चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१३
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१३ सहस्रधौतसर्पिर्वा तैलं वा चन्दनादिकम् ॥ २५७ ॥ दाहज्वरप्रशमनं दद्यादभ्यञ्जनं भिषक् । ज्वर को शीत और उष्ण भेद से दो भागो मे विभक्त करके अभ्यग प्रदेह, परिषेक का प्रयोग करे । शीत ज्वर हो तो उष्ण अभ्यग, परिषेक, प्रदेह करने । दाह ज्वर मे मालिश के लिये सहस्र वार (वा सो वार ) धाया हुआ घी, या चन्दनादि तैल का प्रयोग करे । इससे दाह मिटता है ॥ २५६-२५७ ॥ अथ चन्दनाद्यं तैलमुपदिश्यामः-चन्दन-शैलेय-भद्राश्रय-कालानुसा- र्य-कालीयक-पद्मा-पद्मकोशीर-सारिवा-मधुक-प्रपौण्डरीक-नागपुष्पोदी- च्य-चव्य-पद्मोत्पल-नलिन-कुमुद-सौगन्धिक-पुण्डरोक-शतपत्र-बिस-मृणा- ल-शालूक-शैवाल-कशेरुकानन्ता-कुश-काशेक्षु-दर्भ-शर-नल-शालि-मूल- जम्बु-वेत्र-वेतस-वानीर-गुन्द्रा-ककुभासनाश्वकर्ण-स्यन्दन-वातपोथ-शाल- ताल-धवाति-निश-खदिर-कदर-कदम्ब-काश्मर्य-फल-सर्ज-लक्ष-यट-कपीत- नोदुम्बराश्वत्थ-न्यग्रोध-वातकी-दूर्वाकण्टक-शृङ्गाटक-मञ्जिष्ठा-ज्योतिष्म- ती-पुष्करबीज-क्रौञ्चादन-बदरी-कोविदार-कदली संवर्तकारिष्ट- शतपर्वा- श्वेतकुम्भिका-शतावरी-श्रीपर्णी-श्रावणी-महाश्रावणी-रोहिणी-शीतपाक्यौ- दनपाकी-काला-बला-पयस्या-विदारी-जीवकर्षभक-क्षुद्रमेदा-महामेदा-म- धुरपर्ण्याप्रोक्ता-तृणशून्य-मोचरसा-टरूपक-बबुल-कुटज-पटोल-निम्ब-शाल्म- ली-नारिकेल-खर्जूर-मृद्वीका-प्रियाल-प्रियङ्गु-धन्वनात्मगुप्ता-मधुकानाम- न्येषां च शीतवीर्याणां यथालाभमोषधानां कषायं कारयेत्। तेन कषा- येण द्विगुणितपयसा तेषामेव च कल्केन कषायार्धमात्र मृद्वग्निना साध- येत्तैलं सद्योदाह ज्वरमपनयति । एतेरेव चौषधैः सुश्लक्ष्णपिष्टैः सुशीतैः प्रदेहं कारयेत्, एतैरेव च शृतशीत सलिलमवगाहपरिषेकार्थं प्रयुञ्जीत । इसके आगे चन्दनादि तेल का उपदेश करते हे-चन्दन, शैलेय (छैल- छरीला ), भद्राश्रया ( श्वेत चन्दन ), कालानुसार्य ( तगर ), कालीयक ( पीत- काष्ठ चन्दन ), पद्मा ( भाङ्गी ), पद्माख, खम, सारिवा, मुल्हठी, पुण्डरीक- काष्ठ, नागकेसर, उदीच्य ( नेत्रवाला ), चविका, वन्य ( मोथा ), पद्म (कमल), उत्पल (नील-कमल ), नलिन ( कमल भेद ), कुमुद ( श्वेत कमल भेद ), सौगन्धिक, पुण्डरीक ( श्वेत कमल ), शतपत्र ( लाल कमल ), बिस ( कमल नाल ), मृणाल ( कमल-दण्ड ), शालूक ( कमल आदि के कन्द ), शैवाल ( सरवाल ), कसेरू, अनन्ती ( दुरालभा ), कुश, कास, ईख, शर और दाभ ( इनकी जड ), नलसर, शालि धान्य की जड, जामुन, बेत, अम्लवेतस, वानीर (जल बेतस ), गुन्द्रा ( तृण भेद ), अर्जुन, असन ( पीत साल ), अश्वकर्ण
३१४ चरकसंहिता [अ० ३ (साल का भेद), स्यन्दन (सादन), वातपोथ (ढाक), शाल, ताड, धव, तिनिश (जिससे रथ बनता है वह वृक्ष), खैर, कदर (श्वेत खैर), कदम्ब, गम्भारी का फल, सर्ज (राल जिससे निकलती है वह वृक्ष), प्लक्ष (पिलखन), वट (बरगद), कपीतन (गिरीस या पारस पीपल), गूलर, पीपल, बरगद (जिसमे जटाये लटकती है), वाय के फूल, दूब, इत्कट (तृण विशेष), सिंघाडा, मजीठ, मालकंगनी, कमल बीज, क्रोञ्चादन (खिरनी), बेर, कोवि- दार (श्वेत कचनार), वेतस, मवर्त्तक (बहेडा), नीम, शतपर्वा (श्वेत दूब), शीत कुम्भिका (काठ पाटला, जिससे फूल नहीं आता वह पाटला), शतावरी, श्रीपर्णी (गम्भारी), श्रावणी (मुण्डी), महाश्रावणी (मुण्डी भेद), रोहिणी (कुटकी), शीतपाकी (गन्धदूर्वा या शिखण्डिका), ओदनपाकी (नील झिण्टी), काला (सारिवा या मजीठ), खरैंटी, पयस्या (क्षीरकाकोली या क्षीरविदारी), विदारीकन्द, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, मधुरा (काकोली या मूर्वा), क्षुद्रसहा (मूगपर्णी), ऋष्यप्रोक्ता (अतिबला), तृणशून्य (केतकी, केवडा), मोचरस (सेमलकी गोद), अडूसा, मौलसरी, वूड़ा, पटोलपत्र, नीम, सेमल की जड़, नारियल, खजूर, अगूर, पियाल, फूल प्रियगु, धन्वन, क्रौंच और मुलहठी । इन्हें तथा अन्य जो शीतल द्रव्य प्राप्त हो सके उनको लेकर क्वाथ करे। इस क्वाथ से दुगुना दूध, इन्ही द्रव्यो का कल्क और कषाय से आधा तैल मिलाकर तैल सिद्ध करे। यह तैल शीघ्र दाह ज्वर को नष्ट करता है। इन्ही ओषधियो को अत्यन्त बारीक पीस कर पतला लेप करे। इनके क्वाथ मे अव- गाहन या परिषेचन करे। [बारीक लेप करना चाहिये गाढा लेप उष्णता करता है ] ॥ २५८ ॥ मद्यारनाल-क्षीर-सौवीर-दधि-घृत-सलिल-सेकावगाहाश्च सद्योदाह- ज्वरमपनयन्ति शीतस्पर्शत्वादिति ॥ २५६ ॥ मद्य, आरनाल (काँजी), दूध, सौवीर (धान्यासव), दही, घी और जल का परिषेक और अवगाहन बहुत जल्दी दाहज्वर को नष्ट करता है। क्योकि ये वस्तुएँ शीत स्पर्शवाली है ॥ २५६ ॥ भवन्ति चात्र-पौष्करेषु सुशीतेषु पद्मोत्पलदलेषु च। कह्लाराणां च पत्रेषु क्षौमेषु विमलेषु च ॥ २६० ॥ चन्दनोदकशीतेषु सुप्याद्दाहादितः सुखम् । हिमाम्बुसिक्ते सदने शीते धारागृहेऽपि वा ॥ २६१ ॥ हेमशङ्खप्रवालानां मणीनां मौक्तिकस्य च ।
अ० ३ ] चिकित्तिसस्थानम् ३१५
अ० ३ ] चिकित्तिसस्थानम् ३१५ चन्दनोदकशीतानां संस्पर्शानुरसान् स्पृशेत् ॥ २६२ ॥ स्रग्भिर्नीलोत्पलैः पद्मैर्व्यजनैर्विविधैरपि । शीतवातावहैर्व्यज्येच्चन्दनोदकवर्षिभिः ॥ २६३ ॥ नद्यस्तडागाः पद्मिन्यो ह्रदाश्च विमलोदकाः । अवगाहे हिता दाहतृष्णाग्लानिज्वरापहाः ॥ २६४ ॥ प्रियाः प्रदक्षिणाचाराः प्रमदाश्चन्दनोक्षिताः । सान्त्वयेयुः परैः कामैर्मणिमौक्तिकभूषणाः ॥ २६५ ॥ शीतानि चान्नपानानि शीतान्युपवनानि च । वायवश्चन्द्रपादाश्च शीता दाहज्वरापहाः ॥ २६६ ॥ (१) पुष्कर (लाल कमल), पद्म, उत्पल तथा कल्हार (कुमुद) के शीतल पत्तों पर अथवा चन्दन के पानी से ठण्डे किये निर्मल क्षौम वस्त्रों पर, शीतल या बर्फ से शीतल बने (जल के छिड़काव से ठण्डे) या शीतल धारा- गृहों में (जहाँ पर फुहारे छूट रहे हों) दाह से पीड़ित मनुष्य को सुख से सोना चाहिये। (२) स्वर्ण, शंख, मूगा, मणि, मोती और चन्दन के पानी से शीतल किये पदार्थों का स्पर्श करे। गरम होने पर छोड़ दे। [चक्रदत्त में शीत- क्रिया के लिये एक उत्तम विधि दी है। रोगी को पीठ के भार लेटा कर उसकी नाभि पर कांसी आदि शीतल पात्र रख कर ऊपर से पानी की धारा गिरानी चाहिये इससे दाह मिटता है।] (३) नीले कमल की या श्वेत कमल की मालाओं को धारण करावे खस आदि के नाना प्रकार के पंखों को चन्दन के पानी से तर करके शीतल वायु देवे। (४) नदियां, तालाब, पद्मिनी (पुख- रणियां), ह्रद जिनका पानी निर्मल हो, उनमें अवगाहन करे। इससे दाह, प्यास, ग्लानि और ज्वर नष्ट होता है। (५) प्रिय, अनुकूल आचार वाली, चन्दन का लेप किये हुए, मणि और मोतियों के आभूषणों को पहिने हुए कामिनियों द्वारा रोगी की शान्ति करे। [वाह्य परिशीलन मात्र करे वीर्य का नाश नहीं होने देवे।] (६) शीतल खान पान, शीतल बाग बगीचे, शीतल वायुए, चन्द्रमा की शीतल किरणें ये दाह ज्वर को नष्ट करती हैं ॥२६०-२६६॥ अथोष्णाभिप्राायिणां ज्वरितानामभ्यङ्गादीनुपक्रमानुपदेक्ष्यामः । अगुरु-कुष्ठ-तगर-पत्र-नलद-शैलेयक-व्यामक-हरेणुका-स्थौणेयक-क्षेमकै- ला-वरा-वराङ्गदल-पूर-तमाल-पत्र-भूतीक-रोहिष-सरल-शल्लकी-देवदार्वग्नि- मन्थ-बिल्व-स्योनाक-काश्मर्य-पाटला-पुनर्नवा-वृश्चीर-कण्टकारिका-बृह- ती-शालिपर्णी-पृश्निपर्णी-माषपर्णी-मुद्गपर्णी-गोक्षुरकैरण्ड-शोभाञ्जनक-व-
३१६ चरकसंहिता [ अ० ३ रुणार्क-चिरिबिल्वातिबिल्वक-शटीपुष्कर-मूलगण्डीरोरुबूक-पत्तूराक्षीवा- श्मान्तक-शिग्रु-मातुलुङ्ग-मूलक-मूलपर्णी-पीलुपर्णी-तिलपर्णी-मोरटा- मेषशृङ्गी-हिंस्त्रा-दन्त-शठैरावतक-भल्लातका-स्फोट-कण्डीरात्मजा-काका- ण्डैकैषीका-करञ्ज-धान्यकाजमोद-पृथ्वीका-सुमुख-सुरस-कुठेरक-काण्डीर- कालसाल्क-पर्णास-क्षवक-फणिज्झक-भूस्तृण-शृङ्गवेर-पिप्पली-सर्पपाश्वग- न्धा-रास्नारुहावरोहा-वचा-बलातिबला-गुडूच्य-शतपुष्पा-शीतवती-नाकु- ली-गन्धनाकुली-श्वेता-ज्योतिष्मती-चित्रकाव्यण्डाम्ल-चाङ्गेरी-बदर-कुल- त्थ-माषाणामेव विधानामन्येषां चोष्णवीर्याणां यथालाभमौषधानां कषायं कारयेत्। तेन कषायेण तेषामेव च कल्केन सुरा-सौवीरक-तुषोदक- मैरेय-मेदक-डाम्यमण्डारनाल-कट्वर-प्रतिविनीतेन तैलपात्रं विपाचयेत्, तेन सुखोष्णेन तैलेनोष्णाभिप्रायिणं ज्वरितमभ्यञ्ज्यात्, तथा शीतज्वरः प्रशाम्यति । तैरेव चौषधैः श्लक्ष्णपिष्टैः सुखोष्णैः प्रदेहं कारयेत्, एतेषा- मेव च सुखोष्णमुत्क्वाथमवगाहनपरिषेकार्थं प्रयुञ्जीत ज्वरप्रशमार्थ- मिति ॥ २६७ ॥ इति शीतज्वरेऽगुर्वाद्यन्तैलम् । जिस ज्वर के रोगी उष्ण प्रलेप आदि की इच्छा करते हैं, उनके लिये अभ्यङ्ग आदि का उपदेश करे । यथा—अगुरु, कुष्ठ, तगर, तेजपत्र, नलद ( बालछड ), गैलेय (छैलछरीला ), व्यामक ( तृणविशेष ) हरेणु, ( रेणुका ), स्थौणेय (सुगन्धित द्रव्य गठिवन ), क्षेमिक ( चोरक ), एला ( इलायची ), वरा ( त्रिफला ), वरांगदल ( दालचीनी की छाल अथवा प्रियंगुपत्र ), पुर ( गुग्गुलु ), तमालपत्र, भूतीक (तृणविशेष), राहिय (तृणविशेष ), सरल ( चीड ), शल्लकी (सर्जभेद ), देवदारु, अनिमन्य ( अरणी ), बेलगिरी, स्योनाक (सोना पाठा), काश्मरी (गम्भारी), पाटला (पाढल), श्वेत पुनर्नवा, लाल पुनर्नवा, छोटी कटेरी, बडी कटेरी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्गपर्णी, माप- पर्णी, गोखरू, एरण्ड, सहजना, वरना आक, करञ्ज ( नाटा ), तिल्वक (लोध), कचूर, पोहकरमूल, भाण्डीर ( भाट ), उरुवक ( लाल एरण्ड ), पत्तूरा ( राज गरी ), अक्षीव ( महानिम्ब ), अश्मान्तक, शिग्रु ( कडुआ सहजन ), बिजौरा, मूलपर्णी, पीलुपर्णी, ( बिम्बी, मूर्वा भेद ), तिलपर्णी ( तलवणो या हुलहुल ), मेढाशृङ्गी, हिंस्त्रा ( मासी, कथार ), दन्तशठ ( गलगल ), ऐरावतक (नारंगी), भिलावा, आस्फोटक ( हरफा रेवड़ी ), कण्डीर ( जंगली करेली ), आत्मज ( पुत्रजरा ), काकाण्ड ( कौंच ), एकैषिका ( त्रिवृता या पाठा ), करजुआ,
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१७
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१७
धनिया, अजवायन, पृथ्विका (कलौंजी), सुमुख, सुरस, कुठेरक, काण्डीर,
कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्जक, (सब तुलसी के भेद हैं), भूतस्तृण
(गन्धतृण), अदरक, पिप्पली, सरसों, असगन्ध, रास्ना, रुहा (वृद्धरुहा या
मास्तराहिणी), अवराहा (असगन्ध भेद, लाजवन्ती), वच, बला, अतिबला,
विगलय, त्वाफ, शीतवल्ली (नीलदूर्वा), नाकुली (रास्ना भेद), श्वेता (सफेद
गरणी), मालकंगनी, चित्रक, अध्यण्डा (तालमखाना या कौंच), अम्लचांगेरी
(तिनपतिया), बदर, कुलत्थी, माष (उड़द) इस प्रकार के तथा अन्य उष्ण
वीर्य पदार्थों में जितने भी प्राप्त हो सकें उन सबका संग्रह करके उनके साथ
कषाय बनावे । इन्हीं उष्णवीर्य द्रव्यों के कल्क के साथ और सुरा, सौवीरक
(धान्याम्ल), तुषोदक (धान्यासव), मेरेय, मेदक, दही का पानी, कांजी,
कटवर, (मक्खन न निकाला गया तक्र) मिलाकर तैल पकावे । (यहाँ पर द्रव
के द्रव्य स्नेह के समान होने चाहिये । इस प्रकार से सुरा आदि तैल के समान
और कल्क तैल से चतुर्थांश चाहिये) । कुछ गरम गरम तैल से अभ्यंग करे,
इनसे शीतज्वर नष्ट हो जाता है। इन्ही ओषधियों को बारीक पीस कर कवोष्ण
प्रदेह करे । इन्हीं के सुहाते गरम पानी में अवगाहन, परिषेक, ज्वर की शान्ति
के लिये करे ॥ २६७ ॥
भवन्ति चात्र—त्रयोदशविधः स्वेदः स्वेदाध्याये निदर्शितः ।
मात्राकालविदा युक्तः स च शीतज्वरापहः ॥ २६८ ॥
सा कुटी तच्च शयनं तच्चावच्छादनं ज्वरम् ।
शीतं प्रशमयन्त्याशु धूपाश्चागुरुजा घनाः ॥ २६९ ॥
पवित्रचारुगात्राश्च तरुण्यो यौवनोष्मणा ।
आश्लेषाच्छमयन्त्याशु प्रमदाः शिशिरज्वरम् ॥ २७० ॥
स्वेदनान्यन्नपानानि वातश्लेष्महराणि च ।
शीतज्वरं जयन्त्याशु संसर्गबलयोजनात् ॥ २७१
स्वेद अध्याय में जो तेरह प्रकार के स्वेद कहे हैं, मात्रा और काल को
जानने वाला वैद्य इनका भी प्रयोग करे । ये शीत ज्वर को नष्ट करते हैं । (१)
वह कुटी, वह बिस्तर और वह ओढ़ने के वस्त्र जो कुटी-स्वेद में वर्णित हैं तथा
अगर के घने धूप शीत को शान्त करते हैं । (२) स्वच्छ और सुन्दर शरीर
वाली, युवती स्त्रिया अपने यौवन की गरमी से आलिंगन द्वारा शीत को नष्ट
करती हैं । (३) स्वेदन अर्थात् पसीना लाने वाले और वात-कफ नाशक खान-
पान संसर्ग के बल के अनुसार शीत ज्वर को नष्ट करते हैं । यथा—यदि ज्वर
३१८ चरकसंहिता [ अ० ३ वात कफ से हो और इसमे वायु बलवान् हो तो गुरु, उष्ण, स्निग्ध, अनुपान बरते, यदि कफ बलवान् हो तब उष्ण, रूक्षप्राय चिकित्सा करे ॥ २६८-२७१ ॥ वातजे श्रमजे चैव पुराणे क्षतजे ज्वरे । लङ्घन न हितं विद्याच्छमनेस्तानूपाचरेत् ॥ २७२ ॥ वायुजन्य—वायुआ के श्रम से उत्पन्न, पुरातन ज्वर, क्षयजन्य ज्वर मे लङ्घन हितकारी नही है, उनके लिये शमनी चिकित्सा करे ॥ २७२ ॥ विक्षिप्यामाशयोष्माणं यस्माद् गत्वा रस नृणाम् । ज्वरं कुर्वन्ति दोषास्तु हीयतेऽग्निबल ततः ॥ २७३ ॥ यथा प्रज्वलितो वह्निः स्थाल्यामन्धनवानपि । न पचत्योदन सम्यगनिलप्रेरितो बहिः ॥ २७४ ॥ पक्तिस्थानात्तदा दोषरूष्मा क्षिप्तो बहिर्नृणाम् । न पचत्यन्वहृत कृच्छ्रात्पचति वा लघु ॥ २७५ ॥ अतोऽग्निबलरक्षार्थं लङ्घनादिक्रमो हितः । सप्ताहेन हि पच्यन्ते सर्वधातुगता मलाः ॥ २७६ ॥ निरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रायोऽष्टमेऽहनि । क्योकि आमाशय की ऊष्मा को बाहर निकाल कर रस-धातु मे जा कर ज्वर उत्पन्न करते है, इसलिये पुरुषो का अग्नि बल घट जाता है। जिस प्रकार चूल्हे मे जलती हुई आग ईन्धन होने पर भी वायु के झोके से बाहर की ओर आने से पतीली के चावल को नही पकाती, इसी प्रकार दोषो के कारण आमाशय से बाहर आई हुई अग्नि भुक्त भोजन को नहीं पचाती, या लघु भोजन कठिनाई से पचता है। इसलिये अग्निबल की रक्षा के लिये ही यह लङ्घन आदि उपक्रम बताया है। सब धातुओ के मल प्राय सात दिन के भीतर पच जाते है। इसलिये प्राय आठवे दिन ज्वर को 'निराम ज्वर' कहते है। [ कभी कभी सात दिन के पीछे भी सामता रह जाती है । ] ॥ २७३-२७६ ॥ उदीर्णदोषस्त्वल्पाग्निरश्नन् गुरु विशेषतः ॥ २७७ ॥ मुच्यते सहसा प्राणैश्चिरं क्लिश्यति वा नरः । एतस्मात्कारणाद्विद्वान्वातिकेऽप्यादितो ज्वरे ॥ २७८ ॥ नाति गुर्वति वा स्निग्ध भोजयेत्सहसा नरम् । ज्वरे मारुतजे त्वादावनपेक्ष्यापि हि क्रमम् ॥ २७९ ॥ कुर्यान्निरनुबन्धानामभ्यङ्गादीनुपक्रमान् । पाययित्वा कषायं च भोजयेद्रसभोजनम् ॥ २८० ॥ जीर्णज्वरहरं कुर्यात्सर्वश्वाप्युपक्रमम् ।
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१६
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१६
जिस पुरुष मे दाप बढे हुए हो और अग्नि मन्द हो, वह पुरुष यदि गुरु
भाजन का सेवन करता है, तो पुरुष सहसा मर जाता है अथवा देर तक कष्ट
पाता है। इन कारणो का देखते हुए वातिक ज्वर मे भी रोगी को प्रथम गुरु
वा स्निग्ध भाजन नही करावे । वातजन्य ज्वर मे यदि पित्त और कफ का
अनुबन्ध न हो तो पूर्वोक्त क्रम की उपेक्षा करके भी अभ्यग आदि का उपक्रम
करे, कषाय पिला कर मास रस का भोजन देवे । जीर्ण ज्वर के लिये जो भी
चिकित्सा है, वह सब वायुजन्य ज्वर मे प्रथम ही करे ॥ २७७-२८० ॥
श्लेष्मलानामावातानां ज्वरोऽनुष्णे कफाधिकः ॥ २८१ ॥
परिपाकं न सप्ताहेनापि याति मृदूष्मणाम् ।
तं क्रमेण यथोक्तेन लङ्घनाल्पाशनादिना ॥ २८२ ॥
आदशाहमुपक्रम्य कषायाद्यैरूपाचरेत् ।
कफ-प्रकृति के पुरुषो मे जब वायु न हो, उष्मा मृदु हो और कफ प्रधान
ज्वर हो, पित्त का अनुबन्ध न हो तो दोष (आम) सात दिन मे भी नही
पकते । इसके लिये पूर्व वर्णित लङ्घन और अल्पाशन विधि का दस दिन तक
प्रयोग करके पीछे से कषाय पान करावे ॥ २८१-२८२ ॥
सामा ये ये च कफजाः कफपित्तज्वराश्च ये ॥ २८३ ॥
लङ्घनं लङ्घनीयोक्तं तेषु कार्यं प्रति प्रति ।
वमनैश्च विरेकैश्च बस्तिभिश्च यथाक्रमम् ॥ २८४ ॥
जो ज्वर साम हो, जो ज्वर कफजन्य हो, कफ-पित्त ज्वर मे, लङ्घनीय
प्रत्येक पुरुष को लङ्घन करावे । आम वायु से मिला हो तो भी लङ्घन करावे ।
कफ निराम हो तो भी लङ्घन करावे । कफयुक्त पित्त की अवस्था मे ही लङ्घन
करावे । परन्तु निराम पित्त मे लङ्घन नही करावे । साम पित्त मे लङ्घन
उत्तम है ॥ २८३-२८४ ॥
ज्वरानुपचरेद्धीमान् कफपित्तानिलोद्भवान् ।
संसृष्टान् सन्निपतितान् बुद्ध्वा तरतमैः समैः ॥ २८५ ॥
ज्वरान्दोषक्रमापेक्षी यथोक्तैरौषधैर्जयेत् ।
कफ-पित्त और वायुजन्य ज्वरो मे क्रमश वमन, विरेचन और बास्तयो द्वारा
चिकित्सा करे । यदि ज्वर कफजन्य हो तो वमन, पित्तजन्य हो तो विरेचन और
वायुजन्य होता बुद्धिमान् वैद्य बस्ति का उपयोग करे ।] ससृष्ट अर्थात् द्वन्द्वज
और सन्निपातजन्य ज्वरो मे दोषो के तार-तम्य तथा समान अवस्था के क्रम की
विवेचना करके पूर्वोक्त औषधियो से चिकित्सा करे ॥ २८५ ॥
कफस्थानानुपूर्व्या वा सन्निपातज्वरं जयेत् ।
३२० चरकसंहिता [ अ० ३ वर्धनेनैकदोषस्य क्षपणेनोच्छ्रितस्य वा ॥ २८६ ॥ कफस्थानानुपूर्व्या वा सन्निपातज्वरं जयेत् । सन्निपात ज्वर मे एक एक दोष का बढाना चाहिये और बढे हुए ( वृद्ध- तर ओर वृद्धतम ) दोष को घटावे । अथवा कफ स्थान के अनुक्रम से सन्नि- पात ज्वर की चिकित्सा करे । [ जैसे—कफ वृद्ध, पित्त वृद्धतर, वायु वृद्धतम हो तो मधुर देवे । अथवा कफ वृद्ध हो और वात-पित्त दोनो वृद्धतर हों तो भी मधुर रस देवे । मधुर रस जहा कफ को बढाता है वहा वायु और पित्त को घटाता है । यदि तीनो दोष समानावस्था मे हो तो प्रथम कफ की चिकित्सा करे । ] कफ का स्थान आमाशय है । इसलिये प्रथम स्थान को जीतना चाहिये । ( क ) अन्यत्र ज्वरो मे प्रथम वायु का फिर पित्त का और तब कफ का शमन करना चाहिये । परन्तु जीर्णज्वर मे प्रथम पित्त की चिकित्सा करनी चाहिये । नवज्वर तथा सन्निपात ज्वर मे प्रथम कफ को ही शमन करना चाहिये । ( ख ) एकोल्बण-सन्निपात मे प्रवृद्ध एक दोष को घटाना चाहिये और जो दोष क्षीण हो उनकी थोड़ी वृद्धि करनी चाहिये । ( ग ) वृद्धदोष सन्निपातो की भाति क्षीण- दोष सन्निपात भी बारह प्रकार के होते है, परन्तु इनमे दोष अपने लक्षणो को छोड देते है । जैसा कि कहा भी है, 'क्षीणा जहति स्व लिंगम् ।' इस प्रकार से पच्चीस सन्निपात होते है । इनकी चिकित्सा का सामान्य सूत्र भी कह दिया ॥२८६॥ संनिपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः ॥ २८७ ॥ शोथः सजायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते । रक्तावसेचनैः शीघ्रं सर्पिष्पानैश्च तं जयेत् ॥ २८८ ॥ प्रदेह्रैः कफपित्तघ्नैर्नावनैः कवलग्रहैः । शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैर्ज्वरो यस्य न शाम्यति ॥ २८९ ॥ शाखानुसारी रक्तस्य सोऽवसेकात्प्रशाम्यति । विसर्पेणाभिघातेन यश्च विस्फोटकैर्ज्वरः ॥ २९० ॥ तत्रादौ सर्पिषः पानं कफपित्तोत्तरो न चेत् । दौर्बल्याद्देहधातूनां ज्वरो जीर्णोऽनुवर्तते ॥ २९१ ॥ बल्यैः संबृंहणैस्तस्मादाहारैस्तमुपाचरेत् । कर्म साधारणं कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ ॥ २९२ ॥ आगन्तुरनुबन्धो हि प्रायशो विषमज्वरे । वातप्रधानं सर्पिर्भिर्बस्तिभिः सानुवासनैः ॥ २९३ ॥
अ० ३ ] २१ चिकित्सितस्थानम् ३२१
अ० ३ ] २१ चिकित्सितस्थानम् ३२१ स्निग्धोष्णैरनुपानैश्च शमयेद्विपमज्वरम् । विरेचनेन पयसा सर्पिषा संस्कृतेन च ॥ २९४ ॥ विषमं तिक्तशीतैश्च ज्वरं पित्तोत्तरं जयेत् । वमनं पाचनं रूक्षमन्नपानं विलङ्घनम् ॥ २९५ ॥ कषायोष्णं व विषमे ज्वरे शस्तं कफोत्तरे । सन्निपात ज्वर के अन्त मे कान की जड़ मे ( कान मे भी ) दुःख-दायक शोथ उत्पन्न हो जाता है। इस रोग से काई भला ही बचता है, प्रायः करके यह रोग होता १है। इसके लिये जोक आदि द्वारा रक्त का मोक्षण और घृतपान शीघ्रता से ( रोग के प्रारम्भ मे ही ) करे और कफपित्त नाशक नावन ( नस्य ) और कवल देवे । ( १ ) जिस पुरुष का ज्वर शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष क्रिया से शान्त नही होता है, उस मे दोष-एव ज्वर रक्त-धातु मे आश्रित होता है। अतः वह ज्वर रक्त मोक्षण से शान्त हो जाता है । ( २ ) वीसर्प के कारण, चोट लगने से अथवा विस्फोटको के कारण यदि ज्वर उत्पन्न हो जाय, परन्तु कफ-पित्त प्रधान न हो तो प्रथम घृत-पान करावे । ( ३ ) शरीर के धातुओ की निर्बलता से भी जीर्णज्वर बार बार लौट आता है। इसके लिये बलकारक बृंहण ( पुष्टि-दायक ) आहार देवे । ( ४ ) तृतीयक और चतुर्थक ज्वर मे साधारण चिकित्सा करे। प्राय. विषम ज्वर मे आगन्तुज कारण का सम्बन्ध रहता है। [ यहा तृतीयक और चतुर्थक भी विषमज्वर ही ग्रहण किये जाते है। इसलिये भूत आदि दोष उत्पत्ति मे कारण हों तो भी साधारण चिकित्सा ही करे अर्थात् दैवव्यपाश्रय हो तो बलि-मगल आदि रूप चिकित्सा और युक्ति-व्यपाश्रय हो तो दोषानुरूप कषाय-पान आदि चिकित्सा करनी उचित है। ( चक्र० ) ] [ ( ५ ) वातप्रधान विषम ज्वर मे—स्निग्ध उष्ण अनुपानो से घृतयुक्त अनुवासन-बस्तियो से चिकित्सा करे। ( ६ ) पित्तप्रधान ज्वर मे-विरे- चन, तिक्त, शीत द्रव्यो से सस्कृत दूध और घी से चिकित्सा करे। ( ७ ) कफ- प्रधान विषम ज्वर मे—वमन, पाचन, रूखा खानपान, लङ्घन, कषाय और उष्ण द्रव्य देवे ।। २८७-२९५ ।। १ ज्वर के आदि मे कान के मूल मे हुआ शोथ साध्य होता है, ज्वर के मध्य मे शोथ हुआ कष्टसाध्य होता है और ज्वर के अन्त मे हुआ असाध्य होता है। कान के मूल मे पित्त एकत्र होकर शोथ उत्पन्न करता है। वह शोथ दुःसाध्य होता है, प्रायः रोगी को मार देता है।
३२२ चरकसंहिता [ अ० ३
योगाः पराः प्रवक्ष्यन्ते विषमज्वरनाशनाः ॥ २९६ ॥
प्रयोक्तव्या मतिमता दोषादीन् प्रविभज्य ये ।
सुरा समण्डा पानार्थे भक्ष्यार्थे चरणायुधान् ॥ २९७ ॥
तित्तिरींश्च मयूरांश्च प्रयुञ्ज्याद्विषमज्वरे ।
पिबेद्वा षट्पलं सर्पिरभयां वा प्रयोजयेत् ॥ २९८ ॥
त्रिफलायाः कषायं वा गुडूच्या रसमेव वा ।
नीलिनीमजगन्धां च त्रिवृतां कटुरोहिणीम् ॥ २९९ ॥
पिबेज्ज्वरागमे युक्त्या स्नेहस्वेदोपपादितः ।
सर्पिषो महतीं मात्रां पीत्वा वा छर्दयेत्पुनः ॥ ३०० ॥
उपयुञ्ज्यान्नपानं वा प्रभूतं पुनरुल्लिखेत् ।
सान्नं मद्यं प्रभूतं वा पीत्वा स्वाप्याज्ज्वरागमे ॥ ३०१ ॥
आस्थापनं यापनं वा कारयेद्विषमज्वरे ।
पयसा वृषदंशस्य शकृद्वा तदहः पिबेत् ॥ ३०२ ॥
वृषस्य दधिमण्डेन सुरया वा ससैन्धवम् ।
पिप्पल्यास्त्रिफलायाश्च दध्नस्तक्रस्य सर्पिषः ॥ ३०३ ॥
पञ्चगव्यस्य पयसः प्रयोगो विषमज्वरे ।
लशुनस्य प्राग्भक्तमुपसेवनम् ॥ ३०४ ॥
मेध्यानामुष्णवीर्याणामामिषाणां च भक्षणम् ।
हिङ्गुतुल्या तु बैयाघ्री वसा नस्यं ससैन्धवा ॥ ३०५ ॥
पुराणसर्पिः सिंहस्य वसा तद्वत्ससैन्धवा ।
सैन्धवं पिप्पलीनां च तण्डुलाः समनःशिलाः ॥ ३०६ ॥
नेत्राञ्जनं तैलपिष्टं शस्यते विषमज्वरे ।
पलङ्कषा निम्बपत्रं वचा कुष्ठं हरीतकी ॥ ३०७ ॥
सर्षपाः सयवाः सर्पिर्धूपनं ज्वरनाशनम् ।
ये धूमा धूपनं यच्च नावनं चाञ्जनं च यत् ॥ ३०८ ॥
मनोविकारे व्याख्यातं कार्यं तद्विषमज्वरे ।
मणीनामोषधीनां च मङ्गल्यानां विषस्य च ॥ ३०९ ॥
धारणाद्गददानां च सेवनान्न भवेज्ज्वरः ।
सोमं सानुचरं देवं समातृगणमीश्वरम् ॥ ३१० ॥
पूजयन् प्रयतः शीघ्रं मुच्यते विषमज्वरात् ।
विष्णुं सहस्रमूर्धानं चराचरपतिं विभुम् ॥ ३११ ॥
स्तुवन्नामसहस्रेण ज्वरान् सर्वानपोहति । ब्रह्माणमश्विनाविन्द्रं हुतभक्षं हिमाचलम् ॥ ३१२॥ गङ्गां मरुद् गणांश्चेष्ट्या पूजयञ्जयति ज्वरान् । भक्त्या मातापितॄणां च गुरूणां पूजनेन च ॥ ३१३ ॥ ब्रह्मचर्येण तपसा सत्येन नियमेन च । जपहोमप्रदानेन वेदानां श्रवणेन च ॥ ३१४ ॥ ज्वराद्विमुच्यते शीघ्रं साधूनां दर्शनेन च । ज्वरे रसस्थे वमनमुपवासं च कारयेत् ॥ ३१५ ॥ सेकप्रदेहौ रक्तस्थे तथा सशमनानि च । विरेचनं सोपवासं मासमेदःस्थिते हितम् ॥ ३१६ ॥ अस्थिमज्जगते देया निरूहाः सानुवासनाः । आगे विषम ज्वर नाशक योगों को कहते है । बुद्धिमान् को चाहिये कि दोष आदि की विवेचना करके इनका प्रयोग करे । (१) विषमज्वर मे पीने के लिये मण्ड युक्त सुरा, खाने के लिये कुक्कुट का मास, तीतर, मोर देने चाहिये । अथवा गुल्म रोग मे कहे पट्पल घृत अथवा हरड या त्रिफला का क्वाथ, अथवा गिलोय का रस पान करे । (२) प्रथम स्नेहन और स्वेदन लेकर ज्वर के आक्रमण के समय नीलिनी (नील), अजगन्धा, निशोथ और कुटकी इनका क्वाथ पीवे । अथवा घी की प्रभूत मात्रा पीकर वमन करे या खूब खा पीकर वमन कर दे । अथवा अन्न के साथ खूब मद्य पीकर सो जावे । अथवा आस्थापन और मुस्तादि तीन बस्तिया जो कि सिद्धि स्थान मे कहेगे उनका प्रयोग करे । (३) जिस दिन ज्वर चढता हो उस दिन बिल्ली के पुरीष को दूध के साथ पीना चाहिये । अथवा बैल के गोबर को दधिमण्ड, सुरा ओर नमक के साथ लेवे । [ये सब वमन कराने के उपाय प्रतीत होते है । घृणित वस्तुओ से सम्भवत वमन आ जाये ] । (४) विषम ज्वर मे पिप्पली, त्रिफला, दही, छाछ, घी, पचगव्य (दूध, घी, गोमूत्र, गोमय रस और दही या अपस्मारोक्त पचगव्य घृत) और दूब का प्रयोग करे । (५) भोजन से पूर्व तैलयुक्त लहसुन का उपयोग करे । इसी प्रकार पवित्र या मेदुर तथा उष्णवीर्य मासो को खावे । (६) विषम ज्वर मे व्याघ्र की वसा मे हीग और सैन्धा नमक मिला कर नस्य दे । अथवा पुरातन घृत, सिंह की वसा (चर्बी) को सैन्धानमक के साथ मिला कर उसका नस्य देवे । (७) विषम ज्वर मे—सैन्धा नमक, पिप्पली के निस्तुष दाने, मनसिल इनको तेल मे पीस कर नस्य देवे । (८) गुग्गुलु, नीम के पत्ते, वच, कूठ, हरड, सरसो, जौ और
३२४ चरकसंहिता [ अ० ३ भी इनका धूप विषम ज्वर मे देवे । उन्माद और अपस्मार ( हिस्टीरिया ) रोग मे जो धूम, धूप, नस्य और अञ्जन कहे हे, उन सब का विषम ज्वर मे प्रयोग करे । (६) मणि, ओषधियो के ( सहदेवी, जयन्ती आदि ), लाङ्गलिक द्रव्यों के, विष के धारण करने तथा अगदो के सेवन से विषम ज्वर नही होना । (१०) पवित्र होकर पार्वती, नन्दी आदि अनुचरो से युक्त, सोम माहेश्वरी आदि आठ मातृकाओ से युक्त श्री शङ्कर की पूजा करने से रोगी विषम ज्वर से मुक्त हो जाता है । (११) हजार सिर वाले, चर-अचर के स्वामी, व्यापक विष्णु की सहस्र नामो से पूजा करने पर सब प्रकार के ज्वरो से मुक्त हो जाता है । ( १२ ) ब्रह्मा, दोनो अश्वी, इन्द्र, अग्नि, हिमालय, गङ्गा, मरुद्-गण इनकी इष्टि ( यज्ञ ) द्वारा पूजा करने से ज्वर् से मुक्त हो जाता हे। (१३) भक्तिपूर्वक माता, पिता, गुरु की पूजा करने से, ब्रह्मचर्य से, तप से, सत्यव्रत से, नियमो के पालन से अर्थात् शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान इनके पालन से जप और होम के करने से, वेदा के सुनने से, सत्पुरुषो के दर्शन से रोगी ज्वर से शीघ्र मुक्त हो जाता है । (१४) ज्वर यदि रस मे स्थित हो तो वमन और उपवास कराना चाहिये । रक्तस्थ होने पर सेक, शीत प्रदेह, सशमन चिकित्सा करे। मास और मेद मे स्थित होने पर विरेचन और उपवास करावे । अस्थि और मज्जा मे आश्रित होने पर निरूह और स्निग्ध बस्तियों का प्रयोग करे। (शुक्रगत-ज्वर मे चिकित्सा निरर्थक है) ॥ २६६-३१६-॥ शापाभिचाराद् भूतानामभिषङ्गाच्च यो ज्वरः ॥ ३१७॥ दैवव्यपाश्रयं तत्र सर्वमौषधमिष्यते । अभिघातज्वरो नश्येत्पानाभ्यङ्गेन सर्पिषः ॥ ३१८ ॥ रक्तावसेकैर्मद्यैश्च सात्म्यैर्मांसरसौदनैः । सानाहो मद्यसात्म्याना मदिरारसभोजनैः ॥ ३१९ ॥ क्षताना व्रणिताना च क्षतव्रणचिकित्सया । आश्वासनेष्टलाभेन वायोः प्रशमनेन च ॥ ३२० ॥ हर्षणैश्च शमं यान्ति कामशोकभयज्वराः । काम्यैरथैर्मनोज्ञैश्च पित्तघ्नैश्चाप्युपक्रमैः ॥ ३२१ ॥ सद्वाक्यैः शाम्यति ह्याशु ज्वरः क्रोधसमुत्थितः । कामात्क्रोधज्वरो नाशं क्रोधात्कामसमुद्भवः ॥ ३२२ ॥ याति ताभ्यामुभाभ्या च भयशोकसमुत्थितः । ज्वरकालं च वेगं च चिन्तयञ्ज्वर्यते तु यः ॥ ३२३ ॥ तस्येष्टैस्तु विचित्रैश्च विषयैर्नाशयेत्स्मृतिम् ।
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२५
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२५ ( १ ) शाप, अभिचार तथा भूतों के अभिषङ्ग के कारण ज्वर उत्पन्न हुआ हो तो दैव-व्यपाश्रय ( बलि, मगल, होम आदि ) चिकित्सा करे । ( २ ) अभिघातजन्य ज्वर मे—घृतपान, अभ्यङ्ग, रक्त-मोक्षण, मद्य, सात्म्य मास-रस तथा ओदन ( भाजन ) देवे । यदि आनाह ( अफारा ) हो तो मद्य- सात्म्य पुरुषो मे मदिरा के साथ मास रस का भोजन देवे । ( ३ ) क्षत और व्रण के कारण हुआ ज्वर क्षत और व्रण की चिकित्सा से शान्त होता है। काम, शोक और भय से उत्पन्न ज्वर सान्त्वना देने से, इष्ट वस्तु के मिलने से, वायु के शान्त करने से और प्रसन्नता पैदा करने से नष्ट हो जाता है। ( ४ ) क्रोध से उत्पन्न ज्वर वाञ्छित विषयो के, मन पसन्द बातो से, पित्त- नाशक चिकित्सा से और मधुर बचनो से शीघ्र शान्त हो जाता है । ( ५ ) काम मे क्रोधजन्य ज्वर, क्रोध से कामजन्य ज्वर, काम और क्रोध मे शोकजन्य तथा भयजन्य दोनो प्रकार के ज्वर नष्ट होते है । ( ६ ) जिस पुरुष को ज्वर का समय या ज्वर के आक्रमण की चिन्ता ( विचार मात्र ) मे ज्वर चढता हो, उसके लिये अभिलषित, विचित्र ( विस्मयोत्पादक ) विषयो द्वारा उसकी ज्वर की स्मृति भुला देवे ॥३१७-३२३॥ ज्वरप्रमोक्षे पुरुषः कूजन्वमति चेष्टते ॥ ३२४॥ श्वसन्विण्वर्णः स्विन्नाङ्गो वेपते लीयते मुहुः । प्रलपत्युष्णसर्वाङ्गः शीताङ्गश्च भवत्यपि ॥ ३२५ ॥ विसञ्ज्ञो ज्वरवेगार्त्तः सङ्क्रोध इव वीक्ष्यते । सदोषशब्दं च शकृद् द्रव स्रवति वेगवत् ॥ ३२६ ॥ लिङ्गान्येतानि जानीयाज्ज्वरमोक्षे विचक्षणः । बहुदोषस्य बलिनः प्रायेणाभिनवो ज्वरः ॥ ३२७ ॥ सक्रियादोषपक्त्या चेद्विमुञ्चति स दारुणम् । कृत्वा दोषवशाद्वेग क्रमादुपरमन्ति ये ॥ ३२८ ॥ तेषामदारुणो मोक्षो ज्वराणा चिरकारिणाम् । क्योकि धातुओ को छोडते समय दोष लीन हो जाता है, इसलिये ज्वर के जाने के समय रोगी के गले से कराहने की अव्यक्त ध्वनि होती है, वमन होता है, रोगी नाना प्रकार की चेष्टाये करता है, सास तेज चलता है, रग बदल जाता है, पसीना आता है, कापता•है, बार बार मूर्छित होता है, बुडबुडाता है, गरीर गरम या ठण्डा हो जाता है, सज्ञा रहित हो जाता है, ज्वर के वेग के
३२६ चरकसंहिता [अ० ३ कारण स्रावित प्रतीत होता हे, मल दाब के साथ शब्द युक्त, पतला आता है । ये लक्षण ज्वरमोक्ष के है । ये लक्षण सन्निपातज्वर के मुक्त होने पर समझे, उसमे ये लक्षण अधिक स्पष्ट होते हे । जिस प्रकार बुझता हुआ दिया एक बार चमकता हे, उसी प्रकार कुछ समय के लिये ये लक्षण प्रकट होते है । [ क्लम, मोह, ताप कम होता हे, मुख मे पाक होता हे, इन्द्रिया सुखी रहती है, देह मे दर्द नही रहता, पसीना छूटता है, मन स्वभाव मे गति करता है, अन्न की इच्छा होती है, सिर पर खाज होती है, यह ज्वर छूटने के चिह्न है ] । ( १ ) प्राय नवीन ज्वर बलवान् और बहुत दोषवाले व्यक्ति मे चिकित्सा करने पर सहसा उतर जाता है, तब अति भयानक होता है । ( २ ) जो ज्वर दोष के कारण वेग के क्रम मे धीरे धीरे उतरते है, उन चिरकालीन ज्वरा का मोक्ष (छूटना) भयानक नहीं होता ॥ ३२४-३२८ ॥ विगतक्लमसंतापमव्यथं विमलेन्द्रियम् ॥ ३२९ ॥ युक्तं प्रकृतिसत्त्वेन विद्यात्पुरुषमज्वरम् । सज्ज्वरो ज्वरमुक्तश्च विदाहीनि गुरूणि च ॥ ३३० ॥ असात्म्यान्यन्नपानानि विरुद्धानि विवर्जयेत् । व्यवायमतिचेष्टाश्च स्नानमत्यशनानि च ॥ ३३१ ॥ तथा ज्वरः शमं याति प्रशान्तो न च जायते । व्यायामं च व्यवायं च स्नानं चङ्क्रमणानि च ॥ ३३२ ॥ ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्न बलवान् भवेत् । असंजातबलो यस्तु ज्वरमुक्तो निषेवते ॥ ३३३ ॥ वर्ज्यमेतन्नरस्तस्य पुनरावर्तते ज्वरः । दुर्हृतेषु च दोषेषु यस्य वा विनिवर्तते ॥ ३३४ ॥ स्वल्पेनाप्यपचारेण तस्य व्यावर्तते पुनः । चिरकालपरिक्लिष्टं दुर्बलं दीनचेतसम् ॥ ३३५ ॥ अचिरेणैव कालेन स हन्ति पुनरागतः । अथवाऽपि परीपाकं धातुष्वेव क्रमान्मलाः ॥ ३३६ ॥ यान्ति ज्वरमकुर्वन्तस्ते तथाऽप्यपकुर्वते । दीनतां श्वयथु ग्लानिं पाण्डुतां नान्नकामताम् ॥ ३३७ ॥ कण्डूरूत्कोठपिडकाः कुर्वन्त्यग्निं च ते मृदुम् । एवमन्येऽपि च गदा व्यावर्तन्ते पुनर्गताः ॥ ३३८ ॥ अनिर्घातेन दोषाणामल्पैरप्यहितैर्नृणाम् ।
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२७
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२७ निवृत्तेऽपि ज्वरे तस्माद्यथावस्थं यथाबलम् । यथाप्राणं हरेद्दोषं प्रयोगैर्वा शमं नयेत् ॥ ३३९ ॥ मृदुभिः शोधनैः शुद्धिर्यापना वस्तयो हिताः । हिताश्च लघवो यूषा जाङ्गलामिषजा रसाः ॥ ३४० ॥ अभ्यङ्गोद्वर्त्तनस्नानधूपनाभ्यञ्जनानि च । हितानि पुनरावृत्ते ज्वरे तिक्तघृतानि च ॥ ३४१ ॥ गुर्व्यभिष्यन्द्यसात्म्यानां भोजनात्पुनरागते । लङ्घनोष्णोपचारादिः क्रमः कार्यश्च पूर्ववत् ॥ ३४२ ॥ किराततिक्तं तिक्ता मुस्तं पर्पटकोऽमृता । घ्नन्ति पीतानि चाभ्यासात्पुनरावर्तकं ज्वरम् ॥ ३४३ ॥ तस्यां तस्यामवस्थायां ज्वरितानां विचक्षणः । ज्वरक्रियाक्रमापेक्षी कुर्यात्तत्र चिकित्सितम् ॥ ३४४ ॥ रोगराट् सर्वभूतानामन्तकृद्दारुणो ज्वरः । तस्माद्विशेषतस्तस्य यतेत प्रशमं भिषक् ॥ ३४५ ॥ इति । ( ३ ) ज्वर से मुक्त पुरुष के लक्षण—क्लम ( थकान ) और सन्ताप से रहित, व्यथा से रहित, प्रसन्न इन्द्रियों वाले, स्वाभाविक मन वाले पुरुष को ज्वर से मुक्त समझना चाहिये । ( ४ ) ज्वर वाले और ज्वर से मुक्त दोनो पुरुषो को चाहिये कि विदाही, गुरु, असात्म्य अन्नपान और विरुद्ध भोजन का परित्याग कर दे । इसी प्रकार से व्यवाय ( स्त्रीसंग ), अधिक चलना-फिरना, स्नान, अधिक खाना इनका भी परित्याग करे । इस प्रकार करने से ज्वर शान्त हो जाता है और फिर दुबारा नहीं होता । ( ५ ) ज्वर से उठे रोगी जब तक बलवान् न हो तब तक व्यायाम, मैथुन, स्नान और घूमना-फिरना परित्याग कर देवे । ज्वर से मुक्त निर्बल व्यक्ति यदि इनका सेवन करे, तो ज्वर पुनः लौट आता है । (६) दोषों के भली प्रकार बाहर न निकलने पर जो ज्वर शान्त हो जाता है, वह थोडे से भी मिथ्या आहार-विहार से पुन आ जाता है । पुन लोट कर आया ज्वर देर से पीडित, निर्बल, कमजोरमन वाले, पुरुष को शीघ्र.ही मार देता है । (७) अथवा अवशिष्ट दोष ज्वर का पुन न करके धातुओ मे धीरे वीरे पकते रहते है । वे ज्वर को उत्पन्न करके अन्य हानियाँ करते है । जैसे—दीनता, शोथ, ग्लानि, पाण्डुता, भोजन मे अनिच्छा, कण्डू ( खाज ), कोठ, पिडकाये और मन्दाग्नि करते है । ( ८ ) इसी प्रकार से दोषो के सम्पूर्ण न निकलने पर जो रोग एक
३२८ चरकसंहिता [ अ० ४ बार नष्ट हो चुकते है, वे अहिताचरण से पुन हो जाते है। (६) इसलिये ज्वर के उतर जाने पर भी अवस्था, बल और श क के अनुसार दोषो का सशोधन अथवा प्रयोगो द्वार। इनका शमन करे। इसके लिये मृदु सशोधनो से शुद्धि, मुस्तादि यापना वस्तियाँ, लघु गुणवाले यूष, जाँगल पशु पक्षियो का मास-रस हितकारी है। इसी प्रकार अभ्यग, उबटन, स्नान, धूपन, अजन और तिक्त द्रव्यो से सावित या पञ्चतिक्त घृत ज्वर के पुन होजाने पर हितकारी है। (१०) जो ज्वर गुरु, अभिष्यन्दी और असात्म्य भोजन के सेवन से पुनः हुआ हो उसके लिये लङ्घन और उष्ण उपचार आदि प्रथम कहा हुआ क्रम पूर्व की भाँ ति बरते। (११) चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, पित्त पापड़ा और गिलोय इनका कषाय कुछ दिनो तक लगातार पीने से बार बार लौट कर आने वाला ज्वर नष्ट हो जाता है। ज्वराक्रान्त रोगी की उस उस अवस्था मे ज्वर-चिकित्सा- क्रम के अनुसार वैसी वैसी चिकित्सा कर । ज्वर रोगो का राजा है, सब प्राणियो का अन्त करने वाला है, वह कष्टदायक है। इसलिये वैद्य इसकी शान्ति मे विशेषतः प्रयत्न करे ॥३२६-३४५॥ तत्र श्लोकः—यथाक्रमं यथाप्रश्नमुक्त ज्वरचिकित्सितम् । अत्रिजेनाग्निवेशाय भूताना हितमिच्छता ॥ ३४६ ॥ भगवान् आत्रेय ने प्राणियो की हितकामना से अग्निवेश के प्रश्नो के क्रम से ज्वर की चिकित्सा का वर्णन कर दिया है ॥ ३४६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने तृतीयोऽध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ज्वर के सताप से रक्त-पित्त उत्पन्न होता है, इसलिये ज्वर के पीछे रक्त- पित्त की चिकित्सा के लिये इस अध्याय का अवतरण करते है। अथातो रक्तपित्तचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम 'रक्त-पित्त चिकित्सित' की व्याख्या करते है भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३२६
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३२६ विहरन्तं जितात्मानं पञ्चगङ्गे पुनर्वसुम् । प्रणम्योवाच निर्मोहमग्निवेशोऽग्निवर्चसम् ॥ ३ ॥ भगवन् रक्तपित्तस्य हेतुरुक्तः सलक्षणः । वक्तव्यं यत्परं तस्य वक्तुमर्हसि तद् गुरो ॥ ४ ॥ गुरुरुवाच—महागदं महावेगमग्निवच्छीघ्रकारि च । हेतुलक्षणविच्छीघ्रं रक्तपित्तमुपाचरेत् ॥ ५ ॥ तस्योष्णं तीक्ष्णमम्लं च कटूनि लवणानि च । घर्माश्चान्नविदाहश्च हेतुः पूर्वं निदर्शितः ॥ ६ ॥ तैर्हेतुभिः समुत्क्लिष्टं पित्तं रक्तं प्रपद्यते । तद्योनित्वात्प्रपन्नं च वर्धते तत्प्रदूषयेत् ॥ ७ ॥ तस्योष्मणा द्रवो धातुर्धातोर्धातोः प्रसिच्यते । स्विद्यतस्तेन संवृद्धिं भूयस्तदधिगच्छति ॥ ८ ॥ सयोगाद् दूषणात्तत्तु सामान्याद् गन्धवर्णयोः । रक्तस्य पित्तमाख्यातं रक्तपित्तं मनीषिभिः ॥ ९ ॥ प्लीहानं च यकृच्चैव तदधिष्ठाय वर्तते । स्रोतांसि रक्तवाहीनि तन्मूलानि हि देहिनाम् ॥ १० ॥ पञ्चगग (पजाब या पचनद) मे घूमते हुए जितेन्द्रिय, मोह से रहित, अग्नि के समान तेजस्वी पुनर्वसु को अग्निवेश ने नमस्कार कर निवेदन किया— हे भगवन् ! आपने प्रथम निदान-स्थान मे रक्त-पित्त के कारण और लक्षण का उपदेश किया है। इसके आगे रक्त-पित्त के विषय मे जो कुछ और अधिक कहना है, वह भी कृपा करके कहिये । भगवान् आत्रेय ने कहा—हेतु और लक्षणो को जानने वाले वैद्य का चाहिये कि अति वेग वाले, अग्नि के समान शीघ्र प्राणनाशक, महारोग रक्त-पित्त की चिकित्सा तुरन्त करे । इस रक्त-पित्त के कारण—उष्ण, तीक्ष्ण, अम्ल, कटु, लवण, घर्म (गरमी) और अन्न का विदाह ये रक्त-पित्त के कारण निदानस्थान मे कह दिये हैं। इन उपरोक्त कारणो मे प्रकुपित पित्त रक्तस्थान (यकृत् और प्लीहा) मे पहुच जाता है। रक्त के प्रभवस्थान यकृत् और प्लीहा मे पहुच कर पित्त बढता है और रक्त को भी दूषित करता है । इस पित्त की उष्णिामा से मासादि धातुओ मे स्वेद होने से द्रव धातु (रक्त) चूने लगता है। इसी कारण से रक्तभी मात्रा मे बढ जाता है। रक्तपित्त नाम का कारण—रक्त के साथ सयुक्त होने के कारण, रक्त को
३३० चरकसंहिता [ अ० ४ दूषित करने और रक्त के समान ही गन्ध और वर्ण होने से बुद्धिमान् व्यक्ति पित्त को 'रक्त-पित्त' कहते हैं। यह रक्त प्लीहा और यकृत् का आश्रय लेकर प्रवृत्त होता है। मनुष्यों के देह में रक्तवाही स्रोतों के मूल ये ही यकृत् और प्लीहा हैं ॥ ३-१० ॥ सान्द्रं सपाण्डु सस्नेहं पिच्छिलं च कफान्वितम् । श्यावारुणं सफेनं च तनु रूक्षं च वातिकम् ॥ ११ ॥ रक्तपित्तं कषायाभं कृष्णं गोमूत्रसन्निभम् । मेचकागारधूमाभमञ्जनाभं च पैत्तिकम् ॥ १२॥ संसृष्टलिङ्गं संसर्गात् त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् । कफ आदि दोषों के संसर्ग—रक्त-पित्त में यदि कफ का भी मिश्रण हो तो रक्त का रंग पाण्डुवर्ण, रक्त घट्ट ( गाढा, ) स्नेहयुक्त और चिकनास वाला होता है । यदि वायु का योग होता काला-लाल सा, झागयुक्त, पतला और रूखा होता है। पित्त की प्रबलता से रक्त-पित्त होता रक्त कषाय वर्ण की झलक वाला, काला, गोमूत्र के समान, मेचक ( काला, चिकना ), गृहधूम, अञ्जन, काजल के समान काला होता है, इसमे चमक रहती है। दो दोषों के मिलने पर उन दो दोषों के लक्षण दीखते है और तीनो दोषों के मिलने पर सान्निपातिक लक्षण दीखते है। [ जिस प्रकार सब गुल्मों मे वायु की प्रधानता रहने पर अन्य दोषों के मिलने पर पित्तगुल्म आदि होते है, उसी प्रकार रक्तपित्त मे पित्त की प्रधा- नता रहने पर भी पित्त-गुल्म आदि होते है। इनमे ऊर्ध्व गति वाले रक्तपित्त मे कफ का मिश्रण और अधोगति वाले रक्तपित्त मे वायु का मिश्रण रहता है]॥११-१२-॥ एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते ॥ १३ ॥ यत् त्रिदोषमसाध्यं तन्मन्दाग्नेरतिवेगवत् । व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत् ॥ १४ ॥ साध्य-असाध्य—इनमे से जो रक्तपित्त एक दोष से सम्बन्धित होता है, वह साध्य है। जिस रक्तपित्त मे दो दोष मिले रहते है वह याप्य है। जिसमे तीनों दोषों का योग रहता है वह असाध्य है। इसी प्रकार से मन्दाग्निवाले पुरुष मे एक दोष वाले रक्तपित्त का वेग यदि प्रबल हो तो वह भी असाध्य है। इसी तरह रोगों के कारण निर्बल शरीरवाले व्यक्ति मे, वृद्ध पुरुष मे आहार न करने वाले व्यक्ति से एक मार्ग वाला रक्तपित्त भी असाध्य है ॥१३-१४॥ गतिरूर्ध्वमधश्चैव रक्तपित्तस्य दर्शिता । ऊर्ध्वा सप्तविधद्वारा द्विद्वारा त्वधरा गतिः ॥ १५ ॥ सप्तच्छिद्राणि शिरसि, द्वे चाधः, साध्यमूर्ध्वगम् ।
अ० ४ ] चिकित्सास्थानम् ३३१ याप्यं त्वधोग, मागौ तु द्वावसाध्य प्रपद्यते ॥ १६ ॥ यदा तु सर्वच्छिद्रेभ्यो रोमकूपेभ्य एव च । वर्तते तामसङ्ख्येया गतिं तस्याऽऽहुराान्तिकाम् ॥ १७ ॥ यच्चोभयाभ्या मार्गाभ्यामतिमात्र प्रवर्तते । तुल्य कुणपगन्धेन रक्त कृष्णमतीव च ॥ १८ ॥ ससृष्ट कफवाताभ्या कण्ठे सज्जति चापि यन् । यच्चायुपद्रवैः सर्वैर्यथोक्तैः समभिद्रुतम् ॥ १९ ॥ हारिद्रनीलहरितताम्रैर्वर्णैरुपद्रुतम् । क्षीणस्य कासमानस्य यच्च तच्च न सिध्यति ॥ २० ॥ यद् द्विदोषानुग यद्वा शान्त शान्त प्रकुप्यति । मार्गान्मार्गं चरेद्यद्वा याप्य पित्तमसृक् च तत् ॥ २१ ॥ एकमार्ग बलवतो नातिवेग नवोत्थितम् । रक्तपित्त सुखे काले साध्य स्यान्निरुपद्रवम् ॥ २२ ॥ रक्तपित्त की गति—निदानस्थान मे रक्तपित्त की ऊर्ध्वगति के सात द्वार ( दो कान, दो नाक, दो आखे आर एक मुख ) है । इन सात मार्गों से रक्त बाहर आता है । अधोगति के दो मार्ग है गुदा और उपस्थ । स्त्रियो मे योनि- मार्ग का अन्तर्भाव उपस्थ मे ही हो जाता है । इनमे से ऊ॰ गति वाला रक्तपित्त साध्य है और अधोमार्ग से जाने वाला याप्य है, और जो रक्तपित्त दोनो मार्गों से प्रवृत्त होता है वह असाध्य है । जिस समय रक्तपित्त शरीर के नौ छिद्रो से तथा रोमकूपो से जाने लगता है, तब इसकी असख्य वा आन्तकी गति कहाती है । उस समय इसकी गति के मार्ग गिने नहीं जा सकते और रागी शीघ्र मर जाता है । जो रक्तपित्त दोनो मागो से बहुत मात्रा मे प्रवृत्त हाता है, जिस रक्तपित्त मे मुर्दे की सी बास आती हे, जिसका रग बहुत काला हाता है, जिसमे कफ और वायु का मिश्रण रहता है, जो रक्तपित्त गले से बाहर नहीं आता, वही रुक जाता है, निदानस्थान मे वर्णित दुर्बलता आदि उपद्रवो से युक्त, पीला, नीला, हरा, ताबे के समान रग का दीखता हो, क्षीण व्यक्ति का तथा जिसको खासी उठती हो, उसका 'रक्तपित्त' असाध्य है । जिस रक्तपित्त मे दो दोषो का मिश्रण रहता है, अथवा जो रुक रुक कर उत्पन्न होता है, अथवा कभी ऊर्ध्व मार्ग से चले और कभी अधोमार्ग से प्रवृत्त होता हो, वह रक्तपित्त याप्य होता है । बलवान् पुरुप मे एक मार्ग से प्रवृत्त होने वाला, जो बहुत प्रबल रूप मे न हो, नया ही उत्पन्न हुआ हा, साथ मे किसी प्रकार का उपद्रव न हो तो रक्तपित्त सुखकाल ( हेमन्त और शिशिर ऋतु ) मे साध्य है ।
३३२ चरकसंहिता [ अ० ४ [ हेमन्त शिशिर ऋतु मे उत्पन्न रक्तपित्त साध्य है, यहा पर ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त का ही ग्रहण करना चाहिये ]॥ १५-२२ ॥ स्निग्धोष्णमुष्णरूक्षं च रक्तपित्तस्य कारणम् । अधोगस्योत्तर प्रायः पूर्वं स्यादूर्ध्वगस्य तु ॥ २३ ॥ ऊर्ध्वगं कफसंसृष्टमधोगं मारुतानुगम् । द्विमार्गं कफवाताभ्यामुभाभ्यामनुबध्यते ॥ २४ ॥ रक्तपित्त का कारण—ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त का मुख्य कारण स्निग्ध और उष्ण आहार है, अधोगामी रक्तपित्तका कारण उष्ण और रूक्ष आहार है । इनमे ऊर्ध्व- गामी रक्तपित्त मे कफ का और अधोगामी मे वायु का मिश्रण रहता है । दोनो मार्गो से जाने वाले रक्तपित्त मे कफ और वायु दोनो का ही मिश्रण रहता है ॥ २३-२४ ॥ अक्षीणबलमांसस्य रक्तपित्तं यदश्नतः । तद्दोषदुष्टमुत्क्लिष्टं नादौ स्तम्भनमर्हति ॥ २५ ॥ गलग्रहं पूतिनस्यं मूर्च्छाऽयमरुचिं ज्वरम् । गुल्मं प्लीहानमानाहं किलासं कृच्छ्रमूत्रताम् ॥ २६ ॥ कुष्ठान्यर्शासि वीसर्पं वर्णनाशं भगन्दरम् । बुद्धीन्द्रियोपरोधं च कुर्यात्स्तम्भितमादितः ॥ २७ ॥ तस्मादुपेक्ष्यं बलिनो बलदोषविचारिणा । रक्तपित्तं प्रथमतः प्रवृद्धं सिद्धिमिच्छता ॥ २८ ॥ चिकित्सा विधि—जिस पुरुष का बल और मास क्षीण नही हुआ ओर जो अच्छी प्रकार से खाता पीता हो, रक्त दोषो से दूषित और बाहर की ओर निकलने की प्रवृत्ति रखता हो तो प्रारम्भ मे एकदम इसको न रोकना चाहिये । सहसा प्रारम्भ मे रोक देने से—गलग्रह, पूतिनस्य, मूर्च्छा, अरुचि, ज्वर, गुल्म, प्लीहा, आनाह, किलास (कुष्ठभेद), मूत्रकृच्छ्र, कुष्ठ, अर्श, वीसर्प, विवर्णता, भगन्दर, बुद्धि और इन्द्रियो का अपने विषयो मे प्रवृत्त न होना, ये उपद्रव होते है । इसलिये बल और दोष को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि बलवान् पुरुष मे प्रथम रक्त को रोके नही, बढे हुए रक्त को बहने दे । जब बल घट जाये या दोष कम हो जाये तब इसको बन्द करे ॥ २५-२८ ॥ प्रायेण हि समुत्क्लिष्टमामदोषाच्छरीरिणाम् । वृद्धिं प्रयाति पित्तासृक्तस्माल्लङ्घ्यमादितः ॥ २९ ॥ मार्गान्दोषानुबन्धं च निदानं प्रसमीक्ष्य च ।