चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] शारीरस्थानम् ६६ स्नान करने के उपरान्त पुत्र की कामना से युग्म (दूसरे, चौथ, छठे आदि) दिनो मे और कन्या की कामना से अयुग्म (पहले, तीसरे, पाचवे सातवें आदि) दिनो में मैथुन करे ॥ ६ ॥ गर्भाधान काल मे स्त्री की उचित स्थिति— न च न्युब्जां पार्श्वगता वा संसेवेत । न्युब्जाया वातो बलवान् स योनि पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा संच्युतोऽपिद्- धाति गर्भाशयं १, वामे पित्तं पार्श्वे । तस्याः पीडितं विदहति रक्त शुक्रम् । तस्मादुत्ताना सती बीजं गृह्णीयात् । तस्या हि यथास्थानमवतिष्ठन्ते दोषाः । पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत् । नीचे मुख की हुई, औंधी या पार्श्व में लेटी स्त्री के साथ सम्भोग नहीं करे क्योंकि अधोमुख स्थिति मे वायु बलवान् होता है, यह वायु योनि का पीड़न करता है । दक्षिण पार्श्व मे लेटने से श्लेष्मा (कफ) स्रवित होकर गर्भाशय को ढाप लेता है । वाम पार्श्व में लेटने से पित्त कुपित होकर रक्त और शुक्र को दूषित कर देता तथा उष्ण कर देता है । इसलिये स्त्री उत्तान पीठ के बल चित्त लेटकर बीज का योनि मे ग्रहण करे । इस स्थिति में दोष वात आदि अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहते हैं । मैथुन की समाप्ति पर स्त्री को शीतल जल से स्नान करावे । तत्रात्यशिता क्षुधिता पिपासिता भीता विमनाः शोकार्ता क्रुद्धाऽन्य च पुमांसमिच्छन्ती मैथुने चातिकामा वा नारी न गर्भं धत्ते । विगुणां वा प्रजा जनयति । अतिबालामतिवृद्धां दीर्घरोगिणीमन्येन वा विकारे णोपसृष्टा वर्जयेत् । पुरुषेऽप्येत एव दोषाः । गर्भाधान के अयोग्य स्त्री-पुरुष—बहुत भोजन करने पर, भूखे होने पर, प्यास लगी होने पर, डरी होने पर, मन प्रसन्न न होने पर या अन्य वस्तु में मन लगे होने पर, शोकयुक्त, क्रुद्ध, अन्य पुरुष को चाहने वाली, अधिक सम्भोग को चाहने वाली स्त्री गर्भ धारण नही करती । यदि भाग्य से गर्भ रह भी जाये तो गुणरहित सन्तान उत्पन्न होती है । इसी प्रकार बहुत छोटी आयु वाली, अति वृद्ध, चिरकाल से रोगिणी, अथवा अन्य किसी रोग से आक्रान्त स्त्री को भी गर्भाधान क्रिया मे अयोग्य जानना चाहिये । इसी प्रकार के पुरुष भी गर्भाधान क्रिया में अयोग्य होते हैं । १. 'गर्भं' इति च पाठः ।