चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 346, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३३२ चरकसंहिता [ अ० ४ [ हेमन्त शिशिर ऋतु मे उत्पन्न रक्तपित्त साध्य है, यहा पर ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त का ही ग्रहण करना चाहिये ]॥ १५-२२ ॥ स्निग्धोष्णमुष्णरूक्षं च रक्तपित्तस्य कारणम् । अधोगस्योत्तर प्रायः पूर्वं स्यादूर्ध्वगस्य तु ॥ २३ ॥ ऊर्ध्वगं कफसंसृष्टमधोगं मारुतानुगम् । द्विमार्गं कफवाताभ्यामुभाभ्यामनुबध्यते ॥ २४ ॥ रक्तपित्त का कारण—ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त का मुख्य कारण स्निग्ध और उष्ण आहार है, अधोगामी रक्तपित्तका कारण उष्ण और रूक्ष आहार है । इनमे ऊर्ध्व- गामी रक्तपित्त मे कफ का और अधोगामी मे वायु का मिश्रण रहता है । दोनो मार्गो से जाने वाले रक्तपित्त मे कफ और वायु दोनो का ही मिश्रण रहता है ॥ २३-२४ ॥ अक्षीणबलमांसस्य रक्तपित्तं यदश्नतः । तद्दोषदुष्टमुत्क्लिष्टं नादौ स्तम्भनमर्हति ॥ २५ ॥ गलग्रहं पूतिनस्यं मूर्च्छाऽयमरुचिं ज्वरम् । गुल्मं प्लीहानमानाहं किलासं कृच्छ्रमूत्रताम् ॥ २६ ॥ कुष्ठान्यर्शासि वीसर्पं वर्णनाशं भगन्दरम् । बुद्धीन्द्रियोपरोधं च कुर्यात्स्तम्भितमादितः ॥ २७ ॥ तस्मादुपेक्ष्यं बलिनो बलदोषविचारिणा । रक्तपित्तं प्रथमतः प्रवृद्धं सिद्धिमिच्छता ॥ २८ ॥ चिकित्सा विधि—जिस पुरुष का बल और मास क्षीण नही हुआ ओर जो अच्छी प्रकार से खाता पीता हो, रक्त दोषो से दूषित और बाहर की ओर निकलने की प्रवृत्ति रखता हो तो प्रारम्भ मे एकदम इसको न रोकना चाहिये । सहसा प्रारम्भ मे रोक देने से—गलग्रह, पूतिनस्य, मूर्च्छा, अरुचि, ज्वर, गुल्म, प्लीहा, आनाह, किलास (कुष्ठभेद), मूत्रकृच्छ्र, कुष्ठ, अर्श, वीसर्प, विवर्णता, भगन्दर, बुद्धि और इन्द्रियो का अपने विषयो मे प्रवृत्त न होना, ये उपद्रव होते है । इसलिये बल और दोष को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि बलवान् पुरुष मे प्रथम रक्त को रोके नही, बढे हुए रक्त को बहने दे । जब बल घट जाये या दोष कम हो जाये तब इसको बन्द करे ॥ २५-२८ ॥ प्रायेण हि समुत्क्लिष्टमामदोषाच्छरीरिणाम् । वृद्धिं प्रयाति पित्तासृक्तस्माल्लङ्घ्यमादितः ॥ २९ ॥ मार्गान्दोषानुबन्धं च निदानं प्रसमीक्ष्य च ।