चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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इस व्रणभूत क्षत की शीघ्रता से चिकित्सा करे और औषध द्वारा उपद्रवों से व्रण को बचावे ॥ ८२-८३ ॥ विवर्जयेत्कुक्ष्युदराश्रितं च तथा गले मर्मणि संश्रितं च । स्थूलः खरश्चापि भवेद्विवर्ज्यो यश्चापि बालस्थविराबलानाम् ॥ ८४ ॥ ग्रन्ध्यर्बुदानां च यतोऽविशेषः प्रदेशहेत्वाकृतिदोषदूष्यैः । ततश्चिकित्सेद्भिषगर्बुदानि विधानविद् ग्रन्थिचिकित्सितेन ॥ ८५ ॥ असाध्य ग्रन्थि—कुक्षि, उदर, गले ओर हृदय आदि मर्म स्थानो मे आश्रित ग्रन्थि की चिकित्सा न करे। जो ग्रन्थि स्थूल और खर हो वह भी त्याज्य है। बालक, वृद्ध, नारी अथवा निर्बल मे उत्पन्न ग्रन्थि भी असाध्य है। क्योकि ग्रन्थि और अर्बुद मे प्रदेश (स्थान), हेतु (निदान), आकृति (लक्षण), दोष (वातादि), दूष्य (रक्त, मास और मेद) की समानता है, इसलिये चिकित्सा विधि को जानने वाले वैद्य को चाहिये कि ग्रन्थि की विधि मे ही अर्बुद रोग की चिकित्सा करे¹ ॥८४-८५॥ ताम्रा सशूला पिडका भवेद्या सा² चालजी नाम परिस्रुतास्रा । रोगे³ऽक्षतश्चर्मनखान्तरे स्यान्मासास्रदूषी भृशशीघ्रपाकः ॥ ८६ ॥ जिस पिडका का रंग ताम्र के समान हो, जिसमे बहुत वेदना होती हो तथा जिसमे से लसीका (लस) का स्राव होता हो उसको 'अलजी' पिडका कहते है। त्वचा और नख की सन्धि मे मास और रक्त को दूषित करने वाला ओर अति शीघ्र पकने वाला 'अक्षत' नाम का शोथ होता है। [सुश्रुत मे भी इसी को 'चिप्य' नाम से कहा है⁴ ॥८६॥ ज्वरान्विता वङ्क्षणकक्षगा या वर्तिर्निरातिः कठिनाऽऽयता च । विदारिका सा कफमारुताभ्या तेषा यथादोषमुपक्रमः स्यात् ॥ ८७ ॥ १ सुश्रुत ने भी कहा— वातेन पित्तेन कफेन चापि रक्तेन मांसेन च मेदसा च। तज्जायते तस्य च लक्षणानि ग्रन्थेः समानानि सदा भवन्ति ॥ २ 'सात्वालजी' इति । ३ 'शोफेऽक्षत' इति च पाठः । ४ अलजी—ददती त्वचमुत्थाने तृष्णामोहज्वरप्रदा । विसर्पत्यनिशं दुःखा दहत्यग्निरिवाल्जी ॥ चिप्य—नखमासमधिष्ठाय पित्तं वातश्च वेदनाम् । करोति दाहपाकौ च तं व्याधिं चिप्यमादिशेत् ॥ अक्षत—तदेवाक्षतरोजाख्यं तथोपनखमित्यपि ॥