भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 344

३३० चरकसंहिता [ अ० ४ दूषित करने और रक्त के समान ही गन्ध और वर्ण होने से बुद्धिमान् व्यक्ति पित्त को 'रक्त-पित्त' कहते हैं। यह रक्त प्लीहा और यकृत् का आश्रय लेकर प्रवृत्त होता है। मनुष्यों के देह में रक्तवाही स्रोतों के मूल ये ही यकृत् और प्लीहा हैं ॥ ३-१० ॥ सान्द्रं सपाण्डु सस्नेहं पिच्छिलं च कफान्वितम् । श्यावारुणं सफेनं च तनु रूक्षं च वातिकम् ॥ ११ ॥ रक्तपित्तं कषायाभं कृष्णं गोमूत्रसन्निभम् । मेचकागारधूमाभमञ्जनाभं च पैत्तिकम् ॥ १२॥ संसृष्टलिङ्गं संसर्गात् त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् । कफ आदि दोषों के संसर्ग—रक्त-पित्त में यदि कफ का भी मिश्रण हो तो रक्त का रंग पाण्डुवर्ण, रक्त घट्ट ( गाढा, ) स्नेहयुक्त और चिकनास वाला होता है । यदि वायु का योग होता काला-लाल सा, झागयुक्त, पतला और रूखा होता है। पित्त की प्रबलता से रक्त-पित्त होता रक्त कषाय वर्ण की झलक वाला, काला, गोमूत्र के समान, मेचक ( काला, चिकना ), गृहधूम, अञ्जन, काजल के समान काला होता है, इसमे चमक रहती है। दो दोषों के मिलने पर उन दो दोषों के लक्षण दीखते है और तीनो दोषों के मिलने पर सान्निपातिक लक्षण दीखते है। [ जिस प्रकार सब गुल्मों मे वायु की प्रधानता रहने पर अन्य दोषों के मिलने पर पित्तगुल्म आदि होते है, उसी प्रकार रक्तपित्त मे पित्त की प्रधा- नता रहने पर भी पित्त-गुल्म आदि होते है। इनमे ऊर्ध्व गति वाले रक्तपित्त मे कफ का मिश्रण और अधोगति वाले रक्तपित्त मे वायु का मिश्रण रहता है]॥११-१२-॥ एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते ॥ १३ ॥ यत् त्रिदोषमसाध्यं तन्मन्दाग्नेरतिवेगवत् । व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत् ॥ १४ ॥ साध्य-असाध्य—इनमे से जो रक्तपित्त एक दोष से सम्बन्धित होता है, वह साध्य है। जिस रक्तपित्त मे दो दोष मिले रहते है वह याप्य है। जिसमे तीनों दोषों का योग रहता है वह असाध्य है। इसी प्रकार से मन्दाग्निवाले पुरुष मे एक दोष वाले रक्तपित्त का वेग यदि प्रबल हो तो वह भी असाध्य है। इसी तरह रोगों के कारण निर्बल शरीरवाले व्यक्ति मे, वृद्ध पुरुष मे आहार न करने वाले व्यक्ति से एक मार्ग वाला रक्तपित्त भी असाध्य है ॥१३-१४॥ गतिरूर्ध्वमधश्चैव रक्तपित्तस्य दर्शिता । ऊर्ध्वा सप्तविधद्वारा द्विद्वारा त्वधरा गतिः ॥ १५ ॥ सप्तच्छिद्राणि शिरसि, द्वे चाधः, साध्यमूर्ध्वगम् ।