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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages
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६३० चरकसंहिता [ अ० १५

( ६ ) घी, वसा ( चर्बी ) और मेद इन तीन स्नेहो को आनूप मांसरस के साथ सिद्ध करके पिलाना चाहिये ॥ २३० ॥ पयसा समिता चापि घना त्रिस्नेहसंयुताम् । ( १०) दूध के साथ समिता ( मैदा, गेहूँ का बारीक आटा ) को घी, वसा और मेद से मिला कर घट्ट ( घना ) करके खाना चाहिये । नारीस्तन्येन संयुक्ता पिबेदौदुम्बरी त्वचम् ॥ २३१ ॥ (११) गूलर की छाल को स्त्री के दूध मे मिलाकर पिलाना चाहिये ॥२३१॥ आभ्या वा पायसं सिद्धमद्यादत्यग्निशान्तये । ( १२ ) अथवा गूलर के दूध और औरत के दूध से खीर पका कर खिलानी चाहिये इससे अग्नि की वृद्धि शान्त होती है । श्यामात्रिवृद्विपक्वं वा पयो दद्याद्विरेचनम् । असकृत्पित्तशान्त्यर्थं पायसप्रतिभोजनम् ॥ २३२ ॥ प्रसमीक्ष्य भिषक् प्राज्ञस्तस्मै दद्याद्विधानवित् । ( १३ ) श्यामा ( निशोथ ) और त्रिवृत् के साथ दूध पका कर विरेचन के लिये देना चाहिये । पित्त की शान्ति के लिये बार-बार दूध देना चाहिये । चिकित्सा विधि को समझने वाले बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि अवस्थानुसार भोजन करावे ॥ २३२- ॥ यत्किञ्चिन्मधुरं सर्वं मेध्यं श्लेष्मलं गुरुभोजनम् ॥ २३३ ॥ तदत्यग्निहितं सर्वं भुक्त्वा प्रस्वपनं दिवा । (१४) सामान्य रूप मे—जो कुछ मधुर, जो कुछ मेध्य (मेदुर मेद-बहुल), कफ बहुल और गुरु होता है, वह सब भोजन अग्नि वृद्धि को शान्त करने के लिये हितकारी है, इसी प्रकार से भोजन करके दिन मे सोना भी लाभदायक है ॥२३३॥ मेध्यान्यन्नानि योऽत्यग्नावप्रशान्तः समश्नुते ॥ २३४ ॥ न तन्निमित्तं व्यसनं लभते पुष्टिमेव च । कफे वृद्धे जिते पित्ते मारुते चानलः समः ॥ २३५ ॥ समधातोः पचत्यन्नं पुष्ट्यायुर्बलवृद्धये । जो मनुष्य अग्नि के बढने पर बिना उपेक्षा किये मेद-बहुल भोजनों को खाता रहता है, उसको इससे उत्पन्न विकार नहो होते, अपि तु शरीर मे पुष्टि आती है । कफ के बढने से, वायु और पित्त के शान्त होने पर अग्नि समान हो जाता है । धातुओं के समान होने पर अग्नि भी आयु, पुष्टि, बल की वृद्धि के लिये अन्न को पचाता है ॥ २३४-२३५-॥ भवन्ति चात्र—पथ्यापथ्यमिहैकत्र मुक्तं समशनं मतम् ॥२३६॥ विषमं बहु वाऽल्पं वाऽप्यप्राप्तातीतकालयोः ।

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अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६३१ भुक्तं पूर्वान्नशेषे तु पुनरध्यशनं मतम् ॥ २३७ ॥ त्रीण्यप्येतानि मृत्युं वा घोरान्व्याधीन्सृजन्ति वा । पथ्य ( हितकारी ) और अपथ्य ( अहितकारी ) को मिला कर एक साथ खाने को 'समशन' कहते हैं । मात्रा से बहुत या थोड़ा भोजन करने अथवा भोजन के समय से पूर्व अथवा पीछे भोजन करने को 'विषमाशन' कहते हैं । प्रथम खाये हुए अन्न शेष के जीर्ण होने से बचे रहने पर पुनः भोजन करने को 'अध्यशन' कहते है । समशन, विषमाशन और अध्यशन ये तीनों ही मृत्यु अथवा भयानक रोगो को उत्पन्न करते है ॥ २३६-२३७- ॥ प्रातराशे त्वजीर्णेऽपि सायमाशो न दुष्यति ॥ २३८ ॥ दिवा प्रबुध्यतेऽर्केण हृदयं पुण्डरीकवत् । तस्मिन्विबुद्धे स्रोतांसि स्फुटत्वं यान्ति सर्वशः ॥ २३६ ॥ व्यायामाच्च विचाराच्च विक्षिप्तत्वाच्च चेतसः । न क्लेदमपगच्छन्ति दिवा तेनास्य धातवः ॥ २४० ॥ अक्लिन्नेष्वन्नमासक्तमन्यत्तेषु न दुष्यति । अविदग्ध इव क्षीरे क्षीरमन्यद्विमिश्रितम् ॥ २४१ ॥ नैव दूष्यति तेनैव समं संपद्यते यथा । रात्रौ तु हृदये म्लाने संवृतेष्वयनेषु च ॥ २४२ ॥ यान्ति कोष्ठे च विक्लेदं संवृते देहधातवः । क्लिन्नेष्वन्यदपक्वेषु तेष्वासिक्तं प्रदुष्यति ॥ २४३ ॥ विदग्धेषु पयःस्त्वन्यत्पयस्तेष्विवार्पितम् । नैशेष्वाहारजातेषु नाविपक्वेषु बुद्धिमान् ॥ तस्मादन्यत्समश्नीयात्पालयिष्यन्बलायुषी ॥ २४४ ॥ प्रातःकालं का किया हुआ भोजन यदि जीर्ण न हो तो भी यदि सायकाल का भोजन कर लिया जाये तो वह दोष उत्पन्न नही करता । क्योंकि दिनमे हृदय कमल के समन सूर्य के द्वारा विकसित रहता है । (हृदय अधिक क्रियाशील है, मस्तिष्क कार्य करता रहता है ) इस हृदय ( वात-सस्थान ) के जागृत रहने पर सब स्रोत खुले रहते है । मनुष्य के व्यायाम करने, चलने-फिरने से, विचार ( चिन्तन ) से, चित्त के विक्षेप से, दिन मे शरीर के धातु शुष्क हो जाते हैं । इन अक्लिन्न धातुओं मे प्रक्षिप्त अन्य अन्न ऐसे ही दूषित नहीं होता जैसे बिना विदग्ध हुए ( फटे ) दूध मे नया दूध मिलाने से कोई भेद नहीं आता । रात्रि मे हृदय की गति के कम होने से ( वात-संस्थान मस्तिष्क के सो जाने से ) और स्रोतों के बन्द हो जाने पर, कोष्ठ मे पाचन-क्रिया के रुक जाने से शरीर

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६३० चरकसंहिता [ अ० १५

के धातु क्लिन्न (आर्द्र) हो जाते है। इन अपक्व और क्लिन्न स्रोतो मे जो अन्य आहार आता है, वह भी दूषित हो जाता है। जिस प्रकार गरम दूध यदि विदग्ध (विकृत) हो जाये तो उसमे अन्य जो भी दूध मिलाया जाय वह भी दूषित हो जाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि बल और आयुष्य की रक्षा करते हुए रात्रि के भोजन के परिपाक न होने पर अन्य भोजन न करे। रात्रि का भोजन जीर्ण होने पर ही भोजन करना चाहिये ॥२३८ २४४॥ तत्र श्लोकाः—अन्तरग्निगुणा देहं यथा धारयते च सः यथाऽन्नं पच्यते याश्च यथाऽऽहारः करोत्यपि ॥ २४५ ॥ येऽग्नयो यांश्च पुष्यन्ति यावन्तो ये पचन्ति यान् । रसादीनां क्रमोत्पत्तिर्मलानां तेभ्य एव च ॥ २४६ ॥ वृष्याणामाशुवृद्धेतुर्धातुकालोद्भवक्रमः । रोगैकदेशकृद्धेतुरन्तरग्निर्यथाऽधिकः ॥ २४७ ॥ सन्दूषयति यथा दुष्टो यान् रोगाञ्जनयत्यपि । ग्रहणी या समासाच्च ग्रहणीदोषलक्षणम् ॥ २४८ ॥ पूर्वरूपं पृथक् चैव व्यञ्जनं सचिकित्सितम् । चतुर्विधस्य निर्दिष्टा तथा चावस्थिकी क्रिया ॥ २४९ ॥ जायते च यथाऽत्यग्निर्यच्च तस्य चिकित्सितम् । उक्तवानिह तत्सर्वं ग्रहणीदोषके मुनिः ॥ २५० ॥ उपसहार—भीतरी अग्नि के गुण शरीर को किस प्रकार धारण करते हैं, अन्न का परिपाक किस प्रकार होता है, किस प्रकार आहार किन २ गुणों को करता है, कितने अग्नि हैं, ये किनका पोषण करते हैं, किन को ये पचाते है, रसादि धातुओं की क्रमश उत्पत्ति, इन धातुओं से मलादि की उत्पत्ति, तृष्णा- ओ का कारण, धातुओ की उत्पत्ति का काल, उनका क्रम, एक देश मे रोगो- त्पत्तिका कारण, अधिक अन्तराग्नि का कारण, दूषित अग्नि से उत्पन्न रोग, ग्रहणी और ग्रहणी दोष के लक्षण, उनके पूर्वरूप, पृथक् २ लक्षण, चिकित्सा अव- स्थानुसारी चिकित्सा, अत्यग्नि की उत्पत्ति और चिकित्सा इस ग्रहणी-रोग-चिकित्सित अध्याय मे इन सब विषयों का मुनि आत्रेय ने उपदेश कर दिया है॥२४५-२५०॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने ग्रहणीरोगचिकित्सित नाम पञ्चदशोऽध्याय ॥ १५ ॥


मुद्रक—प० बैकुण्ठनाथ भार्गव, आनन्द सागर प्रेस, गायघाट, बनारस ।