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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४१

भी स्त्री वा पुरुष बिना संतान के न रहे । कोई संतान की इच्छा वाले स्त्री वा पुरुष संतान के लिये कभी दुःखी न हों और न विलाप किया करे ॥ ६ ॥ न चाऽऽत्माऽऽत्मानं जनयति । यदि ह्यात्माऽऽत्मानं जनयेज्जातो वा जनयेदात्मानमजातो वा ? तच्चोभयथाऽप्ययुक्तं, न हि जातो जनयति, सत्त्वात्, न चाजातो जनयति, असत्त्वात्, तस्मादुभयथाऽप्यनुपपत्तिः,- तिष्ठतु तावदेतत्, यद्ययमात्मानं शक्तो जनयितुं स्यात् , नत्वेवमिष्टास्वेव कथ योनिषु जनयेदृशिनमप्रतिहतगति कामरूपिण तेजो बल-जव-वर्ण- सत्त्व-संहनन-समुदितमजरममरुजममरम् । एवविधं ह्यात्माऽऽत्मान- मिच्छत्यतो वा भूयः ॥ ७ ॥ आत्मा भी आत्मा को उत्पन्न नहीं करता । यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न करे तब तो क्या वह स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे आत्मा को उत्पन्न करता है या बिना उत्पन्न हुए ही दूसरे को पैदा करता है ? दोनो प्रकार से सम्भव नही है । क्योंकि स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे आत्मा को पैदा नही करता, क्योकि वह स्वयं ही अविद्यमान है ? और उत्पन्न हुए बिना भी ( कारण का अभाव होने से ) वह उत्पन्न नहीं कर सकता । क्योंकि वह स्वयं नहीं है, इसलिये दोनों ही प्रकार से आत्मा की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अच्छा यही मान लेते हैं कि-आत्मा आत्मा को उत्पन्न करता है, तो फिर आत्मा इष्ट योनियों में ही जन्म क्यों न लेवे ? अनिष्ट योनियों में क्यों जन्म लेवे ? यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न कर सके तो जिसके अधीन यह भूत-भौतिक सब ससार है ऐसे वशी, अप्रतिहत गति वाले (बे-रोकटोक जाने वाले), यथेच्छ रूपधारी, तेज, बल, वर्ण, सत्त्व, संहनन से युक्त अजर, अमर, नीरोग आत्मा को ही उत्पन्न करे । क्योकि आत्मा अपनी आत्मा को इन उपरोक्त गुणों से युक्त अथवा इन से भी अधिक गुणो वाला चाहता है ॥ ७ ॥ असात्म्यजश्चायं गर्भः । यदि हि सात्म्यज स्यात्, नहि सात्म्य- सेविनामेवैकान्तेन प्रजा स्यात्,असात्म्यसेविनश्च निखिलेनानपत्याःस्युः, तच्चोभयमुभयत्रैव दृश्यते ॥ ८ ॥ यह गर्भ सात्म्य से भी उत्पन्न नहीं होता है। यदि गर्भ की उत्पत्ति मे सात्म्य ही कारण हो तो सात्म्यसेवियो के ही केवल संतान उत्पन्न होनी चाहिये और असा- त्म्यसेवी सब के सब बिना संतान के रहने चाहिये । परन्तु दोनों दोनों प्रकार के देखे जाते हैं ॥ ८ ॥ अरसजश्चायं गर्भः, यदि हि रसजः स्यात् , न केचित्स्त्रीपुरुषेष्वन- पत्याः स्युः, न हि कश्चिदस्त्येषां यो रसान्नोपयुङ्क्ते । श्रेष्ठरसोपयोगिनां चेद्