चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextएवमनयाऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ ॥ २६ ॥ आठवें मास के व्यतीत होने पर एक दिन चढने पर नवम मास से लेकर दस वें मास तक के समय तक 'प्रसव-काल' कहते हैं । [ सुश्रुत मे बारहवें मास तक प्रसव काल माना है । साधारणत. २८० दिन के पश्चात् प्रसव काल होता है ] । इसके उपरान्त गर्भ का कुक्षि मे अधिक समय रहना दोषयुक्त, रोग आदि के कारण जानना चाहिये । इस प्रकार उपरोक्त क्रम से गर्भ कुक्षि म बनता ओर वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ २५-२६ ॥ मात्रादीनां तु खलु गर्भकराणां भावानां संपदस्तथा वृत्तस्य सौष्ठ- वान्मातृतश्चैवापस्नेहोपस्वेदाभ्यां कालपरिणामात्स्वभावसंसिद्धेश्च कुक्षौ वृद्धिं प्राप्नोति ॥ २७ ॥ गर्भ की वृद्धि के कारण—गर्भ को बनाने वाले माता-पिता आदि कारणों के उत्तम होने से, आचार की श्रेष्ठता मे, उपस्नेह तथा उपस्वेद [ शरीर की गरमी जैसे की पक्षियों के शरीर की गरमी से अण्डे पोषित होते हैं ] इन गुणों से, काल के परिणाम से और स्वभाव से ही गर्भ गर्भाशय से बढता है ॥२७॥ मात्रादीनां तु खलु गर्भकराणां भावानां व्यापत्तिनिमित्तमस्या जन्म भवति ॥ २८ ॥ ये त्वस्य कुक्षौ वृद्धिहेतुसमाख्याता भावास्तेषां विपर्ययादुदरे विना- शमापद्यतेऽथवाऽप्यचिरजातः स्यात् ॥ २९ ॥ गर्भ को बनाने वाले माता पिता आदि कारणों के दूषित होने से गर्भ का जन्म नहीं होता । जो पदार्थ गर्भाशय मे गर्भ की वृद्धि मे कारण बतलाये हैं, इन के विपरीत होने से गर्भ या तो पेट मे नष्ट हो जाता है, अथवा समय से पूर्व उत्पन्न हो जाता है ॥ २८-२६ ॥ गर्भविकृति के कारण— यतस्तु कार्त्स्न्येनाविनश्यन्विकृतिमापद्यते तदनुव्याख्यास्यामः— यदा स्त्रिया दोषप्रकोपणोक्तान्यासेवमानायाः दोषाः प्रकुपिताः शरीरमु- पसर्पन्तः शोणितगर्भाशयावुपपद्यन्ते न तु कार्त्स्न्येन शाणितगर्भाशयो दूषयन्ति तदेयं गर्भं लभते स्त्री । यदा गर्भस्य तस्य मातृजानामवय- वानामन्यतमोऽवयवो विकृतिमापद्यते एकोऽथवाऽनेके । यस्य यस्य ह्यवयवस्य बीजे बीजभागे वा दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, तं तमवयवं विकृतराविशति, यदा ह्यस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभागः प्रदोषमाप- द्यते, तदा वन्ध्यां जनयति । यदा पुनरस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभा-