २ रोग की अपनी २ चिकित्सा अर्थात् विसर्प रोग की विसर्प-चिकित्सा और व्रण की व्रण-चिकित्सा प्रारम्भ मे करे३। व्रण-चिकित्सा-विधि को जानने वाला वैद्य १ 'सकोप' इति च पाठ । २ सुश्रुत में भी कहा है— अमर्मजात शममप्रयातमपक्वमवापहरेद् विदार्य । दहेत् स्थिते वासृजि सिद्धकर्मा सद्य क्षतोक्त च विधि विदध्यात् ॥ सम्प्राप्ति— व्यायामजातैरबलस्य तैस्तैराक्षिप्य वायुर्हि सिराप्रतानम् । संपीड्य संकोच्य विशोष्य चापि ग्रन्थिं करात्युन्नतमाशु वृत्तम् ॥ सु० नि० ११ ॥ ३ व्रण के सोलह उपद्रव—विसर्प पक्षघातश्च सिरास्तम्भोऽपतानकः । मोहोन्मादव्रणरुजो ज्वरस्तृष्णा हनुग्रह ॥ कासश्छर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथु. । षोडशोपद्रवाः प्रोक्ता व्रणाना व्रणचिन्तकै. ॥