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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० १२] चिकित्सितस्थानम् ५०९ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ (७) विदारिका—जो शोथ बत्ती के समान वङ्क्षण या कक्षा प्रदेश मे उत्पन्न होता है, जिसके कारण रोगी को ज्वर रहता है, शोथ कठिन और फैला रहता है, उसको 'विदारिका' कहते है। यह कफ और वायु की प्रधानता तथा निर्बल पित्त के कारण उत्पन्न होती है १ ॥८७॥ विस्रावणं पिण्डिकयोपनाहः पक्वेषु चैव व्रणवच्चिकित्सा। इन अलजी आदि पिडकाओ की दोषानुसार शोधनरूप, विस्रावण, रक्त- मोक्षण आदि तथा उपनाह, पिण्ड-स्वेद, या पकने पर व्रण के समान चिकित्सा करनी चाहिये। विस्फोटकाः सर्वशरीरगास्तु स्फोटाः सदाहज्वरतर्षयुक्ताः ॥८८॥ विस्फोटक—सम्पूर्ण शरीर मे या एक भाग मे दाह, ज्वर और प्यास से युक्त छाले उत्पन्न हो जाते है, उनको 'विस्फोटक' कहते है ॥ ८८ ॥ यज्ञोपवीतप्रतिमाः प्रभूताः पित्तानिलाभ्या जनितास्तु २ कक्षाः । यश्चापराः स्युः पिडकाः प्रकीर्णाः स्थूलाणुमध्या अपि पित्तजास्ताः॥ ८९ ॥ (८) कक्षा—पित्त और वायु के कारण उत्पन्न बहुत से स्फोट मिल कर जब यज्ञोपवीत के समान हो जाते है, तब इसको 'कक्षा' कहते है और जो पिड़काये इधर-उधर बिखरी रहती है, तथा कोई स्थूल, कोई सूक्ष्म और कोई मध्यम आकार की होती हैं, वे सब पित्त-प्रकोप से उत्पन्न समझनी चाहिये ३ ॥८६॥ सर्वत्र गात्रेषु मसूरमात्र्यो मसूरिकाः पित्तकफात्प्रदिष्टाः । विसर्पशान्त्यै विहिताः क्रिया या ता तासु कुष्ठे च हिता विदध्यात् ॥६०॥ (६) रोमान्तिका—सम्पूर्ण शरीर पर छोटी छोटी पिड़काये हो जाये जिन से रोगी को ज्वर, दाह और प्यास रहे, इन पिड़काओं मे खाज होती हो, रोगी को अरुचि तथा मुख से पानी आता हो तो इनको 'रोमान्तिका' कहते है ये पित्त और कफ से होती है । (१०) मसूरिका—सम्पूर्ण शरीर मे मसूर के दाने के समान उत्पन्न पिड- काओ को 'मसूरिका' कहते है, ये पित्त और कफ से होती है । मसूरिका और रोमान्तिका के लिये विसर्प तथा कुष्ठ रोग मे कथित चि- कित्सा-विधि बरतनी चाहिये ॥ ६० ॥ १. विदारीकन्दवद् वृत्ता कक्षावङ्क्षणसन्धिषु । रक्ता विदारिका विद्यात् सर्वजा सर्वलक्षणाम् ॥ २ 'पत्तानिवाङ्गाजनिभास्तु' इति च पाठः । ३ विस्फोटक और कक्षा के लिये सुश्रुतनिदान अ० १३ देखिये ।