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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८७

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८७ गर्भ को भूख प्यास का अनुभव नही होता । वह तो माता के आश्रित रहता है, इसी लिये पराधीन रहता है। जब तक अंगों का निर्माण नहीं होता, वह माता के आश्रय मे ही उपस्नेहन, उपस्वेदन द्वारा जीता है इसके अनन्तर अग प्रत्यग बन जाने पर लोम कूप के मार्गों से तथा नाभि नाड़ी के मार्ग से उपस्नेहन लेता है । इस गर्भ की नाभि मे नाड़ी लगी होती है और यह नाड़ी नाभि मे तथा अपरा मे लगी होता है । अपरा माता के हृदय ( गर्भाशय के ऊर्ध्व शिखर ) मे लगी रहती है । माता का हृदय इस अपरा की बहती हुई सिराओं द्वारा गर्भ तक पहुचता है [ माता के विचार इन सिराओ द्वारा बच्चे मे आते है ] । माता का यह रस गर्भ में बल वर्ण को उत्पन्न करता है । वह सब प्रकार के रसो से उत्पन्न होता है । जो गर्भवती स्त्री भोजन करती है, उसके आहार रस के तीन भाग हो जाते हैं । ( १ ) गर्भिणी के शरीर की पुष्टि के लिये ( २ ) दूध के लिये और ( ३ ) गर्भ को बढाने के लिये । यह गर्भ इस आहार के आश्रय से पराधीन होकर माता के ऊपर निर्भर रह कर गर्भाशय मे जीवन धारण करता है । २१॥ स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूति-मारुत-योगात्परिवृत्त्याऽवाक्शिरा निष्क्रामत्यपत्यपथेन । एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा । परं त्वतः स्वतन्त्रवृत्तिर्भवति ॥२२॥ प्रसव काल के समीप आने पर वायु के बल से शिर घूम कर नीचे की ओर सन्तान निकलने के मार्ग में आ जाता है और योनिमार्ग से बाहर निकल जाता है । यह तो प्रकृति है, इससे विपरीत अवस्था का नाम विकृति है। बाहर आने पर गर्भ स्वतन्त्र रूप से जीवन धारण करता है ॥२२॥ तस्याऽऽहारोपचारौ जातिसूत्रीयोपदिष्टावविकारकरौ चाभिवृद्धि- करौ भवतः । ताभ्यामेव च ( सेविताभ्या ) विषमाभ्यां जातः सद्यो हन्येत तरुरिवाचिरव्यपरोपितो वातातापाभ्यामप्रतिष्ठितमूलः ॥ २३ ॥ स्वतन्त्र वृत्ति होने पर जातिसूत्रीय ( शारीरस्थान अ० ८ ) अध्याय में कहे हुए आहार और उपचार इसकी वृद्धि करते हैं और किसी प्रकार का रोग या विकार उत्पन्न नही करते । उत्पन्न हुआ शिशु आहार और उपचार के विषम होने से शीघ्र ही ऐसे मर जाता है जैसे कि तत्काल लगा हुआ वृक्ष बिना जड़ पकड़े हुए वायु और धूप से शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥ आप्तोपदेशादद्भुतरूपदर्शनात्समुत्थान-लिङ्ग-चिकित्सित-विशेषाच्चादो- षप्रकोपानुरूपा देवादि-प्रकोप-निमित्ता विकाराः समुपलभ्यन्ते ॥ २४ ॥

ब्रह्मा आदि से प्रणीत कुमारतन्त्रों के आप्तोपदेश से, अमानुषीय बल, रूप आदि आश्चर्यकारक बातों के देखने से, समुत्थान ( रोगोत्पत्ति ) के कारणों के विशेष होने से, लक्षणों के विशेष तथा चिकित्सा में भेद होने से और दोष प्रकोप से हुए रोगों के विपरीत वर्णवाले लक्षणो को देखने से ज्ञात होता है कि देव आदि के प्रकोप से भी अनेक रोग गर्भ को होते हैं ॥ २४ ॥ कालाकालमृत्योस्तु खलु भावाभावयोरिदमध्यवसितं नः—यः कश्चिन्म्रियते स काल एव म्रियते, न हि कालच्छिद्रमस्तीत्येके । तच्चा सम्यक् , न ह्यच्छिद्रता सच्छिद्रता वा कालस्योपपद्यते, कालस्वलक्षण- स्वभावात् । काल और अकाल मृत्यओं के होने न होने के विषय में हमारा यह निश्चित सिद्धान्त है कि ‘जो कोई मरता है, वह काल में ही मरता है। कइयों का विचार है कि काल में कोई छेद ( अवकाश ) नहीं है जो कि इस अवकाश को प्राप्त करके मरे।' यह मत ठीक नहीं। काल में सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं है. क्योंकि काल के अपने लक्षण मे सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं घटती । तथाऽऽहुरपरे—यो यदा म्रियते स तस्य नियतो मृत्युकालः। स सर्वभूतानां सत्यः, समक्रियत्वादिति । दूसरे विचारकों का कथन है कि जो जब मरता है वह उसका निश्चित काल होता है यह कालमृत्यु है । यह सब प्राणियों के लिये ठीक है, क्योकि काल सब प्राणियों में समान क्रियावाला है । काल से सभी मरते हैं काल को किसी में राग या द्वेष नहीं है । एतदपि च अन्यथाऽर्थग्रहणं, न हि कश्चिन्न म्रियत इति समक्रियः । काल पुनःरायुषः प्रमाणमधिकृत्योच्यते । यस्य चेष्टं यो यदा म्रियते तस्य स नियतो मृत्युकाल इति, तस्य सर्वभावा यथास्वं नियतकाला भवि- ष्यन्ति । तच्च नोपपद्यते—प्रत्यक्षं ह्यकालाहारवचनकर्मणां फलमनिष्टं विपर्यये चेष्टम् । प्रत्यक्षतश्चोपलभ्यते खलु कालाकालव्यक्तितासु तास्व- वस्थासु तं तमर्थमभिसमीक्ष्य । तद्यथा—कालोऽयमस्य तु व्याधेराहा- रस्र्यौषधस्य प्रतिकर्मणो विसर्गस्य चाकालो वेति । लोकेऽप्येतद्भवति काले देवो वर्षत्यकाले देवो वर्षति, काले शीतमकाले शीतं, काले तपत्य काले तपति, काले पुष्पफलमकाले च पुष्पफलमिति । तस्मादुभयमस्ति काले मृत्युरकाले च । नैकान्तिकं । यदि ह्यकाले मृत्युर्नस्यान्नियत-काल- प्रमाणमायुः सर्वं स्यात् । एवं गते हिताहितज्ञानमकारणं स्यात्प्रत्यक्षानु-

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८६

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८६ मानोपदेशाश्चाप्रमाणानि स्युर्ये प्रमाणभूताः सर्वतन्त्रेषु, यैरायुष्यानायु- ष्याणि चोपलभ्यन्ते । वाग्वस्तुमात्रमेतद्वादृषयो मन्यन्ते यदुच्यते— नाकालमृत्युरस्तीति ॥ २५ ॥ यह भी पक्ष ठीक नहीं है। बिना काल के कोई नहीं मरता, इसलिये काल समान क्रियावाला है। ऐसा कहना ठीक नही, क्योंकि यहां पर ‘काल’ शब्द आयु के प्रमाण की अपेक्षा से कहा है। जो यह मानता है कि जो मनुष्य जब मरता है वही उसका नियत मृत्युकाल है, उसके मत में मृत्यु से अतिरिक्त आहार, वचन आदि भी सब नियत कालवाले हो जायेगे। परन्तु ये ऐसे नहीं होते, क्योंकि यह प्रत्यक्ष है कि अकाल में किये भोजन तथा अकाल में कहे हुए वचन का फल बुरा होता है और समय पर किये भोजन तथा समय पर कहे वचन का फल अच्छा होता है और यह भी हम देखते है कि प्रत्येक अवस्था में काल और अकाल का विचार करते हैं। जैसे—यह इस रोग का समय है, यह आहार का समय है, यह औषध का समय है, यह प्रतिकर्म का काल है, यह विसर्ग काल है। इसी प्रकार यह रोग का, भोजन का, औषध का, प्रतिकर्म का और विसर्ग का समय नहीं है। लोक में भी ऐसा होता है। समय पर मेघ बरसता है, अकाल में भी बादल बरसता है। काल में शीत और अकाल में भी शीत होता है। काल में सूर्य तपता हे और अकाल में भी सूर्य तपता है। काल में फूल फल होते हैं और अकाल में भी फूल फल होते हैं। इसलिये दोनों ही बाते है, काल में भी मृत्यु है और अकाल में भी मृत्यु है एक ही बात ठीक नहीं है। यदि अकाल में मृत्यु न हो तो सब पुरुषों की आयु का समय और मान नियत होना चाहिये। इस प्रकार होने से हित अहित का ज्ञान निष्फल हो जाता है। प्रत्यक्ष अनुमान, आप्तोपदेश जा कि सब तन्त्रों में प्रमाणभूत हैं वे सब तथा आयुष्यकारक और अनायुष्यकारक सब बातें व्यर्थ हो जायेगी। ‘अकाल मृत्यु नहीं है’ इस कथन को ऋषि लोग केवल कहने भर के लिये ही मानते हैं, वास्तव में इसमें कुछ सार या सत्यता नही है ॥ २५ ॥ वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन् काले ॥ २६ ॥ तस्य निमित्तं प्रकृतिगुणात्मसम्पत्सात्म्योपसेवनं चेति ॥ २७ ॥ इस कलियुग में आयु का परिमाण सो साल है। इसका कारण उत्तम प्रकृति, उत्तम गुण, उत्तम आत्मा और उत्तम सात्म्य का सेवन है। [उत्तम प्रकृति जैसे—सम वात आदि प्रकृति का होना, उत्तम गुण जैसे—सार-सहनन आदि का होना, उत्तम आत्मा के धर्म, दान, यज्ञ आदि] ॥ २६-२७ ॥

६० चरकसंहिता [ अ० ७ तत्र श्लोकाः—शरीरं यद्यथा तच्च वर्तते क्लिन्नमामयैः । यथा क्लेशं विनाशं च याति ये चास्य धातवः ॥ २८ ॥ वृद्धिह्रासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत् । देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराश्च ये ॥ २९ ॥ परिणामकरा भावा या च तेषां पृथक् क्रिया । मलाख्याः संप्रसादाख्या धातवः प्रश्न एव च ॥ ३० ॥ नवको निर्णयश्चास्य विधिवत्संप्रकाशितः । तथ्यः शरीरविचये शारीरे परमर्षिणा ॥ ३१ ॥ शरीर जिस प्रकार से रहता है, जिस प्रकार से क्लेश या विनाश को प्राप्त होता है, शरीर के धातु, इन धातुओं की वृद्धि और ह्रास क्षीण धातुओं का औषध, देह की वृद्धि करनेवाले और बल को बढ़ाने वाले कारण, परिणाम- कारक भाव, इनकी पृथक् पृथक् क्रिया, मल और प्रसाद रूप धातु, नव प्रश्न तथा इन प्रश्नों का समुचित निर्णय 'शरीर विचय' नामक अध्याय में परमर्षि आत्रेय ने प्रकाशित किया है ॥ २८-३१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरविचय- शारीरं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ सप्तमोऽध्यायः । अथातः शरीरसंख्याशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'शरीरसंख्या' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ शरीरसंख्यामवयवशः (कृत्स्नं) शरीरं प्रविभज्य सर्व-शरीर- संख्यान-प्रमाण-ज्ञान-हेतोर्भगवन्तमात्रेयमग्निवेशः पप्रच्छ ॥ ३ ॥ अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से सम्पूर्ण शरीर की संख्या, परिमाण और नाम आदि ज्ञान करने के लिये अवयव रूप में शरीर का विभाग करके शरीर संख्या नाम शारीर प्रकरण के सम्बन्ध में प्रश्न किया— तमुवाच भगवानात्रेयः—शृणु मत्तोऽग्निवेश ! सर्वशरीरमभिवक्षा- णायथाप्रश्नमेकमना यथावत् ॥ ४ ॥

अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६१

अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६१ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! सम्पूर्ण शरीर के प्रकरण को उपदेश करते हुए मुझ से अपने प्रश्न के अनुसार एकाग्र चित्त होकर सुनो ॥ ४ ॥ शरीरे षट् त्वचः । तद्यथा—उदकधरा त्वग्बाह्या, द्वितीया त्वग- सृग्धरा, तृतीया सिध्म-किलास-सम्भवाधिष्ठाना, चतुर्थी दद्रुकुष्ठसम्भवा- धिष्ठाना, पञ्चम्यलजी-विद्रधी-सम्भवाधिष्ठाना, षष्ठी तु यस्यां छिन्नायां ताम्यत्यन्ध इव च तमः प्रविशति, या चाप्यधिष्ठायारूषि जायन्ते पर्वसु कृष्णरक्तानि स्थूलमूलानि दुश्चिकित्स्यतमानि येति षट् त्वचः । एताः षडङ्गं शरीरमवतत्य तिष्ठन्ति ॥ ५ ॥ शरीर की छः त्वचाएं—शरीर में छ त्वचाएं हैं । जैसे—(१) बाह्य त्वचा उदकधारा जिसमें जल रहता है । ( २ ) दूसरी त्वचा असृग्धारा जिसमें रुधिर रहता है । ( ३ ) तीसरी त्वचा जो सिध्म, किलास आदि रोगों की उत्पत्ति का आश्रय स्थान है । ( ४ ) चौथी त्वचा जो दद्रु ( दाद ) और कुष्ठ ( कोढ ) रोग का आश्रय है । ( ५ ) पाचवीं त्वचा जो अलजी और विद्रधिरोग का आश्र- यभूमि है । ( ६ ) छठी त्वचा जिसके कटने पर पुरुष मूर्छित होता है और अन्धे की भांति अन्धकार में घुसता है—उस कुछ नहीं दीखता और जिस त्वचा का आश्रय लेकर अवयव सन्धियों में काले, लाल, स्थूल मूल वाले ऐसे व्रण उत्पन्न होते हैं जिनकी चिकित्सा करना बहुत कठिन होता है । ये छः त्वचायें छ. अगों वाले शरीर कोढके रहती हैं१ ॥ ५ ॥ तत्रायं शरीरस्याङ्गविभागः । तद्यथा—द्वौ बाहू, द्वे सक्थिनी, शिरो ग्रीवं, अन्तराधिरिति षडङ्गमङ्गम् ॥ ६ ॥ शरीर के छः अग—शरीर के अगों का विभाग इस प्रकार से है जैसे—दो बाहुए, दो टागें, शिर, ग्रीवा और बीच का मध्य भाग, ये छः अग हैं ॥ ६ ॥ त्रीणि २षष्ट्यधिकानि शतान्यस्थ्नां सह ३दन्तोलूखलनखैः । तद्यथा—द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः विंशतिः १ सुश्रुत में सात त्वचायें और ३०० अस्थिया मानीं हैं । २ षष्ठानि इति च पाठः । ३ 'द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः, षष्टिः पाणिपादाङ्गु- ल्यस्थीनि, विंशतिः पाणिपादशलाका, चत्वारि पाणिपादशलाकाधिष्ठानानि, द्वे पाष्ण्र्योरस्थिनी, चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, द्वौ मणिकौ हस्तयोः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयो., द्वे जानुकपालिके, द्वावूरुनलकौ, द्वौ बाहुनलकौ, द्वावंसौ, द्वे

६२ चरकसंहिता [ अ० ७

पाणिपादशलाकाः, चत्वार्यधिष्ठानान्येषां, चत्वारि पाणिपादपृष्ठानि,
षष्टिरङ्गुल्यस्थीनि, द्वे पाष्ण्योः, द्वे कूर्चाधः, चत्वारः पाण्यौर्मणिकाः,
चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयोः, द्वे
जानुनोः, द्वे कूर्परयोः, द्वे ऊर्वोः, द्वे बाह्वोः, सांसयोर्द्वे, द्वावक्षकौ, द्वे
तालुनी, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि, पुसां मेढ्रास्थि एक, त्रिकसंश्रि-
तमेकं गुदास्थि, पृष्ठगतानि पञ्चत्रिंशत्, पञ्चदशास्थीनि ग्रीवायाँ, द्वे
जत्रुणी, एकं हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, द्वे ललाटे, द्वे अक्ष्णोः, गण्ड-
योर्द्वे, नासिकाया त्रीणि घोणाख्यानि, द्वयोः पार्श्वयोश्चतुर्विंशति पञ्ज-
रास्थीनि च पार्श्वकानि, तावन्ति चैषा स्थालिकान्यर्बुदाकाराणि तानि
द्विसप्ततिः, द्वौ शङ्खकौ, चत्वारि शिर कपालानि, वक्षसि सप्तदश, इति
त्रीणि षष्ट्यधिकानि शतान्यस्थ्नामिति ॥ ७ ॥
तीन सौ साठ हड्डिया—दात, दन्त कोशों और नखों को मिला कर
इस शरीर मे तीन सौ साठ अस्थिया हैं । जैसे—३२ दात,, ३२ दातो के उलू-
खल (कोश), २० नख, २० हाथ और पावों की शलाकाएं, ६० हाथ पाव
की अगुलियों की अस्थिया, ४ हाथ और पावों की पीठ की हड्डिया, ४ इन शला-
काओं के आश्रयस्थान । ६० अगुलियों की हड्डिया, २ पाष्णियों (एडियों) की,
२ कूर्चाध । ४ पावों में गुल्फ, २ हाथों के मणिक, ४ प्रकोष्ठ की अस्थियों,
४ टागो की अस्थिया, २ जानुकपाल, २ कूर्पर, २ जाघों की अस्थिया, २ बाहु
की अस्थिया, २ कन्धे की अस्थिया, २ असफलक, २ अक्षक, २ तालु की
अस्थिया, २ श्रोणिफलक (कूल्हे की हड्डिया), १ भगास्थि, १ पुरुषों के लिंग
की अस्थि, त्रिक (कूलहों) के नीचे का आश्रय रूप गुदा के पास १ अस्थि,
३५ पीठ की अस्थिया, १५ अस्थिया गर्दन में, २ जत्रु (हसली) की हड्डी, १
ठोड़ी की अस्थि, ठोड़ी के मूल में बाधने वाली २ अस्थि, ललाट की २ अस्थिया,
२ आँख की, २ कपोलों (गालों) की, ३ अस्थि नासिका में है जिनका नाम
'घोण' है, दोनों पाश्र्वों की २४ अस्थिया, पञ्जर की और पसलिया, उतने ही उनके
असफलके, द्वावक्षकौ, एक जत्रु, द्वे तालुषके, द्वे श्रोणिफलके, एक भगास्थि,
पञ्चचत्वारिंशत्पृष्ठगतान्यस्थीनि, पञ्चदश ग्रीवाया, चतुर्दशोरसि, द्वयोः पार्श्वयोश्च-
तुर्विंशतिः, पार्श्वयोस्तावन्ति चैव स्थालकानि, तावन्ति चैवस्थालकार्बुदानि, एक
हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, एकास्थि नासिकागण्डकूटललाट, द्वौ शङ्खौ, चत्वारि
शिरःकपालानीति, एव त्रीणि षष्ठानि शतान्यस्थ्ना सह दन्तनखेनेति' च पाठः ।

अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६३

अ० ७ ] शरीरस्थानम् ६३ अर्बुद अर्थात् शंख प्रदेश मे २, शिर कपाल ४, वक्ष में १७, इस प्रकार से ३६० अस्थिया पूरी होती हैं । २४-२४ अर्बुद के २४ स्थालक हैं ये सब मिलाकर ७२ हैं ॥ ७ ॥ पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि । तद्यथा-त्वग्, जिह्वा, नासिका, अक्षिणी, कर्णौ च ॥ ८ ॥ इन्द्रियों के आश्रय पाच हैं। जैसे- त्वचा, जिह्वा, नासिका, दो आख और दो कान ॥ ८ ॥ पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि । तद्यथा- स्पर्शन, रसन, घ्राणं, दर्शनं श्रोत्रमिति ॥ ६ ॥ ये पाच बुद्धि इन्द्रिया हैं। जैसे-स्पर्श, रसन, घ्राण दर्शन और श्रोत्र ॥६॥ पञ्च कर्मेन्द्रियाणि । तद्यथा- हस्तौ, पादौ, पायुरुपस्थो, जिह्वा चेति ॥ १० ॥ पाच कर्मेन्द्रिया हैं। यथा - दो हाथ, दो पाव, पायु ( गुदा ), उपस्थ ( लिंग ) और जिह्वा ॥१०॥ हृदय चेतनाधिष्ठानमेकम् ॥ ११ ॥ हृदय एक है, वह चेतना का स्थान है ॥११॥ दश प्राणायतनानि । तद्यथा- मूर्धा कण्ठो हृदयं नाभिः गुदं बस्ति- रोजः शुक्र शोणितं मासमिति । तेषु षट् पूर्वाणि मर्मसंख्यातानि ॥१२॥ प्राण के आयतन स्थान दस है। यथा-मूर्द्धा ( सिर ), कण्ठ, हृदय, नाभि, गुदा ( मलाशय ), बस्ति ( मूत्राशय ), ओज, शुक्र, रक्त और मास । इनमें प्रथम छ मर्म गिने जाते हैं॥ ॥१२॥ पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि । तद्यथा - नाभिश्च, हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च, प्लीहा च, वृक्कौ च, बस्तिश्च, पुरीषाधारश्च, आमाशयश्च, पक्वाशयश्च, उत्तरगुदं च, अधरगुदं च, क्षुद्रान्त्र च, स्थूलान्त्र च, वपावहनं चेति ॥१३॥ कोष्ठ के पन्द्रह अग है। जैसे- नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत, प्लीहा, बुक्क ( वृक्क, गुर्दे ) बस्ति, पुराषाधार ( मलाशय ), आमाशय, पक्वाशय, उत्तर गुदा, अधरगुदा, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र और वपावहन ॥ १३ ॥ ❄ दश प्राणायतनीय अध्याय में - दो शंख, तीन मर्म, कण्ठ, रक्त, शुक्र, ओज और गुदा ये दस गिने हैं। नाभि और मास के गिनने से ये भी मर्म प्राणायतन मानने चाहियें। यहा पर शंख नहीं गिना ।

९४ चरकसंहिता [अ० ७ षट्पञ्चाशत् प्रत्यङ्गानि षट्स्वङ्गेषूपानिबद्धानि यानि यान्यपरिसं- ख्यातानि पूर्वमङ्गेषु परिसंख्यायमानेषु तानि तान्यन्यैः पर्यायैरिह प्रकाश्य व्याख्यातानि भवन्ति । तद्यथा—द्वे जङ्घापिण्डिके, द्वे ऊरु पिण्डिके, द्वौ स्फिचौ द्वौ वृषणौ, एक शेफ, द्वे उखे, द्वौ वङ्क्षणौ, द्वौ कुकुन्दरौ, एकं बस्तिशीर्ष, एकमुदर, द्वौ स्तनौ, द्वौ भुजौ१, द्वे बाहु- पिण्डिके, चिबुकमेक, द्वावोष्ठौ, द्वे सृक्किण्यौ, द्वौ दन्तवेष्टकौ, एकं तालु, एका गलशुण्डिका, द्वे उपजिह्विके, एका गोजिह्विका, द्वौ गण्डौ, द्वे कर्णशष्कुलिके, द्वौ कर्णपुत्रकौ, द्वे अक्षिकूटे, चत्वारि अक्षिवर्त्मानि, द्वे अक्षिकनीनिके, द्वे भ्रुवौ, एकोऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि ॥१४॥ प्रत्यंग ५६ हैं । ये प्रत्यंग उपरोक्त छः अगों मे सम्बद्ध है । आगे कहे जाने वाले ५६ प्रत्यग पूर्वोक्त हाथ आदि छः पूर्व गिने हुए अङ्ग से सम्बद्ध है, उन असख्य प्रत्यंगों को अन्य अन्य पर्यायों से कहा जाता है जैसे—दो जंघा की पिण्डिकायें, दो टागों की पिण्डिकाये, दो नितम्ब (कूल्हे), दो वृषण, एक लिंग, कक्षा के पार्श्वों में दो कक्षाये, दो वक्षण (काखे), दो कुकुन्दर (नितम्ब के ऊपर उन्नत भाग), एक बस्ति का शीर्ष, एक उदर, दो स्तन, कण्ठ के पार्श्व मे स्थित दो कठिन भाग, दो बाहु-पिण्डिकाये, एक ठोडा, दो ओठ, दो सृक्किणी (ओठो के प्रान्त), दो मसूड़े, एक तालु, एक गलशुण्डी, दो उपजि- ह्विका, एक गोजिह्विका, दो गण्ड, दो कर्ण-शष्कुली, दो कर्णपुत्रक (कान का लटकन), दो अक्षिकूट, चार आख के पलक, दो आख की कनीनिका, दो भ्रुवे, एक अवटु (घाटा), पाव और हाथ के चार तलुवें, ये ५६ प्रत्यग है ॥१४॥ नव महान्ति छिद्राणि-सप्त शिरसि, द्वे चाधः, एतावद् दृश्यं शक्य- मभिनिर्देष्टुम् ॥ १५ ॥ नौ महान् छिद्र हैं। जैसे—सात शिर में (दो आख, दो कान, दो नाक और एक मुख) और दो छिद्र अधोभाग में (गुदा और उपस्थ के) । ये त्वग् आदि प्रायः सब आखों से दीखते हैं। इनको स्पष्ट बतलाया जा सकता है ॥१५॥ अनिर्देश्यमतः परं तर्क्यमेव । तद्यथा—नव स्नायुशतानि, सप्त सिराशतानि, द्वे धमनीशते, चत्वारि पेशीशतानि, सप्तोत्तरं मर्मशत, द्वे पुनः संधिशते, एकोनत्रिंशत्सहस्राणि२ नव च शतानि षट्पञ्चाश- त्कानि सिराधमनीनामणुशःप्रविभज्यमानानां मुखाग्रपरिमाणं, तावन्ति १. 'द्वौ श्लेष्मभुवौ' इति च पाठः । २ 'एकोनत्रिंशत्' इति च पाठः ।

अ० ७ ] शारीरस्थानम् ६५

अ० ७ ] शारीरस्थानम् ६५ चैव केश-श्मश्रु-लोमानीत्येतद्यथावत्संसंख्यात त्वक्प्रभृति दृश्यं, अतः पर तर्क्यम् । एतदुभयमपि न विकल्प्यते प्रकृतिभावाच्छरीरस्य ॥ १६ ॥ इसके आगे जो देखी नहीं जा सकतीं, वा दिखलाई नहीं देतीं वे सब अनि र्देश्य हैं। अतः उनको अनुमान द्वारा ही जाना जाता है। जैसे—९०० स्नायु, ७०० सिराये, २०० धमनियां, ४०० पेशिया, १०७ मर्म, २०० सन्धिया, २६- ६५६ सिरा-धमनियों के मुखो के अग्रभाग और इतने ही २६६५६ केश, श्मश्रु और शरीर के बाल हैं। ये यहा ठीक २ प्रकार से गिना दिये गये। इनमे त्वचा आदि दृश्य है। इसमे आगे सब अनुमान गम्य हैं। यह दृश्य और तर्क्य दोनों प्रकार का मान शरीर के अविकृत होने से विकल्पित नहीं होता। शरीर के विकृत होने पर त्वचा आदि का मान भी विकृत हो जाता है ॥ १६ ॥ यत्त्वञ्जलिमख्येयं तदुपदेक्ष्यामः, तत्पर प्रमाणमभिज्ञेयं, तच्च वृद्धि ह्रास-योगि, तर्क्यमेव । तद्यथा—दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेना- ञ्जलिप्रमाणे न यत्तत् प्रच्यावमानं पुरीषमनुबध्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून, यत्तत् सर्वशरीरचरं बाह्याऽत्वग्बिभर्ति, यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्द लभते, यच्चोष्मणाऽनुबद्ध लोमकू- पेभ्यो निष्पतत्स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणम् । नवाञ्ज- लयः पूर्वस्याऽऽहार-परिणाम-धातोर्यं त रस इत्याचक्षते, अष्टौ शोणि- तस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो वसायाः, द्वौ मेदसः, एको मज्ज्ञः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य ताव- देव प्रमाणं, तावदेव श्लेष्मणश्चौजस इत्येतच्छरीरतत्त्वमुक्तम् ॥ १७ ॥ शरीर में जो वस्तु अञ्जलि से मापने योग्य है उसका वर्णन करते हैं। इस परिणाम की वृद्धि या ह्रास भी अनुमान द्वारा ही जाना जाता है। प्रत्येक मनुष्य की अपनी अञ्जलि की अपेक्षा से शरीर के अन्दर उदक की मात्रा दस अञ्जलियां है। यह जल अधिक होने पर पुरीष के साथ, मूत्र, रक्त और शरीर के अन्य धातुओं के साथ मिल कर बाहर आता है और जो जल त्वचा के अन्दर व्रण मे पहुचाता है, उसे 'लसीका' कहते है और जो जल शरीर की गरमी के साथ मिल कर लोम कूपों से निकलता है, उसे 'स्वेद' कहते हैं। यह सब जल दस अंजलि परिमाण है। आहार के प्रथम परिणाम धातु रस की नौ अजलिया हैं। रक्त की आठ अजलियां हैं। मल की सात, कफ की छः, पित्त की पाच, मूत्र की चार, वसा की तीन, मेद की दो मज्जा की एक, मस्तिष्क की आधी अंजलि, शुक्र की भी आधी अंजलि और

९६ चरकसंहिता [ अ० ७ कफ और ओज की भी आधी २ अञ्जलि है। इस प्रकार से शरीर के तत्त्व कह दिये ॥ १७ ॥ तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद् गुरु-खर-कठिनमङ्गं नखास्थि- दन्तवेष्ट-मांस-चर्म-वर्चः-केश-श्मश्रु-लोम-कण्डरादि तत्पार्थिवं गन्धो घ्राणं च, यद्-द्रव-सर-मन्द स्निग्ध-मृदु-पिच्छिलं रस-रुधिर-वसा-कफ- पित्त-मूत्र स्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च । यत्पित्तमूष्मा यो या च भाः शरीरे, तत्सर्वमाग्नेय रूपं दर्शनं च, यदुच्छ्वास-प्रश्वासोन्मेष-निमेषा- कुञ्चन-प्रसारण-गमन-प्रेरण-धारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च, यद्वि- विक्तमुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि, तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च । यत्प्रयोक्तृ तत्प्रधानं बुद्धिर्मनश्चेति शरीरावयवसंख्या यथास्थूलभेदेनाव- यवानां निर्दिष्टा ॥ १८ ॥ शरीर में जो अंग विशेषत स्थूल, स्थिर, कठिन, गुरु, खर, कठोर हैं, नख, अस्थि, दन्तवेष्ट मास, चर्म, वर्चस्, केश, श्मश्रु, लोम, कण्डरा आदि यह तथा गन्ध और नासिका यह सब पार्थिव अग हैं। जो भाग द्रव, सर, मन्द, स्निग्ध, मृदु, पिच्छिल, रस, रुधिर, बसा, कफ, पित्त, मूत्र, स्वेद आदि तथा रस और जिह्वा यह सब जलीय अश हैं। जो पित्त, गरमी, शरीर में जो कान्ति रूप और आख है वह अग्न के अश हैं। जो उच्छ्वास, प्रश्वास, उन्मेष निमेष, आकुञ्चन, प्रसारण, गमन, प्रेरण, धारण आदि कर्म तथा स्पर्श और त्वचा हैं, यह सब वायु के अश है। शरीर में जो छेद महान् या सूक्ष्म हैं, ये सब प्रकार के स्रोतस्; शब्द और कान हैं यह आकाश के अश हैं। जो इनका प्रयोग करता है, वह प्रधान बुद्धि और मन हैं यह शरीर के अवयवों की सख्या स्थूल दृष्टि भेद में अवयवों की सख्या कह दी गई है ॥ १८ ॥ शरीरावयवास्तु परमाणुभेदेनापरिसंख्येया भवन्त्यतिबहुत्वाद्- तिसौक्ष्म्यादतीन्द्रियत्वाच्च । तेषां सयोगविभागे परमाणूनां कारणं वायु. कर्म स्वभावश्च ॥ १९ ॥ शरीर के अवयव परमाणु भेद से असख्य हैं। क्योकि बहुत अधिक हैं, वे अति सूक्ष्म होने से वा अतीन्द्रिय होने से असख्य हैं। शरीर के इन परमा- णुओं के संयोग और विभाग में कारण वायु, कर्म और स्वभाव है ॥ १९ ॥ तदेतच्छरीरं संख्यातमनेकावयवं दृष्टमेकत्वेन सङ्गः, पृथक्त्वेनाप- वर्गः। तत्र प्रधानमसक्तं सर्वसन्ताननिवृत्तौ निवर्त्तत इति ॥ २० ॥

अ० ८ ] ७ शारीरस्थानम् ६७

अ० ८ ] ७ शारीरस्थानम् ६७ इस संख्यात शरीर को जो वास्तव में अनेक अवयवों से युक्त है मोहवश एक रूप में देख कर सग-बुद्धि ( आसक्ति ) उत्पन्न होती है। एक रूप में शरीर को देख कर इसके उपकार में प्रवृत्ति नहीं होती है जिससे मनुष्य राग- द्वेष मे फस जाता है। शरीर को पृथक् २ अग २ रूप में समझने से ममता नहीं होती, इसी लिये प्रवृत्ति के शान्त होने पर धर्माधर्म के न होने से अपवर्ग होता है। प्रधान आत्मा, राग द्वेष से रहित है। वह सब प्रकार के उपकारक ओर अपकारक भावों से निवृत्त होकर ससार से भी निवृत्त-मुक्त हो जाता है॥२०॥ तत्र श्लोकौ—शरीरसंख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक्। तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते॥ २१॥ अमूढो मोहमूलैश्च न दोषैरभिभूयते। निर्दोषो निःस्पृहः शान्तः प्रशाम्यत्यपुनर्भवः॥ २२॥ जो भिषक् ( वैद्य ) शरीर के सम्पूर्ण अवयवो की सख्या जानता है, वह वैद्य मिथ्याज्ञान के कारण मोह में नही फँसता। ज्ञानी पुरुष मोह ( राग द्वेष ) के कारण दोषो से कभी भी पराजित नहीं होता। इसलिये दोषरहित, निःस्पृह होकर सब क्रियाओ के शान्त होने से शान्त हो जाता है फिर इसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥२१-२२॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरसंख्या- शारीर नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥

अष्टमोऽध्यायः।

अथातो जातिसूत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः॥ १॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः॥ २॥ अब इसके आगे 'जाति-सूत्रीय' नामक शरीर का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था॥ १-२॥ स्त्रीपुंसयोरव्यापन्न-शुक्र शोणित-गर्भाशययो श्रेयसीं प्रजामिच्छ- तोस्तदर्थामिनिर्वृत्तिकरं कर्मोपदेक्ष्यामः॥ ३॥ जिसके शुक्र में दूषण न हो ऐसा पुरुष और जिसके आर्त्तव और गभाशय मे दोष न हो ऐसी स्त्री जो श्रेष्ठ सतान की कामना करनेवाले हों उन स्त्री-पुरुषो के लिये गुणवती प्रजा के उत्पादक कर्मों का उपदेश करते हैं:—॥ ३ ॥

६८ चरकसंहिता [ अ० ८ अथाप्येतौ स्त्रीपुंसौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य क्रमेण प्रकृतिमापादयेत्, संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुप- चरेत्, उपचरेच्च मधुरौषधसंसृष्टाभ्यां घृतक्षीराभ्यां पुरुषं, स्त्रियं तु तैलमाषाभ्याम्¹ ॥ ४ ॥ उक्त गुणोंवाले पुरुष और स्त्री को वैद्य स्नेहन और स्वेदन कर्म कराके पीछे से वमन-विरेचन द्वारा शुद्ध करे। पीछे पेया आदि देकर क्रमश प्रकृति में लाये। इस प्रकार शुद्ध होने पर आस्थापन और अनुवासन कर्म करावे। मधुर औषधियों से संस्कृत या जीवनीय गण की औषधियों से घृत, दूध से पुरुष का, तथा तैल और माप ( उड़द की दाल ) से स्त्री को पुष्ट करे। [ पुरुष को सौम्य औषधियों से संस्कृत अन्न दे, क्योंकि पुरुष की प्रकृति सौम्य है, इसलिये शुक्र की वृद्धि होगी। स्त्री की प्रकृति उष्ण है, इसलिये उसको उष्ण पदार्थो से संस्कृत अन्न दे ] ॥ ४ ॥ रजस्वला के कर्त्तव्य— ततः पुष्पादप्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधःशायिनी पाणि- भ्यामन्नमजर्जरपात्रे² भुञ्जाना न च काञ्चिन्मृजामापद्येत, ततश्चतुर्थेऽ- हन्येनामुन्मद्य सशिरस्कं स्नापयित्वा शुक्लानि वासांस्याच्छादयेत्पुरुषं च ततः शुक्लवाससौ स्रग्विणौ सुमनसावन्योन्यमभिकामौ संवसेता- मिति ब्रूयात् ॥ ५ ॥ पुष्प दर्शन ( रजोदर्शन ) होने पर तीन रात तक स्त्री ( रजोधर्म के दिनों में ) ब्रह्मचर्य्य-व्रत का पालन करे ! जमीन पर सोये, न फूटे हुए बर्तनो में हाथों से भोजन करे, [ चम्मच आदि से भोजन न करे ] किसी भी प्रकार का शरीर पर भूषण या सजावट, स्नान-लेपन आदि नहीं करे। चौथे दिन ऋतु समाप्त होने पर भली प्रकार स्नान करे, शिर को भी साफ करे, श्वेत वस्त्र पहिने। पुरुष भी स्नान करके श्वेत वस्त्र ही पहिने। इसके अनन्तर स्त्री और पुरुष दोनों श्वेत वस्त्रों को पहिने हुए, मालाओं को धारण किये हुए, प्रसन्न मन, परस्पर की कामना करते हुए मथुन करे, वैद्य ऐसा उपदेश दे ॥ ५ ॥ स्नान के उपरान्त कर्त्तव्य— स्नानात्प्रभृति युग्मेष्वहःसु संवसेतां पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृ- कामौ ॥ ६ ॥ १. 'तैलमाषाभ्याम्' इति क्वचित् पाठः । २ 'अजर्जरात् पात्राद्' इति च पाठः ।

अ० ८ ] शारीरस्थानम् ६६

अ० ८ ] शारीरस्थानम् ६६ स्नान करने के उपरान्त पुत्र की कामना से युग्म (दूसरे, चौथ, छठे आदि) दिनो मे और कन्या की कामना से अयुग्म (पहले, तीसरे, पाचवे सातवें आदि) दिनो में मैथुन करे ॥ ६ ॥ गर्भाधान काल मे स्त्री की उचित स्थिति— न च न्युब्जां पार्श्वगता वा संसेवेत । न्युब्जाया वातो बलवान् स योनि पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा संच्युतोऽपिद्- धाति गर्भाशयं १, वामे पित्तं पार्श्वे । तस्याः पीडितं विदहति रक्त शुक्रम् । तस्मादुत्ताना सती बीजं गृह्णीयात् । तस्या हि यथास्थानमवतिष्ठन्ते दोषाः । पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत् । नीचे मुख की हुई, औंधी या पार्श्व में लेटी स्त्री के साथ सम्भोग नहीं करे क्योंकि अधोमुख स्थिति मे वायु बलवान् होता है, यह वायु योनि का पीड़न करता है । दक्षिण पार्श्व मे लेटने से श्लेष्मा (कफ) स्रवित होकर गर्भाशय को ढाप लेता है । वाम पार्श्व में लेटने से पित्त कुपित होकर रक्त और शुक्र को दूषित कर देता तथा उष्ण कर देता है । इसलिये स्त्री उत्तान पीठ के बल चित्त लेटकर बीज का योनि मे ग्रहण करे । इस स्थिति में दोष वात आदि अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहते हैं । मैथुन की समाप्ति पर स्त्री को शीतल जल से स्नान करावे । तत्रात्यशिता क्षुधिता पिपासिता भीता विमनाः शोकार्ता क्रुद्धाऽन्य च पुमांसमिच्छन्ती मैथुने चातिकामा वा नारी न गर्भं धत्ते । विगुणां वा प्रजा जनयति । अतिबालामतिवृद्धां दीर्घरोगिणीमन्येन वा विकारे णोपसृष्टा वर्जयेत् । पुरुषेऽप्येत एव दोषाः । गर्भाधान के अयोग्य स्त्री-पुरुष—बहुत भोजन करने पर, भूखे होने पर, प्यास लगी होने पर, डरी होने पर, मन प्रसन्न न होने पर या अन्य वस्तु में मन लगे होने पर, शोकयुक्त, क्रुद्ध, अन्य पुरुष को चाहने वाली, अधिक सम्भोग को चाहने वाली स्त्री गर्भ धारण नही करती । यदि भाग्य से गर्भ रह भी जाये तो गुणरहित सन्तान उत्पन्न होती है । इसी प्रकार बहुत छोटी आयु वाली, अति वृद्ध, चिरकाल से रोगिणी, अथवा अन्य किसी रोग से आक्रान्त स्त्री को भी गर्भाधान क्रिया मे अयोग्य जानना चाहिये । इसी प्रकार के पुरुष भी गर्भाधान क्रिया में अयोग्य होते हैं । १. 'गर्भं' इति च पाठः ।

१०० चरकसंहिता [ अ० ८

अतः सर्वदोषवर्जितौ स्त्री पुरुषौ संसृज्येयाताम् । संजातहर्षों मैथुने
चानुकूलाविष्टगन्धं स्वास्तीर्णं सुखं शयनमुपकल्प्य मनोज्ञं हितमशन-
मश्शित्वा नात्यशितौ । दक्षिणपादेन पुमान् वामपादेन स्त्री चारोहेत् ।
तत्र मंत्रं प्रयुञ्जीत—
गर्भाधान के नियम—इसलिये सब प्रकार के दोषों से रहित स्त्री और पुरुष
ही गर्भाधान करे । मैथुन की इच्छा उत्पन्न होने पर प्रसन्न चित्त, अनुकूल
सुगन्धि से युक्त, मन के अनुकूल, स्वच्छ, बिछे बिस्तर पर, हितकारी भोजन
खा कर, दक्षिण पाव को पुरुष और वाम पाव को स्त्री प्रथम रख कर शय्या
पर चढे । वे दोनों भोजन बहुत अधिक न खावें । इस समय निम्नलिखित
मन्त्र बोले ।
अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि ।
धाता त्वा दधातु विधाता त्वा दधातु
ब्रह्मवर्चसा भवेदिति ॥ १ ॥
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ ।
भगोऽथ मित्रावरुणौ पुत्र वीरं दधातु मे ॥ २ ॥
मन्त्रार्थ—तू अहि है, तू आयु है, तू सब स्थान मे प्रतिष्ठित है, धाता,
तुझे धारण करे, विधाता तुझको धारण करे, तू ब्रह्म तेज से युक्त हो ॥ १ ॥
ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, दोनों अश्वी, भग, मित्र और वरुण
मुझको वीर पुत्र धारण करावें ॥ २ ॥
इत्युक्त्वा संवसेताम् ॥ ३ ॥
यह मन्त्र पढ़ कर वे दोनों मैथुन कर्म करे ॥ ३ ॥
सा चेदेवमाशासीत बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विन शुचि सत्त्वसंपन्नं
पुत्रमिच्छेयमिति शुद्धस्नानात्प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिर्भ्यां
संसृज्य श्वेताया गोः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कांस्ये वा
पात्रे काले काले सप्ताहं सतत प्रयच्छेत्पानाय, प्रातश्च शालियवान्नवि-
कारान् दधि-मधु सर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायमाव-
दात-शरण-शयनासन यान-वसन-भूषणा च स्यात्, साय प्रातश्च शश्व-
च्छुश्वेतं महान्तमृषभमाजानेयं हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत्, सौम्याभिश्चैनां
कथाभिर्मनोऽनुकूलाभिरुपासीत, सौम्याकृति-वचनोपचार-चेष्टांश्च स्त्री-
पुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत्, सहचर्यश्चैनां प्रियहि-
ताभ्यां सततमुपचरेयुः तथा भर्ता । न च मिश्रीभावमापद्येयाताम् ।

अ० ८] शारीरस्थानम् १०१

अ० ८] शारीरस्थानम् १०१ पुत्रेष्टि—यदि स्त्री चाहे कि मेरा पुत्र बड़ा शुद्ध चरित्र, प्रतिभाशाली, सिंह के समान पराक्रमी, पवित्र और बलसम्पन्न हो तो—ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करने पर लगातार सातदिनों तक समय २ पर [ प्रातः सायं दोनों समय ] स्त्री शुद्ध साफ ( तुषों से रहित ) किये जौ के मन्थ को मधु और घी में मिला कर श्वेत सुन्दर बछड़े वाली श्वेत गाय के दूध में घोल कर चांदी या कांसे के पात्र में खावे और प्रातःकाल हेमन्त-धान्य ( चावल ) तथा जौ से बने खाद्य पदार्थों को दही, मधु और घी के साथ अथवा दूध के साथ मिलाकर खाना चाहिये । और सायंकाल निर्मल घर, बिस्तर, आसन, वस्त्र और भूषणों का उपयोग करे । सायं प्रातः निरन्तर, श्वेत, बड़े, अच्छी नस्ल के, श्वेत चन्दन से लिप्त अंगों वाले बैल का दर्शन करे, सौम्य एव मनोहर अनुकूल कथाओं द्वारा पुरुष स्त्री को प्रसन्न करे । वह स्त्री सौम्य आकृति वाली, सौम्य वचन, सौम्य आचार और सौम्य चेष्टा वाले स्त्री पुरुषों को तथा अन्य इन्द्रियों के निर्मल ग्राह्य पदर्थों को देखे । इस स्त्री की प्रिय और हितकारी बातों से सहेलियां सदा सेवा करती रहें । इसी प्रकार पति भी अपना आहार-विहार करे । वे दोनो इस अवसर में सम्भोग न करें ॥ इत्यनेन विधिना सप्तरात्रं स्थित्वाऽष्टमेऽहन्याप्लुत्याद्भिः सशिरस्कं भर्त्रा सह चाहनानि वस्त्राण्याच्छादयेदवदातानि । अवदाताश्च स्रजो भूषणानि बिभृयात् ॥ ७ ॥ इस प्रकार उपरोक्त विधि से सात रात तक रह कर आठवें दिन पति के साथ शिर आदि सब अंगों सहित स्नान करके पवित्र, नये निर्मल वस्त्रों को धारण करे । वे सुन्दर माला और आभूषणों को धारण करें ॥ ७ ॥ तत ऋत्विक्प्रागुत्तरस्या दिश्यागारस्य प्राक्प्रवणमुदक्प्रवणं वा प्रदेशमभिसमीक्ष्य गोमयोदकाभ्यां स्थण्डिलमुपसलिप्य, प्रोक्ष्य चोदकेन वेदिमस्मिन् स्थापयेत् । तां पश्चिमेनानाहतवस्त्रसंचये श्वेतार्षभे वाऽप्य- जिन उपविशेत् ब्राह्मणप्रयुक्तः, राजन्यप्रयुक्तस्तु वैयाघ्रे चर्मण्यानुडुहे वा, वैश्यप्रयुक्तस्तु रौरवे बास्ते वा । तत्रोपविष्टः पालाशीभिरैङ्गुदीभिरौ- दुम्बरीभिर्माधूकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय, कुशैः परिस्तीर्य, परिधिश्च परिधाय, लाजैः शुक्लाभिश्च गन्धवतीभि सुमनोभिरुपा- किरेत् । तत्र प्रणीतोदपात्रं पवित्रं पूतमुपसंस्कृत्य सर्पिराज्यार्थं यथोक्त- वर्णोनाजानेयादीन् समन्ततः स्थापयेत् ।

१०२ चरकसंहिता [अ० ८ इसके पश्चात् यज्ञ कराने वाला ऋत्विग् घर के पूर्व या उत्तर दिशा में अथवा पूर्व या उत्तर की ओर को ढाल लिये देश को देख कर उसे गोबर से लेप कर स्थान तैयार करे । इस स्थान को पानी छिड़क कर यहा पर बेदी का स्थापन करे । वेदी की पश्चिम दिशा में नूतन वस्त्रो की बनी गद्दी पर अथवा श्वेत बैल के चर्म पर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण बैठे । यदि पुत्रेष्टि के लिये क्षत्रिय यज्ञ करा रहा हो तो वह व्याघ्र के या वैल के चर्म पर बैठे, वैश्य द्वारा प्रयुक्त हो तो रुरु (मृग) के या बकरे के चर्म पर बैठे । वहा बैठकर ढाक, इगुदी (हिंगोट), गूलर और महुवा की समिधाओं से अग्नि को प्रज्वलित करके, चारों ओर कुशाओं को बिछा कर परिविधा (केले के चार खम्बे) लगा कर, लाजा डाल कर, सफेद लाजा और गन्ध वाले फूलो को वेदी के चारो ओर बिखेर देवे । इसके पीछे मन्त्र से पवित्र जल पात्र को रख कर पवित्र, उपसस्कृत मन्त्र आदि से संस्कृत घी को यज्ञ के लिये रक्खे और उत्तम वर्ण के उत्तम तथा नस्ल के बैलो आदि को भी चारों ओर बैठवादे ॥ ७ ॥ ततः पुत्रकामा पश्चिमोऽग्नि दक्षिणतो ब्राह्मणमुपविश्यानुलभेत सह भर्त्रा यथेष्टं पुत्रमाशासाना, ततस्तस्या आशामानाया ऋत्विक् प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्या कामपरिपूरणार्थं काम्यामिष्टिं निर्व- पेत् 'विष्णुर्योनिं कल्पयतु' इत्यनया ऋचा, ततश्चैवाऽऽज्येन स्थालीपा कमभिघार्य त्रिर्जुहुयात्, यथाम्नाय चोपमंत्रितमुदकपात्र तस्यै दद्या- त्सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति । इसके पीछे पुत्र की कामनावाली स्त्री अग्नि के पश्चिम में और ब्राह्मण के दक्षिण में बैठ कर पति के साथ यथेष्ट पुत्र की कामना करती हुई समस्त विधि करे। स्त्री के यथेष्ट पुत्र की कामना करते हुए ऋत्विक् प्रजापति को लक्ष्य करके, स्त्री के गर्भ मे उसकी इच्छा परिपूर्ण होने के अर्थ और गर्भ स्थिर रहने के लिये पुत्र काम्येष्टि करे । वह 'विष्णुर्योनिं कल्पयतु'०*इस मन्त्र से आहुति करे। इसके पीछे घी से स्थालीपाक का सचन कर शास्त्रानुसार तीन आहुति देवे । उपमन्त्रित जलपात्र उस स्त्री को देवे और आदेश कर दे कि सब जल के कार्य तू इसी पानी से कर । ततः समाप्ते कर्मणि पूर्वं दक्षिणपादमभिहरन्ती प्रदक्षिणमग्निमनु- परिक्रामेत्, ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा सह भर्त्राऽऽज्यशेषं प्राश्नी- यात् । पूर्वं पुमान् पश्चात्स्त्री। न चाऽच्छिष्टमवशेषयेत् । ततस्तौ सह संव- सेतामष्टरात्र तथाविधपरिच्छदावेव च स्यातां, तथेष्टपुत्र जनयेताम् ॥८॥

  • विष्णुर्योनिं कल्पयतु० ऋग्वेद मण्डल १० । सू० १८४ । १ ॥

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०३

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०३ पुत्रेष्टि यज्ञ की विधि समाप्त होने पर प्रथम दक्षिण पाव को आगे रख कर स्त्री अग्नि की प्रदक्षिणा करे। इसके पीछे ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराके पति के साथ अवशिष्ट आज्यशेष (बचा हुआ घी) खावे। इसमे भी पहिले पुरुष खाये और पीछे स्त्री। अवशिष्ट कुछ भी शेष न रक्खे। दोनो परस्पर अगले आठ रात्रि शयन करे। जिस प्रकार के पुत्र को कामना हो उसी प्रकार के ( वर्ण ) के वस्त्र पहिने। इससे मनोवाञ्छित सतान उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥ या तु स्त्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहु च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्णं कृष्ण-मृदु-दीर्घ-केशं शुक्लाक्षं शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्मव- न्तम्। एष एवानयोरपि होमविधिः। किंतु परिवर्हवर्ज्यं स्यात्, पुत्रव- र्णानुरूपस्तु यथाशीः परिवर्होऽन्यः कार्यः स्यात् ॥ ६ ॥ जो स्त्री काले, लाल आखों वाले, चौड़ा छाती और विशाल बाहु वाले पुत्र की कामना करे, अथवा काले रग के, काले, कोमल लम्बे २ बालों वाले, सफेद आख के, सफेद दातों वाले, तेजस्वी और जितेन्द्रिय पुत्र को चाहे तो इन दोनों के लिये भी यही विधि है। किन्तु शयन, आसन, पुष्प आदि परिच्छद भिन्न हैं। जैसे वर्ण के पुत्र की चाह हो वैसा ही परिच्छद पोशाक और बिछावन करे। इष्ट पुत्र के वर्ण के अनुरूप सब वस्त्रादि होना चाहिये ॥ ६ ॥ शूद्रा तु नमस्कारमेव कुर्याद्देवाग्नि द्विज गुरु-तपस्वि-सिद्धेभ्यः ॥१०॥ शूद्रा स्त्री मन्त्र-विधि से होम न करके देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, सिद्ध और तपस्वियों को नमस्कार मात्र ही करे [ क्योंकि शूद्रा मूर्ख होने से यज्ञादि ठीक प्रकार से करने मे असमर्थ होती है ] ॥ १० ॥ या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां तां पुत्राशिष- मनुनिशम्य तान्तान् जनपदान् मनसाऽनुपरिक्रामयेत् । ताननुपरिक्रम्य या या येषां येषा जनपदाना मनुष्याणामनुरूप पुत्रमाशासीत सा सा तेषा तेषां जनपदानामाहार-विहारोपचार-परिच्छदाननुविधत्स्वेति वाच्या स्यात्। इत्येतत्सर्वं पुत्राशिषा समृद्धिकर कर्म व्याख्यातं भवति ॥११॥ जो जो स्त्री जिस जिस प्रकार के पुत्र की इच्छा करे उस उस की उस उस प्रकार के पुत्र की इच्छा को सुन कर उन नाना जनपदों में उस स्त्री को मन द्वारा भ्रमण करावे, उनका अनेक बार चिन्तन कराये। जो जो स्त्री जिन २ जनपदों के राष्ट्रनिवासियोँ के सदृश पुत्र को चाहे वह इन देशवासियों जैसा जैसा आहार-विहार, उपचार, परिच्छद आदि करते हैं वैसा

१०४ चरकसंहिता [ अ० ८ करने को कहे । यह सब पुत्र को चाहने वाली स्त्रियों के आशानुरूप समृद्धि करने वाले पुत्र के अनुकूल कर्म का उपदेश कर दिया है ॥ ११ ॥ न तु खलु केवलमेतदेव कर्म वर्णवैशेष्यकरं भवति, अपि खलु तेजोधातुरप्युदकान्तरिक्ष-धातु-प्रायोऽवदात-वर्णकरो भवति । पृथिवी- वायु-धातु-प्रायः कृष्णवर्णकरः सम-सर्व धातु-प्रायः श्यामवर्णकरः ॥१२॥ केवल इतना ही कर्म वर्ण की विशेषता को उत्पन्न नहीं करता । बल्कि तेजो धातु, जल और अन्तरिक्ष धातु अधिक मात्रा में वर्ण को चमकीला, स्वच्छ कान्तिमान् बनाते हैं। यही तेजो धातु पृथ्बी, वायु की अधिकता के कारण वर्ण को काला कर देता है । सब धातुओं की समान मात्रा वर्ण को श्याम (सावला) करती है ॥ १२ ॥ सत्त्ववैशेष्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्व- ल्न्याः श्रुतयश्चाभीक्ष्णं स्वोचितं च कर्म सत्त्वविशेषाभ्यासश्चेति ॥१३॥ उन उन प्राणियों के माता पिता के सत्त्व, गर्भिणी का सत्त्व, बार बार बातों का सुनना, गर्भ के पूर्व जन्म के सचित कर्म, जन्मान्तर में जिस प्रकार के सत्त्व का पुरुष अभ्यास करता है यह बातें सत्त्व (मन) की विशेषता को उत्पन्न करती हैं ॥ १३ ॥ यथोक्तेन विधिनोपसंस्कृतशरीरयोः स्त्रीपुरुषयोर्मिश्रीभावमापन्नयो शुक्रं शोणितेन सह समेत्याव्यापन्नमव्यापन्नेन योनावानुपहतायामप्रदुष्टे- गर्भाशये गर्भमभिनिर्वर्तयत्येकान्तेन । तद्यथा निर्मले वाससि सुपरि- कल्पिते रञ्जनं समुदितगुणमुपनिपातादेव रागमभिनिर्वर्तयति, तद्वत् । यथा वा क्षीरं दध्नाऽभिषुतमभिषवणाद्विहाय स्वभावमापद्यते दधि- भावं शुक्रं तद्वत् ॥ १४ ॥ उपरोक्त विधि के अनुसार संस्कृत शरीर वाले स्त्री पुरुषों के परस्पर सयुक्त होने पर शुक्र आर्तव के साथ मिल कर निर्दोष शुक्र निर्दोष आर्तव से, नीरोग- स्वस्थ योनि में मिल कर, निर्दोष गर्भाशय में-सम्पूर्ण रूप में गर्भ को बनाता है। जिस प्रकार निर्मल, स्वच्छ, अच्छी प्रकार से धोये वस्त्र पर थोड़ा सा भी उत्तम रंग गिरने पर रंग चढ़ा देता है, उसी प्रकार शुद्ध निर्मल गर्भाशय में निर्दोष शुक्र आर्तव से मिल कर गर्भ को उत्पन्न कर देता है। जिस प्रकार थोड़ी सी दही, बहुत से दूध के साथ मिल कर उसको भी दही रूप में कर देती है, उसी प्रकार थोड़ा सा शुक्र भी गर्भ को स्वभावतः उत्पन्न कर देता है ॥ १४ ॥ एवमभिनिर्वर्त्तमानस्य गर्भस्य स्त्रीपुरुषत्वे हेतुः पूर्वमुक्तः ॥ १५ ॥

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०५

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०५ यथा हि बीजमनुपतप्तमृत्तं स्वा स्वां प्रकृतिमनुविधीयते व्रीहिर्वा व्रीहित्वं यवो वा यवत्वं तथा स्त्रीपुरुषावपि यथोक्तं हेतुविभागमनु- विधीयेते ॥ १६ ॥ इस प्रकार से बनते हुए गर्भ में कन्या या पुत्र की उत्पत्ति का कारण हमने प्रथम ही कह दिया है । [ रक्त की अधिकता से कन्या और शुक्र की अधिकता से पुत्र उत्पन्न होता है । ] जिस प्रकार निर्दोष अथवा दूषित बीज अपनी अपनी प्रकृति का अनुसरण करके धान्य से धान्य और जौ के बीजों से जौ को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार कन्या और पुत्र की उत्पत्ति मे भी स्त्री और पुरुष अपने २ कारणानुसार कार्य करते हैं ॥ १५-१६ ॥ तयोः कर्मणा वेदोक्तेन विवर्तनमुपदिश्यते प्राग्व्यक्तीभावात् प्रयु- ञ्जीत सम्यक् । कर्मणां हि देशकालसंपदुपैताना नियतमिष्टफलत्वं, तथेतरेषामितरत्वम् । तस्मादापन्नगर्भा स्त्रियमभिसमीक्ष्य प्राग्व्यक्ती- भावाद् गर्भस्य पुसवनमस्यै दद्यान्—गोष्ठे जातस्य न्यग्रोधस्य प्रागु- त्तराभ्या शाखाभ्यां शुङ्गे अनुपहते आदाय द्वाभ्या धान्यमाषाभ्यां सपदुपैताभ्या वा सह दधिन प्रक्षिप्य पुष्ये पिबेत्, तथैवापराज्जी वकर्षभकापामार्ग-सहचर-कल्काश्च युगपदेकैकशो यथेष्ट वाप्यु- पसस्कृत्य पयसा, कुड्यकीटकं मत्स्यकोद्र चोदकाञ्जलौ प्रक्षिप्य पुष्ये पिबेत्, तथा कनकभयान् राजतानायसांश्च पुरुषकानग्निवर्णानणुप्रमाणान् दध्रि पयस्युदकाञ्जलौ वा प्रक्षिप्य पिबेदनवशेषतः पुष्येण, पुष्येणैव च शा- लिपिष्टस्य पच्यमानस्योष्माणमुपाघ्राय तस्यैव च पिष्टस्योदकसंसृष्टस्य रस देहलीमपनिधाय दक्षिणे नासापुटे स्वयमासिञ्चेत्पिचुना । इति पुस- वनानि। यच्चान्यदपि ब्राह्मणा ब्रूयुराप्ता वा पुसवनमिष्ट तच्चानुष्ठेयम्॥१७॥ पुंसवन विधि—वेदोक्त कर्म के अनुसार ठीक प्रकार से कार्य अनुष्ठान करने या भेदक लक्षणो के उत्पन्न होने से पूर्व ही लिंगादि मे परिवर्त्तन करना सम्भव है । उत्तम गुणयुक्त देश, काल में किये कर्मों मे इष्ट फल अवश्य प्राप्त होता है । उत्तम देश काल के गुणों से रहित कर्मों मे इष्ट फल नहीं मिलता । इस लिये स्त्री में गर्भ रहने पर गर्भ के लक्षणों के स्पष्ट होने से पूर्व ही गर्भ में पुसवन करने का प्रयोग करना चाहिये । [गर्भ के लिंग विभेदकलक्षण दूसरे महीने मे स्पष्ट होते हैं । अतः दूसरे मास से पूर्व पुंसवन कर्म का प्रयोग करे ] (१) गौओं के बैठने के स्थान में लगे बड़ वृक्ष की उत्तर और पूर्व की दिशा की ओर लगी दो शाखाओं से दो शुंग (फुनगो) तोड़ कर उत्तम गुण वाले उड़द

१०६ चरकसंहिता [ अ० ८ या श्वेत सरसों के दो दो दानों के साथ दही में मिलाकर पुष्य नक्षत्र में पान करे १। (२) दूसरी विधि—जीवक, ऋषभक, अपामार्ग, सहचर इनके कल्क को सब के साथ अथवा अलग अलग दूब के साथ इच्छानुसार सस्कृत कर लेना चाहिये । फिर कुड्य कीट ( भित्तिमत्स्य )२, मत्स्यकोड्र ( मत्स्यक ), इनको चुल्लू भर पानी में मिला कर पुष्य नक्षत्र में पीना चाहिये । ( ३ ) तीसरी विधि—स्वर्ण, चांदी या लोहे से बहुत सूक्ष्म मनुष्य की आकृति बना कर आग में लाल करके, दही दूब या चुल्लू भर पानी में बुझाना चाहिये । फिर पुष्य नक्षत्र मे इसका सम्पूर्ण रूप में पा लेना चाहिये । ( ४ ) चतुर्थ विधि—पुष्य नक्षत्र में ही पकते हुए शाली के आटे की गरमी को सूघ कर और उसी चून को जल में मिला कर उसके रस को देहली पर शिर रख कर अपने दक्षिण नासापुट में रुई के फाये द्वारा सिंचन करे ( जिससे कि मुख म आ जाये ) । यह पुसवन के अनेक प्रकार हैं । इनके अतिरिक्त और भा जिस २ पुसवन या इष्ट कर्म का ब्राह्मण या वृद्ध विद्वान् उपदेश करे उनको भी करे ३ ( जसे— लक्ष्मणा ओषधि के रस को दक्षिण नासा पुट में डालना आदि ) ॥ १७ ॥ अत ऊर्ध्वं गर्भास्थापनानि व्याख्यास्यामः—ऐन्द्री-ब्राह्मी-शतवीर्या- सहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथा शिवा-बलाऽरिष्टा-वात्यपुष्पी-विष्वक्सेनका- न्ता च । आसामोषधीनां शिरसा दक्षिणेन पाणिना धारण, एताभिश्चैव सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानं, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नान, सदा समालभेत च ताः, तथा सर्वासां जीवनीयाक्तानामोषधीनां सदोपयो- गस्तैस्तैरुपयोगविविभिः । इति गर्भास्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति १८ इसके आगे गर्भास्थापन विधियों का उपदेश करते हे--ऐन्द्री, ब्राह्मी, शत- वीर्या, सहस्रवीर्या ( दूब के भेद ), अमोघा ( पाटला ), अव्यथा ( गिलोय ) शिवा ( हरीतकी ), अरिष्टा ( कटुरोहिणी ), वात्यपुष्पा ( पीतवला ), विष्व- क्सेनकान्ता ( प्रियंगु ), इन ओषधियों को शिरमें तथा दक्षिण हाथ में धारण करना चाहिये । इन ओषधियो से सस्कृत दूध वा घी का पान करना चाहिये । इन ओषधियों के क्वाथ से प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में स्नान करना चाहिये । इन १ धान्यमाष शब्देन—ब्रीहि माष ग्राह्यन्ति, स्वर्णमाष च व्यावर्त- यन्ति । चक्रपाणि । २ कुड्यकीट—दिवार में मिट्टी से जो कीड़ा घर बनाता है, ३ गर्भाधान और पुसवन विधि के लिये सस्कारविधि तथा बृहदारण्यकोप- निषद में पुत्रेष्टि-प्रकरण ( बृहद्० उप० अ० ६ । ब्रा० ४ ।)