चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context४० चरकसंहिता [ अ० ३ रैश्चोपचर्यमाणस्ततः प्राप्तकालः सर्वेन्द्रियोपपन्नः परिपूर्णसर्वशरीरो बल- वर्ण-सत्त्व-संहनन-संपदुपेतः सुखेन जायते समुदायादेषां भावानाम् ॥३॥ दोष से रहित वीर्य वाला पुरुष, जब दोष से रहित योनि रक्त (रज) और गर्भाशय वाली स्त्री के साथ ऋतु-समय में ससर्ग करता है और जब इनके ऋतु-काल में ससर्ग करने पर शुक्र गर्भाशय में पहुच कर शोणित (रज) के साथ मिलता है तब मन से युक्त जीव (चेतन) उसमें आ जाता है, तब गर्भ बनता है। और यह गर्भ सात्म्य रसों के उपयोग से तथा गर्भिणी के गर्भाशय में हितकारक उपचारों से पोषित होकर नीरोग रह कर बढ़ता है। पीछे ठीक प्रसव काल (नवम या दशम मास) तक सब इन्द्रियों से युक्त पूर्ण शरीर वाला, बल, वर्ण, सत्त्व और शरीर रचना के उत्तम गुणों से युक्त होकर निम्न- लिखित माता आदि छ पदार्थों के मयोग से सुखपूर्वक उत्पन्न हो जाता है ॥३॥ मातृजश्चायं गर्भः पितृजश्चाऽऽत्मजश्च सात्म्यजश्च रसजश्च । अस्ति च सत्त्वमुपपादुकमिति होवाच भगवानात्रेयः ॥ ४ ॥ इसलिये यह गर्भ माता से उत्पन्न अर्थात् (शोणितजन्य) है, पिता से उत्पन्न (शुक्रजन्य) है, आत्मा से उत्पन्न, सात्म्य से उत्पन्न, रस से उत्पन्न है और सत्त्वसंज्ञावाला मन भी इसकी उत्पत्ति में घटक है। [क्योंकि शुक्र शोणित के साथ ही यह मन आत्मा का सम्बन्ध कराता है, इसलिये गर्भ सत्त्वजन्य भी है]। ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ ४ ॥ नेति भरद्वाजः । किं कारणम् । न हि माता, न पिता, नात्मा, न सात्म्यं, न पानाशन-भक्ष्य-लेह्योपयोगा गर्भं जनयन्ति, न च परलोका- देत्य गर्भं सत्त्वमवक्रामति ॥ ५ ॥ विद्वान् भरद्वाज ने कहा—नही यह बात नहीं है। क्योंकि न माता, न पिता, न आत्मा, न सात्म्य, न पान, अशन, भक्ष्य और लेह्य इन से उत्पन्न रस गर्भ को उत्पन्न करते हैं और न 'सत्त्व' (चित्त) परलोक से आकर गर्भ मे प्रवेश करता है, अतः गर्भ माता आदि छः पदार्थों से उत्पन्न नहीं होता ॥ ५ ॥ यदि हि मातापितरौ गर्भं जनयेताम् भूयस्यः स्त्रियः पुमांसश्च भूयासः पुत्रकामाः, ते सर्वे पुत्रजन्माभिसंधाय मैथुनधर्ममापद्यमानाः पुत्रानेव जनयेयुर्दुहितॄर्वा दुहितृकामाः, न तु काश्चित् स्त्रियः केचिद्वा पुरुषा निरपत्याः स्युरपत्यकामा वा परिदेवेरन् ॥ ६ ॥ यदि गर्भ की उत्पत्ति मे माता पिता कारण हों तो बहुत सी स्त्रियाँ और बहुत से पुरुष पुत्रकामना और कन्याकामना वाले होते है। वे पुत्र की कामना से पुत्रों और कन्या की कामना से कन्याओं को उत्पन्न कर लिया करें। कोई