चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२८ चरकसंहिता [ अ० ४ बार नष्ट हो चुकते है, वे अहिताचरण से पुन हो जाते है। (६) इसलिये ज्वर के उतर जाने पर भी अवस्था, बल और श क के अनुसार दोषो का सशोधन अथवा प्रयोगो द्वार। इनका शमन करे। इसके लिये मृदु सशोधनो से शुद्धि, मुस्तादि यापना वस्तियाँ, लघु गुणवाले यूष, जाँगल पशु पक्षियो का मास-रस हितकारी है। इसी प्रकार अभ्यग, उबटन, स्नान, धूपन, अजन और तिक्त द्रव्यो से सावित या पञ्चतिक्त घृत ज्वर के पुन होजाने पर हितकारी है। (१०) जो ज्वर गुरु, अभिष्यन्दी और असात्म्य भोजन के सेवन से पुनः हुआ हो उसके लिये लङ्घन और उष्ण उपचार आदि प्रथम कहा हुआ क्रम पूर्व की भाँ ति बरते। (११) चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, पित्त पापड़ा और गिलोय इनका कषाय कुछ दिनो तक लगातार पीने से बार बार लौट कर आने वाला ज्वर नष्ट हो जाता है। ज्वराक्रान्त रोगी की उस उस अवस्था मे ज्वर-चिकित्सा- क्रम के अनुसार वैसी वैसी चिकित्सा कर । ज्वर रोगो का राजा है, सब प्राणियो का अन्त करने वाला है, वह कष्टदायक है। इसलिये वैद्य इसकी शान्ति मे विशेषतः प्रयत्न करे ॥३२६-३४५॥ तत्र श्लोकः—यथाक्रमं यथाप्रश्नमुक्त ज्वरचिकित्सितम् । अत्रिजेनाग्निवेशाय भूताना हितमिच्छता ॥ ३४६ ॥ भगवान् आत्रेय ने प्राणियो की हितकामना से अग्निवेश के प्रश्नो के क्रम से ज्वर की चिकित्सा का वर्णन कर दिया है ॥ ३४६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने तृतीयोऽध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ज्वर के सताप से रक्त-पित्त उत्पन्न होता है, इसलिये ज्वर के पीछे रक्त- पित्त की चिकित्सा के लिये इस अध्याय का अवतरण करते है। अथातो रक्तपित्तचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम 'रक्त-पित्त चिकित्सित' की व्याख्या करते है भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥