चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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गावयवः प्रदोषमापद्यते, तदा पूतिप्रजां जनयति । यदा त्वस्याःशोणिते गर्भाशयबीजभागावयवः स्त्रीकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोषमापद्यते, तदा स्त्र्याकृतिभूयिष्ठामस्त्रियं वान्ता १ नाम जनयति । ता स्त्रीव्यापदमाचक्षते ॥ ३० ॥ जिस प्रकार गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त हो जाता है, उसका वर्णन करते हैं—जिस समय दोषो को प्रकुपित करने वाले कारणो का सेवन करती हुई स्त्री में प्रकुपित हुए दोष शरीर में फैल कर रक्त और गर्भाशय मे पहुंच जाते हैं, परन्तु सम्पूर्ण रूप से रक्त और गर्भाशय को दूषित नहीं करते, उस समय यदि स्त्री को गर्भ रह जाये तो माता से उत्पन्न होने वाले गर्भ के अवयवों में से किसी एक में अथवा बहुतों में विकार उत्पन्न हो जाता है। जिस जिस अवयव के बीज में अथवा बीज के एक भाग मे दोष प्रकुपित होते हैं, तब उस उस अवयव में विकृति उत्पन्न हो जाता है। जिस समय स्त्री के रक्त में गर्भाशय का बीज ( उत्पत्ति कारण ) भाग दूषित हो जाता है, तब तब संतान वन्ध्या ( बांझ ) उत्पन्न होती है और जब स्त्री का रक्त या गर्भाशय के बीज का एक भाग दूषित होता है, तब 'पूति प्रजा' ( सडे अगों वाली ) सन्तान उत्पन्न होती है। जिस समय स्त्री का रक्त और गर्भाशय के बीज का एक भाग तथा स्त्री को बनाने वाले शरीर के बीजभागों का एक भाग दूषित हो जाता है, तब स्त्री के लक्षणों वाली ( उपस्थ, स्तन आदि लक्षणों से युक्त ) परन्तु अस- म्पूर्ण लक्षणों वाली 'रान्ता' या बार्त्ता नाम की प्रजा को उत्पन्न करते हैं। इसको स्त्री व्यापत् अर्थात् स्त्री के आर्तव दोष से उत्पन्न व्यापत्ति वा स्त्री शरीर की रचना में होने वाली हानि कहते हैं ॥ ३० ॥ एवमेव यदा पुरुषस्य बीजे बीजभाग प्रकोषमापद्यते, तदा वन्ध्यं जनयति । यदा पुनरस्य बीजे बीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते तदा पूतिप्रजा जनयति । यदा त्वस्य बीजे बीजभागावयवः पुरुषकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोषमापद्यते, तदा पुरुषाकृतिभूयिष्ठमपु- रूप तृणपूलिक नाम जनयति, ता पुरुषव्यापदमाचक्षते ॥ ३१॥ इसी प्रकार पुरुष के बीज में बीज का भाग दोष युक्त होता है, तब पुरुष वन्ध्य को उत्पन्न करता है और जब पुरुष के बीज मे पुरुष का उत्पन्न करने वाले बीज का एकभाग दूषित होता है तब 'पूति प्रजा' अर्थात् दुर्गन्धयुक्त अगो वाली सतान उत्पन्न होती है और जब पुरुष के बीज को
१ 'वार्ता नाम' इति च पाठः ।