भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 340

३२६ चरकसंहिता [अ० ३ कारण स्रावित प्रतीत होता हे, मल दाब के साथ शब्द युक्त, पतला आता है । ये लक्षण ज्वरमोक्ष के है । ये लक्षण सन्निपातज्वर के मुक्त होने पर समझे, उसमे ये लक्षण अधिक स्पष्ट होते हे । जिस प्रकार बुझता हुआ दिया एक बार चमकता हे, उसी प्रकार कुछ समय के लिये ये लक्षण प्रकट होते है । [ क्लम, मोह, ताप कम होता हे, मुख मे पाक होता हे, इन्द्रिया सुखी रहती है, देह मे दर्द नही रहता, पसीना छूटता है, मन स्वभाव मे गति करता है, अन्न की इच्छा होती है, सिर पर खाज होती है, यह ज्वर छूटने के चिह्न है ] । ( १ ) प्राय नवीन ज्वर बलवान् और बहुत दोषवाले व्यक्ति मे चिकित्सा करने पर सहसा उतर जाता है, तब अति भयानक होता है । ( २ ) जो ज्वर दोष के कारण वेग के क्रम मे धीरे धीरे उतरते है, उन चिरकालीन ज्वरा का मोक्ष (छूटना) भयानक नहीं होता ॥ ३२४-३२८ ॥ विगतक्लमसंतापमव्यथं विमलेन्द्रियम् ॥ ३२९ ॥ युक्तं प्रकृतिसत्त्वेन विद्यात्पुरुषमज्वरम् । सज्ज्वरो ज्वरमुक्तश्च विदाहीनि गुरूणि च ॥ ३३० ॥ असात्म्यान्यन्नपानानि विरुद्धानि विवर्जयेत् । व्यवायमतिचेष्टाश्च स्नानमत्यशनानि च ॥ ३३१ ॥ तथा ज्वरः शमं याति प्रशान्तो न च जायते । व्यायामं च व्यवायं च स्नानं चङ्क्रमणानि च ॥ ३३२ ॥ ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्न बलवान् भवेत् । असंजातबलो यस्तु ज्वरमुक्तो निषेवते ॥ ३३३ ॥ वर्ज्यमेतन्नरस्तस्य पुनरावर्तते ज्वरः । दुर्हृतेषु च दोषेषु यस्य वा विनिवर्तते ॥ ३३४ ॥ स्वल्पेनाप्यपचारेण तस्य व्यावर्तते पुनः । चिरकालपरिक्लिष्टं दुर्बलं दीनचेतसम् ॥ ३३५ ॥ अचिरेणैव कालेन स हन्ति पुनरागतः । अथवाऽपि परीपाकं धातुष्वेव क्रमान्मलाः ॥ ३३६ ॥ यान्ति ज्वरमकुर्वन्तस्ते तथाऽप्यपकुर्वते । दीनतां श्वयथु ग्लानिं पाण्डुतां नान्नकामताम् ॥ ३३७ ॥ कण्डूरूत्कोठपिडकाः कुर्वन्त्यग्निं च ते मृदुम् । एवमन्येऽपि च गदा व्यावर्तन्ते पुनर्गताः ॥ ३३८ ॥ अनिर्घातेन दोषाणामल्पैरप्यहितैर्नृणाम् ।