भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

३२० चरकसंहिता [ अ० ३ वर्धनेनैकदोषस्य क्षपणेनोच्छ्रितस्य वा ॥ २८६ ॥ कफस्थानानुपूर्व्या वा सन्निपातज्वरं जयेत् । सन्निपात ज्वर मे एक एक दोष का बढाना चाहिये और बढे हुए ( वृद्ध- तर ओर वृद्धतम ) दोष को घटावे । अथवा कफ स्थान के अनुक्रम से सन्नि- पात ज्वर की चिकित्सा करे । [ जैसे—कफ वृद्ध, पित्त वृद्धतर, वायु वृद्धतम हो तो मधुर देवे । अथवा कफ वृद्ध हो और वात-पित्त दोनो वृद्धतर हों तो भी मधुर रस देवे । मधुर रस जहा कफ को बढाता है वहा वायु और पित्त को घटाता है । यदि तीनो दोष समानावस्था मे हो तो प्रथम कफ की चिकित्सा करे । ] कफ का स्थान आमाशय है । इसलिये प्रथम स्थान को जीतना चाहिये । ( क ) अन्यत्र ज्वरो मे प्रथम वायु का फिर पित्त का और तब कफ का शमन करना चाहिये । परन्तु जीर्णज्वर मे प्रथम पित्त की चिकित्सा करनी चाहिये । नवज्वर तथा सन्निपात ज्वर मे प्रथम कफ को ही शमन करना चाहिये । ( ख ) एकोल्बण-सन्निपात मे प्रवृद्ध एक दोष को घटाना चाहिये और जो दोष क्षीण हो उनकी थोड़ी वृद्धि करनी चाहिये । ( ग ) वृद्धदोष सन्निपातो की भाति क्षीण- दोष सन्निपात भी बारह प्रकार के होते है, परन्तु इनमे दोष अपने लक्षणो को छोड देते है । जैसा कि कहा भी है, 'क्षीणा जहति स्व लिंगम् ।' इस प्रकार से पच्चीस सन्निपात होते है । इनकी चिकित्सा का सामान्य सूत्र भी कह दिया ॥२८६॥ संनिपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः ॥ २८७ ॥ शोथः सजायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते । रक्तावसेचनैः शीघ्रं सर्पिष्पानैश्च तं जयेत् ॥ २८८ ॥ प्रदेह्रैः कफपित्तघ्नैर्नावनैः कवलग्रहैः । शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैर्ज्वरो यस्य न शाम्यति ॥ २८९ ॥ शाखानुसारी रक्तस्य सोऽवसेकात्प्रशाम्यति । विसर्पेणाभिघातेन यश्च विस्फोटकैर्ज्वरः ॥ २९० ॥ तत्रादौ सर्पिषः पानं कफपित्तोत्तरो न चेत् । दौर्बल्याद्देहधातूनां ज्वरो जीर्णोऽनुवर्तते ॥ २९१ ॥ बल्यैः संबृंहणैस्तस्मादाहारैस्तमुपाचरेत् । कर्म साधारणं कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ ॥ २९२ ॥ आगन्तुरनुबन्धो हि प्रायशो विषमज्वरे । वातप्रधानं सर्पिर्भिर्बस्तिभिः सानुवासनैः ॥ २९३ ॥