चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२५ ( १ ) शाप, अभिचार तथा भूतों के अभिषङ्ग के कारण ज्वर उत्पन्न हुआ हो तो दैव-व्यपाश्रय ( बलि, मगल, होम आदि ) चिकित्सा करे । ( २ ) अभिघातजन्य ज्वर मे—घृतपान, अभ्यङ्ग, रक्त-मोक्षण, मद्य, सात्म्य मास-रस तथा ओदन ( भाजन ) देवे । यदि आनाह ( अफारा ) हो तो मद्य- सात्म्य पुरुषो मे मदिरा के साथ मास रस का भोजन देवे । ( ३ ) क्षत और व्रण के कारण हुआ ज्वर क्षत और व्रण की चिकित्सा से शान्त होता है। काम, शोक और भय से उत्पन्न ज्वर सान्त्वना देने से, इष्ट वस्तु के मिलने से, वायु के शान्त करने से और प्रसन्नता पैदा करने से नष्ट हो जाता है। ( ४ ) क्रोध से उत्पन्न ज्वर वाञ्छित विषयो के, मन पसन्द बातो से, पित्त- नाशक चिकित्सा से और मधुर बचनो से शीघ्र शान्त हो जाता है । ( ५ ) काम मे क्रोधजन्य ज्वर, क्रोध से कामजन्य ज्वर, काम और क्रोध मे शोकजन्य तथा भयजन्य दोनो प्रकार के ज्वर नष्ट होते है । ( ६ ) जिस पुरुष को ज्वर का समय या ज्वर के आक्रमण की चिन्ता ( विचार मात्र ) मे ज्वर चढता हो, उसके लिये अभिलषित, विचित्र ( विस्मयोत्पादक ) विषयो द्वारा उसकी ज्वर की स्मृति भुला देवे ॥३१७-३२३॥ ज्वरप्रमोक्षे पुरुषः कूजन्वमति चेष्टते ॥ ३२४॥ श्वसन्विण्वर्णः स्विन्नाङ्गो वेपते लीयते मुहुः । प्रलपत्युष्णसर्वाङ्गः शीताङ्गश्च भवत्यपि ॥ ३२५ ॥ विसञ्ज्ञो ज्वरवेगार्त्तः सङ्क्रोध इव वीक्ष्यते । सदोषशब्दं च शकृद् द्रव स्रवति वेगवत् ॥ ३२६ ॥ लिङ्गान्येतानि जानीयाज्ज्वरमोक्षे विचक्षणः । बहुदोषस्य बलिनः प्रायेणाभिनवो ज्वरः ॥ ३२७ ॥ सक्रियादोषपक्त्या चेद्विमुञ्चति स दारुणम् । कृत्वा दोषवशाद्वेग क्रमादुपरमन्ति ये ॥ ३२८ ॥ तेषामदारुणो मोक्षो ज्वराणा चिरकारिणाम् । क्योकि धातुओ को छोडते समय दोष लीन हो जाता है, इसलिये ज्वर के जाने के समय रोगी के गले से कराहने की अव्यक्त ध्वनि होती है, वमन होता है, रोगी नाना प्रकार की चेष्टाये करता है, सास तेज चलता है, रग बदल जाता है, पसीना आता है, कापता•है, बार बार मूर्छित होता है, बुडबुडाता है, गरीर गरम या ठण्डा हो जाता है, सज्ञा रहित हो जाता है, ज्वर के वेग के