चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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१०० चरकसंहिता [ अ० ८
अतः सर्वदोषवर्जितौ स्त्री पुरुषौ संसृज्येयाताम् । संजातहर्षों मैथुने
चानुकूलाविष्टगन्धं स्वास्तीर्णं सुखं शयनमुपकल्प्य मनोज्ञं हितमशन-
मश्शित्वा नात्यशितौ । दक्षिणपादेन पुमान् वामपादेन स्त्री चारोहेत् ।
तत्र मंत्रं प्रयुञ्जीत—
गर्भाधान के नियम—इसलिये सब प्रकार के दोषों से रहित स्त्री और पुरुष
ही गर्भाधान करे । मैथुन की इच्छा उत्पन्न होने पर प्रसन्न चित्त, अनुकूल
सुगन्धि से युक्त, मन के अनुकूल, स्वच्छ, बिछे बिस्तर पर, हितकारी भोजन
खा कर, दक्षिण पाव को पुरुष और वाम पाव को स्त्री प्रथम रख कर शय्या
पर चढे । वे दोनों भोजन बहुत अधिक न खावें । इस समय निम्नलिखित
मन्त्र बोले ।
अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि ।
धाता त्वा दधातु विधाता त्वा दधातु
ब्रह्मवर्चसा भवेदिति ॥ १ ॥
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ ।
भगोऽथ मित्रावरुणौ पुत्र वीरं दधातु मे ॥ २ ॥
मन्त्रार्थ—तू अहि है, तू आयु है, तू सब स्थान मे प्रतिष्ठित है, धाता,
तुझे धारण करे, विधाता तुझको धारण करे, तू ब्रह्म तेज से युक्त हो ॥ १ ॥
ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, दोनों अश्वी, भग, मित्र और वरुण
मुझको वीर पुत्र धारण करावें ॥ २ ॥
इत्युक्त्वा संवसेताम् ॥ ३ ॥
यह मन्त्र पढ़ कर वे दोनों मैथुन कर्म करे ॥ ३ ॥
सा चेदेवमाशासीत बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विन शुचि सत्त्वसंपन्नं
पुत्रमिच्छेयमिति शुद्धस्नानात्प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिर्भ्यां
संसृज्य श्वेताया गोः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कांस्ये वा
पात्रे काले काले सप्ताहं सतत प्रयच्छेत्पानाय, प्रातश्च शालियवान्नवि-
कारान् दधि-मधु सर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायमाव-
दात-शरण-शयनासन यान-वसन-भूषणा च स्यात्, साय प्रातश्च शश्व-
च्छुश्वेतं महान्तमृषभमाजानेयं हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत्, सौम्याभिश्चैनां
कथाभिर्मनोऽनुकूलाभिरुपासीत, सौम्याकृति-वचनोपचार-चेष्टांश्च स्त्री-
पुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत्, सहचर्यश्चैनां प्रियहि-
ताभ्यां सततमुपचरेयुः तथा भर्ता । न च मिश्रीभावमापद्येयाताम् ।