भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 338

३२४ चरकसंहिता [ अ० ३ भी इनका धूप विषम ज्वर मे देवे । उन्माद और अपस्मार ( हिस्टीरिया ) रोग मे जो धूम, धूप, नस्य और अञ्जन कहे हे, उन सब का विषम ज्वर मे प्रयोग करे । (६) मणि, ओषधियो के ( सहदेवी, जयन्ती आदि ), लाङ्गलिक द्रव्यों के, विष के धारण करने तथा अगदो के सेवन से विषम ज्वर नही होना । (१०) पवित्र होकर पार्वती, नन्दी आदि अनुचरो से युक्त, सोम माहेश्वरी आदि आठ मातृकाओ से युक्त श्री शङ्कर की पूजा करने से रोगी विषम ज्वर से मुक्त हो जाता है । (११) हजार सिर वाले, चर-अचर के स्वामी, व्यापक विष्णु की सहस्र नामो से पूजा करने पर सब प्रकार के ज्वरो से मुक्त हो जाता है । ( १२ ) ब्रह्मा, दोनो अश्वी, इन्द्र, अग्नि, हिमालय, गङ्गा, मरुद्-गण इनकी इष्टि ( यज्ञ ) द्वारा पूजा करने से ज्वर् से मुक्त हो जाता हे। (१३) भक्तिपूर्वक माता, पिता, गुरु की पूजा करने से, ब्रह्मचर्य से, तप से, सत्यव्रत से, नियमो के पालन से अर्थात् शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान इनके पालन से जप और होम के करने से, वेदा के सुनने से, सत्पुरुषो के दर्शन से रोगी ज्वर से शीघ्र मुक्त हो जाता है । (१४) ज्वर यदि रस मे स्थित हो तो वमन और उपवास कराना चाहिये । रक्तस्थ होने पर सेक, शीत प्रदेह, सशमन चिकित्सा करे। मास और मेद मे स्थित होने पर विरेचन और उपवास करावे । अस्थि और मज्जा मे आश्रित होने पर निरूह और स्निग्ध बस्तियों का प्रयोग करे। (शुक्रगत-ज्वर मे चिकित्सा निरर्थक है) ॥ २६६-३१६-॥ शापाभिचाराद् भूतानामभिषङ्गाच्च यो ज्वरः ॥ ३१७॥ दैवव्यपाश्रयं तत्र सर्वमौषधमिष्यते । अभिघातज्वरो नश्येत्पानाभ्यङ्गेन सर्पिषः ॥ ३१८ ॥ रक्तावसेकैर्मद्यैश्च सात्म्यैर्मांसरसौदनैः । सानाहो मद्यसात्म्याना मदिरारसभोजनैः ॥ ३१९ ॥ क्षताना व्रणिताना च क्षतव्रणचिकित्सया । आश्वासनेष्टलाभेन वायोः प्रशमनेन च ॥ ३२० ॥ हर्षणैश्च शमं यान्ति कामशोकभयज्वराः । काम्यैरथैर्मनोज्ञैश्च पित्तघ्नैश्चाप्युपक्रमैः ॥ ३२१ ॥ सद्वाक्यैः शाम्यति ह्याशु ज्वरः क्रोधसमुत्थितः । कामात्क्रोधज्वरो नाशं क्रोधात्कामसमुद्भवः ॥ ३२२ ॥ याति ताभ्यामुभाभ्या च भयशोकसमुत्थितः । ज्वरकालं च वेगं च चिन्तयञ्ज्वर्यते तु यः ॥ ३२३ ॥ तस्येष्टैस्तु विचित्रैश्च विषयैर्नाशयेत्स्मृतिम् ।