चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 343, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३२६ विहरन्तं जितात्मानं पञ्चगङ्गे पुनर्वसुम् । प्रणम्योवाच निर्मोहमग्निवेशोऽग्निवर्चसम् ॥ ३ ॥ भगवन् रक्तपित्तस्य हेतुरुक्तः सलक्षणः । वक्तव्यं यत्परं तस्य वक्तुमर्हसि तद् गुरो ॥ ४ ॥ गुरुरुवाच—महागदं महावेगमग्निवच्छीघ्रकारि च । हेतुलक्षणविच्छीघ्रं रक्तपित्तमुपाचरेत् ॥ ५ ॥ तस्योष्णं तीक्ष्णमम्लं च कटूनि लवणानि च । घर्माश्चान्नविदाहश्च हेतुः पूर्वं निदर्शितः ॥ ६ ॥ तैर्हेतुभिः समुत्क्लिष्टं पित्तं रक्तं प्रपद्यते । तद्योनित्वात्प्रपन्नं च वर्धते तत्प्रदूषयेत् ॥ ७ ॥ तस्योष्मणा द्रवो धातुर्धातोर्धातोः प्रसिच्यते । स्विद्यतस्तेन संवृद्धिं भूयस्तदधिगच्छति ॥ ८ ॥ सयोगाद् दूषणात्तत्तु सामान्याद् गन्धवर्णयोः । रक्तस्य पित्तमाख्यातं रक्तपित्तं मनीषिभिः ॥ ९ ॥ प्लीहानं च यकृच्चैव तदधिष्ठाय वर्तते । स्रोतांसि रक्तवाहीनि तन्मूलानि हि देहिनाम् ॥ १० ॥ पञ्चगग (पजाब या पचनद) मे घूमते हुए जितेन्द्रिय, मोह से रहित, अग्नि के समान तेजस्वी पुनर्वसु को अग्निवेश ने नमस्कार कर निवेदन किया— हे भगवन् ! आपने प्रथम निदान-स्थान मे रक्त-पित्त के कारण और लक्षण का उपदेश किया है। इसके आगे रक्त-पित्त के विषय मे जो कुछ और अधिक कहना है, वह भी कृपा करके कहिये । भगवान् आत्रेय ने कहा—हेतु और लक्षणो को जानने वाले वैद्य का चाहिये कि अति वेग वाले, अग्नि के समान शीघ्र प्राणनाशक, महारोग रक्त-पित्त की चिकित्सा तुरन्त करे । इस रक्त-पित्त के कारण—उष्ण, तीक्ष्ण, अम्ल, कटु, लवण, घर्म (गरमी) और अन्न का विदाह ये रक्त-पित्त के कारण निदानस्थान मे कह दिये हैं। इन उपरोक्त कारणो मे प्रकुपित पित्त रक्तस्थान (यकृत् और प्लीहा) मे पहुच जाता है। रक्त के प्रभवस्थान यकृत् और प्लीहा मे पहुच कर पित्त बढता है और रक्त को भी दूषित करता है । इस पित्त की उष्णिामा से मासादि धातुओ मे स्वेद होने से द्रव धातु (रक्त) चूने लगता है। इसी कारण से रक्तभी मात्रा मे बढ जाता है। रक्तपित्त नाम का कारण—रक्त के साथ सयुक्त होने के कारण, रक्त को