चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३१८ चरकसंहिता [ अ० ३ वात कफ से हो और इसमे वायु बलवान् हो तो गुरु, उष्ण, स्निग्ध, अनुपान बरते, यदि कफ बलवान् हो तब उष्ण, रूक्षप्राय चिकित्सा करे ॥ २६८-२७१ ॥ वातजे श्रमजे चैव पुराणे क्षतजे ज्वरे । लङ्घन न हितं विद्याच्छमनेस्तानूपाचरेत् ॥ २७२ ॥ वायुजन्य—वायुआ के श्रम से उत्पन्न, पुरातन ज्वर, क्षयजन्य ज्वर मे लङ्घन हितकारी नही है, उनके लिये शमनी चिकित्सा करे ॥ २७२ ॥ विक्षिप्यामाशयोष्माणं यस्माद् गत्वा रस नृणाम् । ज्वरं कुर्वन्ति दोषास्तु हीयतेऽग्निबल ततः ॥ २७३ ॥ यथा प्रज्वलितो वह्निः स्थाल्यामन्धनवानपि । न पचत्योदन सम्यगनिलप्रेरितो बहिः ॥ २७४ ॥ पक्तिस्थानात्तदा दोषरूष्मा क्षिप्तो बहिर्नृणाम् । न पचत्यन्वहृत कृच्छ्रात्पचति वा लघु ॥ २७५ ॥ अतोऽग्निबलरक्षार्थं लङ्घनादिक्रमो हितः । सप्ताहेन हि पच्यन्ते सर्वधातुगता मलाः ॥ २७६ ॥ निरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रायोऽष्टमेऽहनि । क्योकि आमाशय की ऊष्मा को बाहर निकाल कर रस-धातु मे जा कर ज्वर उत्पन्न करते है, इसलिये पुरुषो का अग्नि बल घट जाता है। जिस प्रकार चूल्हे मे जलती हुई आग ईन्धन होने पर भी वायु के झोके से बाहर की ओर आने से पतीली के चावल को नही पकाती, इसी प्रकार दोषो के कारण आमाशय से बाहर आई हुई अग्नि भुक्त भोजन को नहीं पचाती, या लघु भोजन कठिनाई से पचता है। इसलिये अग्निबल की रक्षा के लिये ही यह लङ्घन आदि उपक्रम बताया है। सब धातुओ के मल प्राय सात दिन के भीतर पच जाते है। इसलिये प्राय आठवे दिन ज्वर को 'निराम ज्वर' कहते है। [ कभी कभी सात दिन के पीछे भी सामता रह जाती है । ] ॥ २७३-२७६ ॥ उदीर्णदोषस्त्वल्पाग्निरश्नन् गुरु विशेषतः ॥ २७७ ॥ मुच्यते सहसा प्राणैश्चिरं क्लिश्यति वा नरः । एतस्मात्कारणाद्विद्वान्वातिकेऽप्यादितो ज्वरे ॥ २७८ ॥ नाति गुर्वति वा स्निग्ध भोजयेत्सहसा नरम् । ज्वरे मारुतजे त्वादावनपेक्ष्यापि हि क्रमम् ॥ २७९ ॥ कुर्यान्निरनुबन्धानामभ्यङ्गादीनुपक्रमान् । पाययित्वा कषायं च भोजयेद्रसभोजनम् ॥ २८० ॥ जीर्णज्वरहरं कुर्यात्सर्वश्वाप्युपक्रमम् ।