भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ८] शारीरस्थानम् १०१ पुत्रेष्टि—यदि स्त्री चाहे कि मेरा पुत्र बड़ा शुद्ध चरित्र, प्रतिभाशाली, सिंह के समान पराक्रमी, पवित्र और बलसम्पन्न हो तो—ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करने पर लगातार सातदिनों तक समय २ पर [ प्रातः सायं दोनों समय ] स्त्री शुद्ध साफ ( तुषों से रहित ) किये जौ के मन्थ को मधु और घी में मिला कर श्वेत सुन्दर बछड़े वाली श्वेत गाय के दूध में घोल कर चांदी या कांसे के पात्र में खावे और प्रातःकाल हेमन्त-धान्य ( चावल ) तथा जौ से बने खाद्य पदार्थों को दही, मधु और घी के साथ अथवा दूध के साथ मिलाकर खाना चाहिये । और सायंकाल निर्मल घर, बिस्तर, आसन, वस्त्र और भूषणों का उपयोग करे । सायं प्रातः निरन्तर, श्वेत, बड़े, अच्छी नस्ल के, श्वेत चन्दन से लिप्त अंगों वाले बैल का दर्शन करे, सौम्य एव मनोहर अनुकूल कथाओं द्वारा पुरुष स्त्री को प्रसन्न करे । वह स्त्री सौम्य आकृति वाली, सौम्य वचन, सौम्य आचार और सौम्य चेष्टा वाले स्त्री पुरुषों को तथा अन्य इन्द्रियों के निर्मल ग्राह्य पदर्थों को देखे । इस स्त्री की प्रिय और हितकारी बातों से सहेलियां सदा सेवा करती रहें । इसी प्रकार पति भी अपना आहार-विहार करे । वे दोनो इस अवसर में सम्भोग न करें ॥ इत्यनेन विधिना सप्तरात्रं स्थित्वाऽष्टमेऽहन्याप्लुत्याद्भिः सशिरस्कं भर्त्रा सह चाहनानि वस्त्राण्याच्छादयेदवदातानि । अवदाताश्च स्रजो भूषणानि बिभृयात् ॥ ७ ॥ इस प्रकार उपरोक्त विधि से सात रात तक रह कर आठवें दिन पति के साथ शिर आदि सब अंगों सहित स्नान करके पवित्र, नये निर्मल वस्त्रों को धारण करे । वे सुन्दर माला और आभूषणों को धारण करें ॥ ७ ॥ तत ऋत्विक्प्रागुत्तरस्या दिश्यागारस्य प्राक्प्रवणमुदक्प्रवणं वा प्रदेशमभिसमीक्ष्य गोमयोदकाभ्यां स्थण्डिलमुपसलिप्य, प्रोक्ष्य चोदकेन वेदिमस्मिन् स्थापयेत् । तां पश्चिमेनानाहतवस्त्रसंचये श्वेतार्षभे वाऽप्य- जिन उपविशेत् ब्राह्मणप्रयुक्तः, राजन्यप्रयुक्तस्तु वैयाघ्रे चर्मण्यानुडुहे वा, वैश्यप्रयुक्तस्तु रौरवे बास्ते वा । तत्रोपविष्टः पालाशीभिरैङ्गुदीभिरौ- दुम्बरीभिर्माधूकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय, कुशैः परिस्तीर्य, परिधिश्च परिधाय, लाजैः शुक्लाभिश्च गन्धवतीभि सुमनोभिरुपा- किरेत् । तत्र प्रणीतोदपात्रं पवित्रं पूतमुपसंस्कृत्य सर्पिराज्यार्थं यथोक्त- वर्णोनाजानेयादीन् समन्ततः स्थापयेत् ।