चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
यूषार्थं चणका मुद्गा मकुष्ठाश्चोपकल्पिताः ॥ ११६ ॥
४३२ चरकसंहिता [ अ० ८ मधु मिला कर प्रयोग करे । यह घी ज्वर, कास और स्वरभग को नष्ट करता है ॥ ११४-११५ ॥ आजस्य पयसश्चैव प्रयोगो जाङ्गला रसाः । यूषार्थं चणका मुद्गा मकुष्ठाश्चोपकल्पिताः ॥ ११६ ॥ ज्वराणां शमनीयो यः पूर्वमुक्तः क्रियाविधिः । यक्ष्मणो ज्वरदाहेषु ससर्पिष्कः प्रशस्यते ॥ ११७ ॥ कफप्रसेके बलवान् श्लेष्मिकश्छर्दयेन्नरः । पयसा फलयुक्तेन मधुरेण रसेन वा ॥ ११८ ॥ सर्पिष्मत्या यवाग्वा वा वमनीयोपसिद्धया । वान्तोऽन्नकाले लध्वन्नमाददीत सदीपनम् १ ॥ ११९ ॥ यवगोधूममाध्वीकशीध्वरिष्टसुरासवान् । जाङ्ग़लानि च शूल्यानि सबमानः कफं जयेत् ॥ १२० ॥ श्लेष्मणोऽतिप्रसेकेन वायुः श्लेष्माणमस्यति । कफप्रसेकं तं विद्वान्स्निग्धोष्णेनैव निर्जयेत् ॥ १२१ ॥ क्रिया कफप्रसेके या वन्या सेव प्रशस्यते । हृद्यानि चान्नपानानि वातघ्नानि लघूनि च ॥ १२२ ॥ (१०) बकरी का दूध, जांगल पशु-पक्षियों का मास-रस, यूष के लिये चना, मूग, मोठ का व्यवहार करे । ( ११ ) ज्वर की संशमन चिकित्सा जो प्रथम कह चुके है, उसी मे घृत मिला कर यक्ष्मा रोगी के दाह और ज्वर मे व्यवहार करे । ( १२ ) बलवान् और कफ प्रकृति वाले पुरुष को यदि कफ- प्रसेक हो तो वमन करावे । इसके लिये मैनफल युक्त मधुर दूध से या मैनफल से युक्त मास-रस से अथवा वमनीय द्रव्यो से सिद्ध की गई घृतयुक्त यवागू द्वारा रोगी को वमन करावे । ( १३ ) वमन होने के पीछे भोजन के समय अग्नि- दीपक लघु अन्न खिलावे । ( १४ ) जौ, गेहूँ, माध्वीक मद्य, शीधु, अरिष्ट, सुरा, आसव, जागल मास को शूलाकृत कर अर्थात् शलाका पर भूनकर उस मास से कफ को नष्ट करे । ( १५ ) फेफड़ो मे कफ के अधिक होने से वायु इस कफ को बाहर करता है, इसको कफ-प्रसेक कहते है । इसको स्निग्ध और उष्ण चिकित्सा से शान्त करे । हृदय के लिये प्रिय वातनाशक और लघु खान-पान पथ्य है । जो चिकित्सा कफ प्रसेक की है, वही वमन मे भी प्रशस्त है ॥ ११६-१२२ ॥ १ 'सवान्तोऽद्याच्च लध्वन्नमन्नकाले सदीपनम्' इति च ।
अ० ८ ] २८ चिकित्सितस्थानम् ४३३
अ० ८ ] २८ चिकित्सितस्थानम् ४३३ प्रायेणोपहताग्नित्वात्सपिच्छमतिसार्यते । प्राप्नोत्यास्यस्य वैरस्यं न चान्नमभिनन्दति ॥ १२३ ॥ तस्याग्निदीपनान् योगानतीसारनिबर्हणान् । वक्त्रशुद्धिकरन्कुर्यादरुचिप्रतिबाधकान् ॥ १२४ ॥ सनागरानिन्द्रयवान्पिबेद्वा तण्डुलाम्बुना । सिद्धां यवागूं जीर्णे च चाङ्गेरीतकदाडिमैः ॥ १२५ ॥ पाठां बिल्वं यवानी च पातव्यं तक्रसंयुतम् । दुरालभा शृङ्गवेर पाठा च सुरया सह ॥ १२६ ॥ जम्ब्वाम्रमध्यं बिल्वं च सकपित्थ सनागरम् । पेयामण्डेन पातव्यमतीसारनिवृत्तये ॥ १२७ ॥ एतानेव च योगांश्चोन्पाठ ळीन्कारयेत्खडान् । स¹सूपधान्यान्स्नेहान्साम्लान्सङ्ग्रहणान्परान् ॥ १२८ ॥ वेतसार्जुनजम्बूना मृणालीकृष्णगन्धयोः । श्रीपर्ण्या मदयन्त्याश्च यूथिकायाश्च पल्लवान् ॥ १२९ ॥ ²मातुलुङ्गस्य धातक्या दाडिमस्य च कारयेत् । स्नेहाम्ललवणोपेतान् खडान् सांग्राहिकान् परान् ॥ १३० ॥ चाङ्गेर्याश्चुक्रिकायाश्च दुग्धिकायाश्च कारयेत् । खडान्दधिसरोपेतान्ससर्पिष्कान्सदाडिमान् ॥ १३१ ॥ मासाना लघुपाकाना रसाः सांग्राहिकैर्युताः । व्यञ्जनार्थं प्रशस्यन्ते भोज्यार्थं रक्तशालयः ॥ १३२ ॥ स्थिरादिपञ्चमूलेन पाने शस्तं शृतं जलम् । तक्रं सुरा सचुक्रिका दाडिमस्याथवा रसः ॥ १३३ ॥ दीपन ग्राहि निर्दिष्ट भेषज भिन्नवर्चसे । ( १६ ) अग्नि के मन्द होने से प्रायः आँव से युक्त अतिसार हो जाता है, मुख का स्वाद बदल जाता है, भोजन भी अच्छा नहीं लगता । इसके लिये अग्नि को बढ़ाने वाले ओर अतिसार नाशक तथा मुख को शुद्ध करने वाले और अरुचि को नष्ट करने वाले प्रयोगो का व्यवहार करे । ( १ ) सोंठ ओर इन्द्रजौ के चूर्ण क' चावलो के मण्ड के साथ पीवे । औषध के जीर्ण होने पर चांगेरी ( तेपतिया ), छाछ और अनारदाना से सिद्ध यवागू को पीवे । ( २ ) पाठा, बेलगिरी, अजवायन इनको सम परिमाण मे १. 'सचक्रधान्यान्' इति पाठः । २ 'अय श्लोकः क्वचिद् न पठ्यते' ।
४३४ चरकसंहिता [ अ० ८ लेकर छाछ के साथ पीवे । दुरालभा, अदरक और पाठा इनको सम परिमाण में लेकर सुरा के साथ पीवे । ( ३ ) जामुन की गुठली, आम की गुठली, बेलगिरी, कैथ और सोंठ इनको समान भाग लेकर पेया ( यवागू ) के मण्ड के साथ पिलाने से अतिसार शान्त होता है । ( ४ ) ऊपर कहे पाठा आदि तीन योगो से खडयूष बनावे । इन खडयूषो को मसूर आदि दाल के योग्य, धान्य, घी आदि स्नेह से युक्त, चांगेरी छाछ और अनारदाने से खट्टे कर ले । ये अत्यन्त सांग्राहिक ( मल को बाधनेवाले ) है । ( ५ ) वेतस ( अम्ल- वेतस ), अर्जुन, जामुन, मृणाली ( वीरणमूल या लामज्जक ), सहजन, श्रीपर्णी ( गम्भारी ), मदयन्ती ( नवमल्लिका या मेहन्दी ), यूथिका ( जूही ), बिजौरा, धातकी, अनार इनके पत्तो से, घी आदि स्नेह से, कपित्थ आदि अम्ल, लवण से युक्त खडों को बनावे । ये पदा^१ अत्यन्त सङ्ग्राही हैं । ( ६ ) चागेरी, चुक्रिका ( इमली ) और दुग्धिका ( गुजराती मे नागला दूधेलो ) इनसे पृथक् २, दही का सर भाग ( मलाई ), घी और अनारदाने से यथाविधि खड बनावे । व्यजन के लिये शीघ्र पचाने वाले मासरसो को बेलगिरी आदि सग्राही वस्तुओ से सिद्ध करके दे वे । भोजन के लिये लाल चावल उत्तम हैं । ( ७ ) पीने के लिये स्थिरा, पञ्चमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी, गोखरू ) से सिद्ध जल, छाछ, सुरा, सिरका और अनार का रस दे । अतिसार से पीड़ित यक्ष्मा रोगी के लिये दीपन और ग्राही औषध कह दी है ॥१२३-१३३-॥ परं मुखस्य वैरस्यनाशनं रोचनं शृणु ॥ १३४ ॥ द्वौ कालौ दन्तपवनं भक्षयेन्मुखधावनम् । तद्वत्प्रक्षालयेदास्यं धारयेत्कवलग्रहान् ॥ १३५ ॥ पिबेद् धूमं ततो मृष्टमद्याद्दीपनपाचनम् । भेषजं पानमन्नं च हितमिष्टोपकल्पितम् ॥ १३६ ॥ त्वङ्मुस्तमेला धान्यानि मुस्तमामलकं त्वचम् । दार्वी त्वचो यवानी च पिप्पल्यस्तेजवत्यपि ॥ १३७ ॥ यवानी तिन्तिडीकं च पञ्चैते मुखधावनाः । श्लोकपादेष्वभिहिता रोचना मुखशोधनाः ॥ १३८ ॥ गुटिकां धारयेदास्ये चूर्णैर्वा शोधयेन्मुखम् । एषामालोडिताना वा धावयेत्कवलग्रहान् ॥ १३६ ॥ १ वेतस, अर्जुन, जामुन, एक योग, मृणाली, सहजन दूसरा योग और श्रीपर्णी आदि को पृथक् २ बरते । यह कविराज श्रीजयदेव की सम्मति है !
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३५
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३५ सुरामाध्वीकसीधूना तैलस्य मधुसर्पिषोः । कवलान्धारयेदिष्टान्क्षीरस्येक्षुरसस्य च ॥ १४० ॥ ( १७) मुख की विरसता को नष्ट करने वाली और रुचिकारक ओषधियो की सुनो— ( १) दोनो समय प्रात साय ( भोजन से पूर्व प्रात और सायं भोजन के पीछे, सोते समय ) मुख को साफ करने के लिये दातुन करे ; ( २ ) कषायो से मुख का प्रक्षालन करे, ( ३ ) मुख मे कवल धारण करे । पीछे से प्रायोगिक धूम पान करे । दीपक-पाचक औषध और हितकारी, मन लुभाता खान-पान खावे । ( ४ ) पाच योग—( १ ) दालचीनी, मोथा, इलायची, धनिया, ( २ ) मोथा, आवला, दालचीनी, ( ३ ) दारुहल्दी, दालचीनी, अजवायन, ( ४ ) पिप्पली, तेजवल, ( ५ ) अजवायन और तिन्तिडीक ( वृक्षाम्ल या इमली ) ये पाच योग श्लोक के एक २ चरण मे कहे हैं, ये रोचक और मुख को शोधन करते है । इनकी गोलिया बना कर मुख मे रक्खे, इनके चूर्णों से मुख को साफ करे । इनको पानी मे घोल कर ( या छाछ आदि मे भी ) मुख मे कवल धारण करे । ( ५ ) सुरा, माध्वीक, सीधु, तेल, घी, मधु, दूध और गन्ने का रस इनमे से जो अभीष्ट हो, उसका कवल मुख मे धारण करे ॥ १३४-१४० ॥ यवानी तिन्तिडीकं च नागरं साम्लवेतसम् । दाडिम बदर चाम्लं कार्षिकं चोपकल्पयेत् ॥ १४१ ॥ धान्यसौवर्चलाजाजीत्वराङ्गं चार्धकार्षिकम् । पिप्पलीना शतं चैकं द्वे शते मरिचस्य च ॥ १४२ ॥ शर्करायाश्च चत्वारि पलान्येकत्र चूर्णयेत् । जिह्वाविशोधनं हृद्यं तच्चूर्णं भक्तरोचनम् ॥ १४३ ॥ हृत्प्लीहपार्श्वशूलघ्नं विबन्धानाहनाशनम् । कासश्वासहरं ग्राहि ग्रहण्यर्शोविकारनुत् ॥ १४४ ॥ इति यवानीषाडवम् । ( १८ ) यवानीषाडव—अजवायन, तिन्तिडीक, सोठ, अम्लवेतस, अनार- दाना, खट्टे बेर प्रत्येक एक कर्ष, धनिया, सचल नमक, जीरा, दालचीनी प्रत्येक आधा कर्ष, पिप्पली १०० ( सख्या मे ), मरिच काली २००, खाण्ड ४ पल लेकर मिलावे । यह चूर्ण जिह्वा का विशोधक, भोजन मे रुचि करने वाला हृदयशूल, प्लीहा, पार्श्वशूल विबन्ध, आनाह, कास, श्वास, ग्रहणी और अर्शरोग को नष्ट करता और संग्राहक है ॥१४१-१४४॥
४३६ चरकसंहिता [ अ० ८ तालीशपत्रं मारचं नागरं पिप्पली शुभा । यथोत्तरं भागवृद्ध्या त्वगेले चार्धभागिके ॥ १४५ ॥ पिप्पल्याष्टगुणा चात्र प्रदेया सितशर्करा । कासश्वासारुचिहरं तच्चूर्णं दीपनं परम् ॥ १४६ ॥ हृत्पाण्डुग्रहणीदोषशोषप्लीहज्वरापहम् । वम्यतीसारशूलघ्न मूर्ध्ववातानुलोमनम् ॥ १४७ ॥ कल्पयेद् गुटिका चैव चूर्णं पक्त्वा सितोपलेः । गुटिका ह्यग्निसंयोगाच्चूर्णाल्लघुतराः स्मृताः ॥ १४८ ॥ इति तालीशाद्यं चूर्णं गुटिकाश्च । ( १७ ) तालीशाद्य चूर्ण—तालीशपत्र १ भाग, काली मिरिच २ भाग, सोंठ ३ भाग, पिप्पली ४ भाग, वंशलोचन ५ भाग, दालचीनी ॥ भाग, छोटी इला यची ॥ भाग, खाण्ड पिप्पलो से आठगुणा (३२ भाग) मिलावे, यह चूर्ण कास, श्वास, अरुचि को नष्ट करता है, अग्निदीपक है। हृदय रोग, पाण्डु, ग्रहणी, शोष, प्लीहा, ज्वर, वमन, अतिसार और शूल को नष्ट करता है और ऊर्ध्ववात का अनुलोमन करता है। खाड की चासनी करके उसमे ये वस्तुये मिला कर गुटिकायें भी बना सकते है। ये गुटिकायें चूर्ण की अपेक्षा अधिक लघु है, क्योकि इनका पाक आग पर होता है ॥ १४५-१४८ ॥ शुष्यते क्षीणमांसस्य कल्पितानि विधानवित् । दद्यान्मासादमांसानि बृंहणानि विशेषतः ॥ १४६ ॥ शोषिणे बर्हिणं दद्याद् बर्हिशब्देन चापरान् । गृध्रानुलूकांश्चाषांश्च विधिवत्सूपकल्पितान् ॥ १५० ॥ काकांस्तित्तिरिशब्देन वर्तकशब्देन चोरगान् । भृष्टान्मत्स्यान्त्रशब्देन दद्याद् गण्डूपदानपि ॥ १५१ ॥ लोमशान्स्थूलनकुलान्बिडालान्त्रोपकल्पितान् । शृगालशावांश्च । भषक् शशशब्देन दापयेत् ॥ १५२ ॥ सिंहानृक्षास्तरक्षूंश्च व्याघ्रान्न-विधस्तथा । मामादान् मृगशब्देन दद्यान्मासाभिवृद्धये ॥ १५३ ॥ गजखङ्गितुरङ्गाणा वेशवारीकृत' १ भिषक् । दद्यान्महिषशब्देन मांसं मांसाभिवृद्धये ॥ १५४ ॥ पथ्य-कल्पना प्रकार को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि जो यक्ष्मा क १ 'वेशवारकृतान्' इति पाठ. ।
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३७
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३७ रोगी सूख रहा हो और जिसका मास क्षीण होता जा रहा हो, उसको मास खाने वाले प्राणियो का मास देवे । क्योकि इस प्रकार के प्राणियो का मास अति पुष्टिकारक होता है । ( १ ) यक्ष्मारोगी को मार का मास देवे । गीध, उल्लू, चाषपक्षी के मास को विधिपूर्वक पकाकर रोगी का मोर का मास कहकर देवे । [ ज्ञात होने पर वह शायद घृणा से न खाये, इसलिये मोर के नाम से देवे ] । ( २ ) इसी प्रकार से कौआ का मास तीतर के नाम से, सापो का वर्मि ( मछली विशेष ) के नाम से, भूने हुए गिण्डोयो को मछली की आते कहकर देवे । लोमड़ी, बडे नेवले, नल्ली, गीदड के बच्चो के मास को विधिवत् बनाकर शशक का मास कहकर देवे । सिंह, भालू, तरक्षु, ( लकडबग्घा ), व्याघ्र ( बघेरा ), अन्य इसी प्रकार के मास खाने वाले प्राणियो के मासो को मृग का मास कहकर मास की वृद्धि के उद्देश्य से देवे । मास की वृद्धि के लिये हाथी, गैडा, घोडा, इनके मासों से वेशवार बनाकर उनको भैंसे का मास बतला कर देवे ॥ १४६-१५४ ॥ मासेनोपचिताङ्गाना मांसं मासकरं परम् । तीक्ष्णोष्णलाघवाच्छस्तं विशेषान्मृगपक्षिणाम् ॥ १५५ ॥ मासानि यान्यनभ्यासादनिष्टानि प्रयोजयेत् । तेषूपधा सुखं भोक्तुं तथा शक्यानि तानि हि ॥ १५६ ॥ जानञ्जुगुप्सन्नैवाद्याज्जग्धं वा पुनरुल्लिखेत् । तस्माच्छद्मोपसिद्धानि मासान्येतानि दापयेत् ॥ १५७ ॥ बर्हितित्तिरिदक्षाणा हसाना शूकरोष्ट्रयोः । खरगोमहिषाणा च मास मासकरं परम् ॥ १५८ ॥ योनिरष्टविधा चोक्ता सांगनामन्नपानिके । ता परीक्ष्य भिषग्विद्वान्दद्यान्मासानि शोपिणे ॥ १५६ ॥ मास से पुष्ट अगो वाले प्राणियो का मास विशेषत मास को बढाता है । तीक्ष्ण, उष्ण और लघु होने से विशेषकर पशु-पक्षियो का मास श्रेष्ठ है । जिसने जो मास कभी प्रथम खाया नही इसलिये उसे वह अच्छा न लगे तो सुख से खिलाने के लिये छिपाकर देना होता है । क्योकि यदि रोगी जान जाये तो खाने से इन्कार कर देगा अथवा खाकर घृणा से वमन कर देगा । इसलिये धोखे से छिपाकर इन मासो को देवे । मोर, तीतर, मुर्गा, हस, सुअर, ऊ ट, गधा, गाय, और भैस इनका मास विशेषतः मास का बढाता है । अन्नपानाध्याय
४३८ चरकसंहिता [ अ० ८ मे मांसो के प्राप्तिस्थान ( योनि ) आठ प्रकार के बतलाए हैं । वैद्य को चाहिये कि विवेचनापूर्वक यक्ष्मा के रोगी को उन मांसो का प्रयोग करावे ॥१५५-१५६॥ प्रसह्या भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः । आहारार्थं प्रदातव्या मात्रया वातशोषिणे ॥ १६० ॥ प्रतुदा विष्किराश्चैव धन्वजाश्च मृगद्विजाः । कफपित्तपरीतानां प्रयोज्याः शोषरोगिणाम् ॥ १६१ ॥ विधिवत्सूपसिद्धानि मनोज्ञानि मृदूनि च । रसवन्ति सुगन्धीनि मांसान्येतानि भक्षयेत् ॥ १६२ ॥ मासमेवाश्नतः शोषो माध्वीकं पिबतोऽपि च । नियतान्ल्पचित्तस्य चिरं काये न तिष्ठति ॥ १६३ ॥ जो यक्ष्मा का रोगी वात-प्रधान हो उसको प्रसह्य, भूशय, आनूप, जलज और जलचर पशु-पक्षियो का मास मात्रा मे भोजन के लिये देना चाहिये । जिस यक्ष्मा-रोग मे कफ और पित्त प्रबल हो उसका प्रतुद, विष्किर और धन्वज ( जाङ्गल ) पशु पक्षियो का मास देवे । विधिपूर्वक तैयार किये, मन को लुभाने वाले मृदु, शुभ रस और सुगन्धि से युक्त इन मांसो का रोगी खावे । मास का आहार करते हुए और माध्वीक को पीते हुए उदारचित्त [ जो चिन्ता नहीं करता ] रोगी के शरीर मे यक्ष्मा देर तक नहीं रहता ॥१६०-१६३॥ वारुणीमण्डनित्यस्य बहिर्मार्जनसेविनः । अविधारितवेगस्य यक्ष्मा न लभतेऽन्तरम् ॥ १६४ ॥ प्रसन्ना वारुणी शीधुमरिष्टानासवान्मधु । यथार्हमनुपानार्थं पिबेन्मांसानि भक्षयेत् ॥ १६५ ॥ मद्यं तैक्ष्ण्योष्ण्यवैशद्यसूक्ष्मत्वात्स्रोतसा मुखम् । प्रमथ्य विवृणोत्याशु तन्मोक्षात्सप्त धातवः ॥ १६६॥ पुष्यन्ति धातुपोषाच्च शीघ्र शोषः प्रशाम्यति । जो मनुष्य प्रतिदिन वारुणी-मण्ड का सेवन करता है, शरीर का बहि - शोधन करता है, उपस्थित वेगो को नही रोकता उसको यक्ष्मा रोग पीडित नही कर सकता । प्रसन्ना, वारुणी, शीधु, अरिष्ट, आसव, मधु इनमे से जो पदार्थ रोगी को योग्य लगे उसे अनुपान के रूप मे पान करे ओर मास खावे । मद्य तीक्ष्ण, उष्ण, विशद और सूक्ष्म होने से बलात् स्रोतों के मुखो को शीघ्र खोल देता है, मुखों के खुल जाने से रस आदि सातो धातुओ का पोषण होता है । धातुओ के पोषण होने से यक्ष्मा रोग शीघ्र शान्त हो जाता है ॥१६४-१६६॥
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३६
अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३६ मांसादमांसरसैः सिद्धं सर्पिः प्रयोजयेत् ॥ १६७ ॥ सक्षौद्रं पयसा सिद्धं सर्पिर्दशगुणेन वा । घृत-सेवन—मासभोजी मनुष्य पशु-पक्षियो के मास रस [ घी से चौगुना ] से सिद्ध घृत का उपयोग करे और जो मासभोजी न हो वह घी से दश गुणे गाय के दूध मे घी का सिद्ध करके शहद के साथ खाये ॥१६७॥ सिद्धं मधुरकैर्द्रव्यैर्दशमूलकषायकैः ॥ १६८ ॥ क्षीरमांसरसोपेतै 'घृत शोषहरं परम् । ( १ ) दशमूलादि घृत—गाय का घृत २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, मांसरस ८ प्रस्थ, दशमूल क्वाथ ८ प्रस्थ, जीवनीय गण आदि मधुर द्रव्य मिलित १ शराव, इनसे यथाविधि घी पकावे, यह अति शोषनाशक हे ॥१६८॥ पिप्पली-पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-नागरैः ॥ १६६ ॥ सयावशूकैः सक्षीरैः स्रोतसा शोधनं घृतम् । ( २ ) पञ्चकालादि घृत—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोठ, यवक्षार मिलित १ शराव इनका कल्क, घी २ प्रस्थ, दूध ८ प्रस्थ लेकर घृतपाक करना चाहिये । यह घृत स्रोतो का शोधक है ॥ १६६ ॥ रास्ना-बला-गोक्षुरक-स्थिरा-वर्षाभु-साधितम् ॥ १७० ॥ जीवन्तीपिप्पलीगर्भं सक्षीरं शोषनुद् घृतम् । ( ३ ) रास्नादि घृत—रास्ना, बला, गोखरु, सालपर्णी, पुनर्नवा, इनके क्वाथ मे, जीवन्ती और पिप्पली इनका कल्क, दूध मिलाकर घृत सिद्ध कर लेवे । यह घी शोष को नष्ट करता है ॥१७०॥ यवाग्वा वा पिबेन्मात्रा लिह्याद्वा मधुना सह ॥ १७१ ॥ सिद्धाना सर्पिषामेषामद्यादन्नेन वा सह । शुष्यतामेष निर्दिष्टो विधिराभ्यवहारिकः ॥ १७२ ॥ सेवन विधि—इन घृतो को यवागुओ के साथ मिलाकर पीना चाहिये, अथवा शहद के साथ चाटे अथवा इन घृतो को अन्न के साथ खावे । शोष- रोगियो के लिये यह अन्न-पान विधि कह दी है ॥ १७१-१७२ ॥ बहिःस्पर्शनमाश्रित्य वक्ष्यतेऽतः परं विधिः । स्नेहक्षीराम्बुकोष्ठे त स्वभ्यक्तमवगाहयेत् ॥ १७३ ॥ स्रोतोविवन्धमोक्षार्थं बलपुष्ट्यर्थमेव च । १. 'रसोपेतं' इति च ।
४४० चरकसंहिता [ अ० ८ उत्तीर्ण मिश्रकैः स्नेहः पुनरुक्तैः सुखैः करैः ॥ १७४ ॥ मृद्नीयात्सुखमासीनं सुख चोत्सादयेन्नरम् । इसके आगे बहि-परिमार्जन विधि कहते है— (१) यक्ष्मा के रोगी को नन्दनाद्य तैल आदि से अच्छी प्रकार मालिश करके तैल, दूध और पानी से भरे कोष्ठ मे बिठाना चाहिये । इससे स्रोतो के मुख खुलते है, शरीर मे बल आर पुष्टि आती हे । (२) उस मिश्रक स्नेह से बाहर निकल आने पर हाथो से घी या तैल लगाकर (धूप मे) सुख से बैठे रोगी के शरीर पर मालिश करे और सुख से उबटन करे ॥ १७३-१७४-॥ जीवन्ती शतवीर्या च विकसा सपुनर्नवाम् ॥ १७५ ॥ अश्वगन्धामपामार्ग तर्कारी मधुक बलाम् । विदारी सर्षप कुष्ठ तण्डुलानतसीफलम् ॥ १७६ ॥ माषांस्तिलांश्च किण्व च सर्वमेकत्र चूर्णयेत । त्रिगुणं यवचूर्णेन १ दध्ना युक्तं समाक्षिकम् ॥ १७७ ॥ एतदुत्सादनं कार्य पुष्टिवर्णबलप्रदम् । उत्सादन योग—(१) जीवन्ती, शतवीर्या [श्वेत दूब अथवा शतावरी], विकसा [मजीठ], पुनर्नवा, असगन्ध, अपामार्ग, तर्कारी [जयन्ती], मुलहठी, बला, विदारीकन्द, श्वेत सरसो, कूठ, चावल, अलसी, उड़द, तिल, किण्व (सुराबीज), इनको समभाग लेकर चूर्ण करे । इस चूर्ण मे तिगुना जौ का चून, दही और थोडा शहद मिलाकर उबटन करे यह उबटन पुष्टि, बल और वर्ण को देता है ॥ १७५-१७७-॥ गौरसर्षपकल्केन गन्धैश्चापि सुगन्धिभिः ॥ १७८ ॥ स्नायादृत्तुसुखैस्तोयैर्जीवनीयौषधैः शृतैः । (१) स्नानीय जल—श्वेत सरसो के कल्क से साधित जल से ग्रीष्म काल में, सुगन्धित गन्ध द्रव्यो से साधित जल से शीत काल मे और जीवनीय गण से साधित जल से वर्षा ऋतु मे स्नान करे । [अष्टाग संग्रहकार के मत से जीवनीय गण की औषधियों के काथ मे सरसो और सुगन्धित द्रव्यो का कल्क डालकर स्नान करना चाहिये । शीतकाल मे उष्ण जल से और ग्रीष्मकाल मे शीत जल से स्नान करना चाहिये ] ॥ १७८- ॥ गन्धैः समाल्यैर्वासोभिर्भूषणैश्च विभूषितः ॥ १७६ ॥ स्पृश्यान्संस्पृश्य संपूज्य देवताः सभिषग्द्विजाः । १. 'यवचूर्णं द्विगुणित' इति वा पाठः ।
अ० ८] चिकित्सितस्थानम् ४४१
अ० ८] चिकित्सितस्थानम् ४४१
इष्टवर्णरसस्पर्शगन्धवत्पानभोजनम् ॥ १८० ॥ इष्टमित्रैरुपहितं सुखमद्यात्सुखप्रदम् । (१) पथ्य गन्ध पुष्पमाला, स्वच्छ वस्त्र, आभूषणो से शोभित रोगी गाय, देवता, स्वर्ण आदि मगंलकारक वस्तुओ का स्पर्श करके, देव, ब्राह्मण और वैद्यो का पूजन करके, मनको पसन्द, वर्ण, रस, स्पर्श और गन्ध वाले, हितकारी, सुखदायक अन्न-पान को अभीष्ट व्यजनो के साथ खावे ॥ १७६-१८०-॥ समातीतानि धान्यानि कल्पनीयानि शुष्यताम् ॥ १८१ ॥ लघून्यहीनवीर्याणि स्वादूनि गन्धवन्ति च । यानि प्रहर्षकारीणि तानि पथ्यतमानि हि१ ॥ १८२ ॥ यच्चोपदेक्ष्यते पथ्यं क्षतक्षीणचिकित्सिते । यक्ष्मणस्तत्प्रयोक्तव्यं बलमांसाभिवृद्धये ॥ १८३ ॥ (२) शोष के रोगी को एक साल पुराने धान्य देने चाहिये । ये धान्य लघु, वीर्य से पूर्ण, स्वादु और गन्ध से युक्त, आनन्ददायक होने चाहिये, इस प्रकार के धान्य अतिपथ्य अर्थात् हितकारक है । क्षतक्षीण चिकित्सा म जो पथ्य कहेगे, बल, मास की वृद्धि के लिये उसका भी यक्ष्मा-रोग मे प्रयोग करे ॥ १८१-१८३ ॥ अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैरवगाह्रैर्विमार्जनैः । वस्तिभिः क्षीरसर्पिर्भिर्मासैर्मांसरसौदनैः ॥१८४॥ इष्टैर्मद्यैर्मनोज्ञानां गन्धानामुपसेवनैः । यथर्तुविहितैः स्नानैर्वासोभिरहृतैः प्रियैः ॥ १८५ ॥ सुहृदा रमणीयानां प्रमदाना च दर्शनैः । गीतवादित्रशब्दैश्च प्रियश्रुतिभिरेव च ॥ १८६ ॥ हर्षणाश्वासनैर्नित्यं गुरूणा समुपासनैः । ब्रह्मचर्येण दानेन तपसा देवतार्चनैः ॥ १८७ ॥ सत्येनाचारयोगेन मङ्गलैरप्यहिंसया२ । वैद्यविप्रार्चनाच्चैव रोगराजो निवर्तते ॥ १८८ ॥ अभ्यग से (तैल आदि की मालिश से) उबटन से, स्नान से, अवगाहन से, शरीर का बहि -परिमार्जन करने से, बस्तियो से, दूध-घी से, मास से, मास रस और भात से, मन के प्रिय मद्य से, मन को लुभाने वाले गन्धो के सेवन से,
१ 'लघूनि हीनवीर्याणि तानि पथ्यतमानि हि' इति च पाठ क्वचित् । २ 'रविहिंसया' इति वा ।
४४२ चरकसंहिता [अ० ६ ऋतु के अनुकूल स्नानो से, नूतन-स्वच्छ वस्त्रो के पहिनने से, सुन्दर मित्रो तथा स्त्रिया के दर्शन से, कर्णप्रिय गाने, बजाने की ध्वनि से, आनन्द और सान्त्वना से, गुरुओ के सत्सग से, ब्रह्मचर्य से, दान से, तप से, देवताओ की भक्ति से, सत्य से, शुभाचरण से, मगलग्रारी और अहिंसात्मक कार्यों से, वैद्य ओर ब्राह्मण की पूजा से ओर शुभ-कार्यो के करने से यक्ष्मा-रोग नष्ट हो जाता है ॥ १८४-१८८ ॥ यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः । ता वेदविहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ १८६ ॥ पुरातन काल में जिस यज्ञ क्रिया से यक्ष्मा रोग जीत लिया गया हो, उस वेदविहित यज्ञ को आरोग्य का इच्छुक पुरुष करे ॥ १८६ ॥ तत्र श्लोको—प्रागुत्पत्तिनिमित्तानि प्राग्रूप रूपसंग्रहः । समासाद् व्यासतःश्चोक्त भेषजं राजयक्ष्मणः ॥ १६० ॥ नामहेतुरसाध्यत्वं साध्यत्वं कृच्छ्रसाध्यता । इत्युक्तः संग्रहः कृत्स्नो राजयक्ष्मचिकित्सिते ॥ १६१ ॥ उपसहार—राजयक्ष्मा-रोग की उत्पत्ति, कारण, प्राग्-रूप, रूप तथा चिकित्सा का सक्षेप और विस्तार से कह दिया है। राजयक्ष्मा नाम का कारण, साध्यता, असाध्यता, कष्टसाध्यता ये सब राजयक्ष्म-चिकित्सा मे सग्रह कर दिये हैं ॥ १६०-१६१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने राजयक्ष्मचिकित्सित नामाष्टमोऽध्याय ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः अथात उन्मादचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे उन्माद की चिकित्सा कहते है। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ बुद्धिस्मृतिज्ञानतपोनिवासः पुनर्वसुः प्राणभृता शरण्यः । उन्मादहेत्वाकृतिभेषजानि कालेऽग्निवेशाय शशंस पृष्टः ॥ ३ ॥ बुद्धि (अवबोध), स्मृति (स्मरण), ज्ञान (तत्त्वज्ञान), तप (द्वन्द्व सहिष्णुता व्रत, तपश्चरण आदि) इनके निवास आश्रयभूत, प्राणियों की
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४४३
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४४३ रक्षा मे श्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने उचित अवसर पर, अग्निवेश के प्रश्न करने पर उन्माद-रोग के कारण, लक्षण और चिकित्सा का अग्निवेश को उपदेश किया ॥३॥ विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि प्रधर्षणं देवगुरुद्विजानाम् । उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो मनोऽभिघातो विषमाश्च चेष्टाः ॥४॥ उन्माद के कारण और सामान्य लक्षण—विरुद्ध ( संयोग-विरुद्ध जैसे— मछली और दूध ), विष आदि से दूषित और अपवित्र खान-पान, देव, गुरु- जन, ( माता-पिता और आचार्य ) और द्विजो (ब्राह्मणो ) का तिरस्कार, भय या हर्ष के कारण मन पर आघात होना, ( इसी प्रकार क्रोध, शोक, चिन्ता आदि से मन पर चोट पहुचना ) और शरीर की क्रियाओ का विषम होना, ये सब बाते उन्माद रोग के कारण है ॥ ४ ॥ तैरल्पसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रर्दूष्य । स्रोतांस्यधिष्ठाय मनोवहानि प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥ ५ ॥ सम्प्राप्ति—उपरोक्त कारणों से अल्पसत्त्व अर्थात् दुर्बल व्यक्ति मे मल ( वात आदि दोष ) प्रकुपित होकर, बुद्धि ज्ञान और स्मृति के आश्रय-स्थान हृदय को दूषित कर देते है ओर मनोवह स्रोता का आश्रय लेकर पुरुष के चित्त को शीघ्र ही माहित अर्थात् विपरीत ज्ञान वाला और विचलित कर देते है ॥५॥ धीविभ्रमः सत्त्वपरिस्रवश्च पर्याकुला दृष्टिरधीरता च । अबद्धवाक्त्वं हृदयं च शून्यं सामान्यमुन्मादगदस्य लिङ्गम् ॥ ६ ॥ लक्षण—धी-विभ्रम ( बुद्धि का भ्रश ), सत्त्वपरिस्रव ( मन की अति चञ्च- लता ), आखो मे व्याकुलता ( इधर-उधर देखना ), अधीरता, असम्बद्ध वाणी, हृदयशून्यता अर्थात् भाव से रहित हृदय होना, ये सब निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो के लक्षण है ॥ ६ ॥ स मूढचेता न सुख न दुःखं नाऽऽचारधर्मौ कुत एव शान्तिम् । विन्दत्यपास्तस्मृतिबुद्धिसंज्ञो भ्रमत्ययं चेत इतस्ततश्च ॥ ७ ॥ इस मूढ चित्तवाले पुरुष को न सुख का, न दुःख का और न आचार ( मर्यादा ) का, न धर्म का ज्ञान रहता है, इसलिये चित्त को कही भी शान्ति प्राप्त नही होती । इस व्यक्ति की स्मृति, बुद्धि और सज्ञा सब नष्ट हो जाती है, यह व्यक्ति चित्त को इधर-उधर डोलाता रहता है ॥ ७ ॥ समुद्भ्रमं बुद्धिमनास्मृतीनामुन्मादमागन्तुनिजोत्थमाहुः । तस्योद्भवं पञ्चविधं पृथक् तु १ वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सितं च ॥८॥ १ 'पञ्चविधस्य भूयो' इति वा ।
लक्षण और चिकित्सा पृथक् २ कहेगे ॥ ८ ॥
४४४ चरकसंहिता [ अ० ६ बुद्धि, मन और स्मृति का भ्रंश होना ही उन्माद का स्वरूप है। कारण- भेद से उन्माद रोग दो प्रकार का है । ( १ ) निज—शरीर के दोष से उत्पन्न और ( २ ) आगन्तुज । इस उन्माद की उत्पत्ति पाच प्रकार की है । ( १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और ५ आगन्तुज१ ) प्रत्येक के लक्षण और चिकित्सा पृथक् २ कहेगे ॥ ८ ॥ रूक्षाल्पशीतान्नविरेकधातुक्षयोपवासैरनिलोऽतिवृद्धः । चिन्तादियुक्तं हृदयं प्रदूष्य बुद्धिं स्मृति चाप्युपहन्ति शीघ्रम् ॥ ९ ॥ अस्थानहासस्मितनृत्यगीतवागङ्गविक्षेपणरोदनानि । पारुष्यकाश्यरु णवणताश्च जीर्णे बलं चानिलजस्य रूपम् ॥ १० ॥ ( १ ) वातजन्य उन्माद—रूक्ष अल्प और शीतल अन्न से, वमन या विरेचन-रूप से दोषा का निकालने वाले कमो से रस-रक्त आदि धातुओ का क्षय होने से, उपवासो से, बढ़ा हुआ वायु अल्पमत्त्व ( निर्बल ) व्यक्ति के चिन्ता, शोक क्रोध, लोभ, काम आदि से युक्त हृदय को दूषित करके, बुद्धि स्मृति का भी शीघ्र ही नष्ट ( चञ्चल, अस्थिर, बेचैन ) कर देता है । लक्षण—इसके कारण से व्यक्ति बिना स्थान ( बिना अवसर ) ही जार मे हसने लगता है, मुस्कराता है, नाचता है, रोता है, अगो का इधर-उधर चलाता है, रोता है। रोगी का शरीर कठोर, कृश, अरुण ( लाल ) वर्ण का हो जाता है, आहार के जीर्ण होने पर रोग का बल बढ जाता है, ये वातजन्य उन्माद के लक्षण है ॥ ६-१० ॥ अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैर्भोज्यैश्चितं पित्तमुदीर्णवेगम् । उन्मादमत्युग्रमनात्मवस्य हृदि श्रितं पूर्ववदाशु कुर्यात् ॥ ११ ॥ अमर्षसंरम्भविनग्नभावाः सन्तर्जनाभिद्रवणौष्ण्यरोषाः । प्रच्छायशीतान्नजलाभिलाषाः पीता च भाः पित्तकृतस्य लिङ्गम् ॥ १२ ॥ ( २ ) पित्तज उन्माद—अजीर्ण, कटु, अम्ल, विदाही और उष्ण आहार से कुपित हुआ पित्त अनात्मवान् ( अधीर, निर्बल ) पुरुष के हृदय मे स्थित १ सुश्रुत और अष्टाङ्ग-सग्रह मे विषजन्य उन्माद का मान कर छ प्रकार के उन्माद माने है। वहा कहा है-‘षडुन्मादा भवन्ति’ । परन्तु क्योकि विष की मद-सज्ञा होने से इसका निजोन्माद मे ही अन्तर्भाव करना चाहिये । जैसे— 'यथास्व तत्र भेषजम्' । सुश्रुत—'यश्च मद्यकृत प्रोक्तो विषजो रौधिरश्च य । सर्व एव मदा नर्त्तं वातपित्तकफात् त्रयात् ॥
अ० ९] चिकित्सास्थानम् ४४५
अ० ९] चिकित्सास्थानम् ४४५ होकर, हृदय को दूषित करके शीघ्र ही अति भयकर, तीव्र, उन्माद का उत्पन्न करता है। लक्षण--विना अवसर के ही अमर्ष अर्थात् अक्षमा, क्रोध करना, संरम्भ (किसी काम मे बहुत जल्दी करना), नगा हो जाना, संतर्जन (भर्त्सना), अभिद्रवण (भागना), शरीर का उष्ण होना, क्रोध करना, छायायुक्त स्थान की चाह, शीतल खान-पान की इच्छा का होना, शरीर मे पिलाई की झलक होना, ये सब पित्तजन्य उन्माद के लक्षण है। इस मे रोग का बल भोजन की जीर्ण- अवस्था मे अधिक होता है ॥ ११-१२ ॥ संपूर्यैर्मन्दविचेष्टितस्य सोष्मा कफो मर्मणि संप्रवृद्धः । बुद्धिं स्मृति चाप्युपहृत्य चित्तं प्रमोहयन्संजनयेद्विकारम् ॥ १३ ॥ वाक्चेष्टितं मन्दमरोचकश्च नारीविविक्तप्रियताऽतिनिद्रा । छर्दिश्च लाला च बलं च भुक्ते नखादिशौक्ल्यं च कफात्मके स्यात् ॥१४॥ (३) कफज उन्माद—मन्द चेष्टाशील (प्राय करके शयन, आसन आदि पर रहने वाले), व्यक्ति के अति भोजन करने से, ऊष्मा अर्थात् उष्णता की इच्छा सहित कफ, मर्म अर्थात् हृदय मे बढ कर, बुद्धि और स्मृति का नाश करके चित्त को मोहित कर उन्माद रोग को उत्पन्न करता है१ । लक्षण—वाणी और शरीर की चेष्टा का मन्द होना, अरोचक (अरुचि), स्त्रीसग की चाह, एकान्त, निर्जन स्थान की अभिलाषा, नीद का अधिक आना, छर्दि और लाला-स्राव, आहार के खाने पर रोग का बल बढना, नख, त्वचा, मूत्र आदि का श्वेत होना कफोन्माद के लक्षण है ॥ १३-१४ ॥ यः सन्निपातप्रभवोऽतिघोरः सर्वैः समस्तैः स तु हेतुभिः स्यात् । सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति तादृग्विरुद्धभेषज्यविधिर्विवर्ज्यः ॥ १५ ॥ (४) सन्निपातजन्य उन्माद—तीनो दोषों से मिलकर उत्पन्न हुआ उन्माद अति दारुण होता है। इसमे वात आदि तीनो दोष कारण रूप से सम्मिलित रहते है, इसलिये इसमे सब दोषों के लक्षण भी रहते है। इसमे चिकित्सा परस्पर विरोधिनी होने के कारण यह असाध्य है ॥ १५ ॥ देवर्षिगन्धर्वपिशाचयक्षरक्षःपितॄणामभिधर्षणानि । आगन्तुहेतुर्नियमव्रतादि मिथ्याकृतं कर्म च पूर्वदेहे ॥ १६ ॥ १ कफान्माद मे उष्णता की अभिलाषा होती है। जैसा कि सुश्रुत मे कहा ह— “निद्रापरोऽल्पकथनोऽल्पभुगुष्णसेवी- रात्रौ भृश गवति चापि कफप्रयोगात् ।”
४४६ चरकसंहिता [ अ० ६ अमर्त्यवाग्विक्रमवीर्यचेष्टो ज्ञानादिविज्ञानबलादिभिर्यः । उन्मादकालोऽनियतश्च यस्य भूतोत्थमुन्मादमुदाहरेत्तम् ॥ १७ ॥ अदूषयन्तः पुरुषस्य देहं देवाद्यः स्वैश्च गुणप्रभावैः । विशन्त्यदृश्यास्तरसा यथैव छायायातपौ दर्पणसूर्यकान्तौ ॥ १८ ॥ ( ५ ) आगन्तुज उन्माद—देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, राक्षस ( राक्षस और ब्रह्मराक्षस ) और पितर इन आठो ग्रहो का तिरस्कार करना, नियमपूर्वक व्रतादि का आचरण न करना और पूर्वजन्म मे उत्तम कर्म न होना ये आगन्तुज उन्माद रोग के कारण है । लक्षण—(१) जिस उन्माद-रोगी मे अमानुषीय ( दैवी ), वाणी, पराक्रम, शूरता, शरीर क्रियाये दिखाई दे, जिसका ज्ञान, बुद्धि, स्मृति, विज्ञान ( शिल्प सम्बन्धी ज्ञान ), और अमानुषी बल ( मनुष्य सीमा से अधिक ) प्रतीत हो, जिस उन्माद का काल निश्चय न हो ( कभी प्रात, कभी मध्याह्न और कभी सायकाल हो ), इस प्रकार के उन्माद को भूतोन्माद जानना चाहिये । जिस प्रकार अपने गुणो के प्रभाव से दर्पण मे छाया ( प्रतिबिम्ब ) और सूर्य कान्त- मणि मे सूर्य की किरणे प्रवेश करती है, परन्तु दिखाई नही देती, उसी प्रकार से देव आदि भी मनुष्य के शरीर को दूषित किये बिना ही अपने गुणों के प्रभाव से अतिवेग से प्रविष्ट हो जाते है । [ ये वात आदि दोषो के समान शरीर को दूषित नही करते ] ॥ १६-१८ ॥ आघातकालास्तु सपूर्वरूपाः प्रोक्ता निदानेऽथ सुरादिभिश्च । उन्मादरूपाणि पृथङ्निबोध कालं च गम्यान्पुरुषांश्च तेषाम् ॥ १९ ॥ अभिगमनीय पुरुषो पर आघात ( आक्रमण ) के काल और आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप ये निदान स्थान मे प्रथम कह दिये है । अब देवता आदि आठो ग्रहो के द्वारा उत्पन्न उन्माद के लक्षण, अभिगमन-काल और यह रोग जिन पुरुषों को होता है यह सब पृथक् २ सुनो । [ यद्यपि देव आदि का प्रवेश दिखाई नही देता तथापि ज्ञान, विज्ञान- शीलता आदि लक्षणो से इनका अनुमान करना चाहिये ] ॥ १६ ॥ तद्यथा—सौम्यदृष्टि गम्भीरमप्रधृष्यमकोपनमस्वप्नमभोजनाभिला- षिणमल्पस्वेद-मूत्र-पुरीष-वाचं शुभगन्धं फुल्ल-पद्म-वदनमिति देवोन्मत्तं विद्यात् ॥ २० ॥ ( १ ) देवोन्माद—दृष्टि प्रसन्न ( निर्मल आख ) हो, गम्भीर हो, लज्जाशील हो, क्रोध से रहित हो, निद्रा से रहित हो, भोजन की अभिलाषा से रहित हो,
थोडे पसीने हो, थोडे ही मूत्र और मल हो, थोड़ा बोले, शोभन गन्ध हो, खिले हुए कमल के समान विकसित मुख हो, ऐसे लक्षणों वाले पुरुष को देवग्रहो से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २० ॥ गुरुवृद्धसिद्धर्षीणामभिशापाभिचाराभिध्यानानुरूपाहारचेष्टान्याहार तैरून्मत्तं विद्यात् ॥ २१ ॥ (२) गुरु वृद्ध आदि से उत्पन्न उन्माद—गुरु, वृद्ध, सिद्ध ( इन तीन ग्रन्भेदो ) और ऋषियो के अभिशाप, अभिचार, और अभिध्यान के अनुकूल जिस रोगी की चेष्टा आदि हो, उसको गुरु, वृद्ध और सिद्ध ग्रहो से उन्मत्त हुआ जाने १ ॥ २१ ॥ अप्रसन्नदृष्टिमपश्यन्तं निद्रालु प्रतिहतवाचमनन्नाभिलाषिणमरोच- काविपाकपरीतं पितृभिरुन्मत्तं विद्यात् ॥ २२ ॥ (३) पित्तग्रह—मलिन दृष्टि, लोगो की ओर आख उठा कर न देखे, निद्राशील, निरुद्धवाक् (रुक रुक कर बोले ), अन्न की चाह न रखे, परन्तु पितृभोज्य तिल गुड़ आदि की चाह करे, अरोचक, अविपाक ( मन्दाग्नि ) युक्त हो, ऐसे पुरुष को पितृग्रहो से उन्मत्त समझे ॥ २२ ॥ चण्डं साहसिकं तीक्ष्णं गम्भीरमप्रधृष्यं मुख-वाद्य-नृत्य-गीतान्न-पान- स्नान-माल्य-धूप-गन्ध-रति रक्त-वस्त्र-बलि-कर्म-हास्य-कथानुयोगप्रियं शुभ- गन्धं च गन्धर्वोन्मत्तं विद्यात् ॥ २३ ॥ (४) गन्धर्व-ग्रह—मुख से बाजा बजावे, नाचे, गावे, खान-पान, स्नान, माला, धूप और सुगन्धित वस्तुओ की चाह करे, लाल वस्त्र, बलिकर्म, हास्य, कथा ( बातचीत ), अनुयोग ( पूछने की इच्छा ) करे और शुभ गन्ध युक्त हो, ऐसे मनुष्य को गन्धर्व-ग्रह से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २३ ॥ असकृत्स्वप्न-रोदन-हास्यं नृत्य-गीत-वाद्य-पाठ कथान्न-पान-स्नान- माल्य-धूप-गन्ध-रति रक्त-विप्लुताक्ष द्विजाति-वैद्य-परिवादिनं रहस्य- भाषिणमिति यक्षोन्मत्तं विद्यात् ॥ २४ ॥ (५) यक्षोन्माद—बार-बार नीद ले, लेटे, रोवे, हसे, नाचे, गावे-बजावे, पाठ करे, बातचीत, खानपान, स्नान, माला, धूप, गन्ध मे इच्छा रखे, आखे लाल और भय से चकित हो, ब्राह्मण आदि द्विजो तथा वैद्यो की निन्दा करे, १ अष्टाग-सग्रह मे १८ ग्रह गिने है । जैसे—सुर, असुर, गन्धर्व, उरग, यक्ष, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, पिशाच, प्रेत, कूष्माण्डक, ककाल, दौर्किर, बेताल, पितृ, ऋषि, गुरु, सिद्ध और वृद्ध ।
४४८ चरकसंहिता [अ० ६
एकान्त मे बातचीत करे, ऐसे प्रकृति वाले पुरुष को यक्षग्रह से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २४ ॥ नष्टनिद्रमन्न-पान-द्वेषिणमनाहारमप्रतिबलिनं शस्त्र-शोणित-मांस-रक्त- माल्याभिलाषिणं सन्तर्जकं च राक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥ २५ ॥ (६) राक्षसोन्माद—रात को नींद न आये, रोगी रात को विचरे, खान- पान से द्वेप रखे, बिना आहार के भी अति बलवान् हो, शस्त्र, रक्त, मास, लाल माला की चाह करे ओर दूसरे को डाट का भय दिखावे, ऐसे व्यक्ति को राक्षस- ग्रह से उन्मत्त जाने ॥ २५ ॥ प्रहास-नृत्य-प्रधानं १ देव-विप्र-वैद्य-द्वेपावज्ञाभिः स्तुति- २ वेद-मन्त्र-शा- स्त्रोदाहरणैः काष्ठादिभिरात्मपीडनेन च ब्रह्मराक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥२६॥ (७) ब्रह्मराक्षस—हास्य करे और नृत्य करे, देव, ब्राह्मण और वैद्यो मे द्वेष, अनाहार तथा देवता आदि की स्तुति करे, वेद, मत्र, धर्मशास्त्र इनके अनेक उदाहरण दे, लकडी, डेले आदि से अपने शरीर को आघात पहुचावे, ऐसे व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस से उन्मत्त समझे ॥२६॥ अस्वस्थचित्तं स्थानमलभमानं नृत्य-गीत-हासिनं बद्धाबद्धप्रलापिनं ३ संकर-कूट-मलिन-रथ्याचैल-तृणाश्म-काष्ठाधिरोहणरतिं ४ संभिन्न-रूक्ष- वर्ण-स्वरं नग्नं विधावन्तं नैकत्र तिष्ठन्तं दुःखान्यावेदयन्तं नष्टस्मृतिं च पिशाचोन्मत्तं विद्यात् ॥ २७ ॥ (८) पिशाचोन्माद—अस्वस्थ मन हो, नाचे, गावे, हसे, सम्बद्ध और असम्बद्ध बातचीत करे, संकर (झाडू से एकत्र किये धूल तिनके आदि), कूट (मिट्टी का ढेर), मैले रास्ते, मलिन वस्त्र, तिनके, पत्थर, लकडी इन पर चढने की प्रवृत्ति हो, जिसके वर्ण मिलेजुले हो, स्वर रूखा ओर एक समान न रहता हो (बदलता रहे), नगा रहे, इधर-उधर भागे, एक स्थान पर न बैठे, दूसरे के सामने अपने दुःख की कथा कहे तथा स्मृति नष्ट हो गई हो, ऐसे व्यक्ति को पिशाचग्रह से उन्मत्त समझे ॥ २७ ॥ तत्र शौचाचारं तपःस्वाध्यायकोविदं नर प्रायः शुक्लप्रतिपदि त्रयो- दश्या च देवाः, ज्ञान-शुचि-विविक्त-सेविनं धर्म-शास्त्र-श्रुति-काव्य-कुशलं प्रायः षष्टिनवम्योर्ऋषयः, मातृ-पितृगुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्योपसेविनं प्रायो दशम्याममावास्यायां च पितरः, गन्धर्वास्तु स्तुति-गीत-वादित्र-रति पर- १ 'प्रहासनृत्यवादिन' इति । २ 'वज्ञाभिस्तुति-' इति । ३. 'बद्धप्रभाषिण' इति च । ४. 'तृणेषु आरोहण-' इति च पाठः ।
अ० ९ ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६
अ० ९ ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६ दार-गन्ध-माल्य-प्रियं शोचाचारं द्वादश्या चतुर्थ्यां च, सत्त्व-बल-रूप- गर्व-शौर्य-युक्तं माल्यानुलेपनं हास्यप्रियमतिवाक्करणं प्रायः शुक्लैकादश्यां सप्तम्यां च यक्षाः, स्वाध्याय-तपो-नियमोपवास-व्रतचर्या-देव-यति-गुरु-पू- जारति नष्टशौचं ब्रह्मवादिनं शूरमानिनं देवतागार-सलिल-क्रीडनरति प्रायः शुक्लपञ्चम्यां पूर्णचन्द्रदर्शने च ब्रह्मराक्षसाः, रक्षःपिशाचास्तु हीन-सत्त्व- पिशुन-क्रौण-लुब्धं प्रायो द्वितीयातृतीयाष्टमीषु पुरुषं छिद्रमवेक्ष्याभिधर्ष- यन्ति१ । इत्यपरिसंख्येयानां ग्रहाणामाविष्कृततमा ह्यष्टावेते व्या- ख्याताः ॥ २८ ॥ आगमन काल—इनमे शौच ( शुचि, पवित्र ) आचार वाले, तप और वेदाध्ययन मे पण्डित पुरुष के छिद्र ( त्रुटि अवकाश ) को ढूंढकर प्रायः शुक्ल- पक्ष की प्रतिपदा या त्रयोदशी के दिन उसको देवग्रह आक्रान्त करते हैं। ऋषि- ग्रह—स्नान, पवित्र द्रव्य, एकान्तस्थान सेवी, धर्मशास्त्र, वेद मे कुशल व्यक्ति को प्राय करके छठी या नवी तिथि के-दिन आक्रान्त करते है। पितृग्रह-प्रायः माता, पिता, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य की सेवा करने वाले में त्रुटि देखकर दशमी या अमावस्या-तिथि मे आक्रमण करते है। गन्धर्वग्रह— स्तुति, गाने-बजाने मे रत, परस्त्री, गन्ध और माला के प्रिय, पवित्र आचार वाले व्यक्ति मे छिद्र देखकर प्राय बारहवी या चौदहवी तिथि मे आक्रमण करते है। यक्षग्रह—सत्त्व, बल, रूप, अहकार, शौर्य से युक्त माला, अगराग और हास्य के प्रिय, अतिवाक्पटु व्यक्ति मे छिद्र पाकर प्रायः करके शुक्लपक्ष की एकादशी या सतमी मे आक्रमण करते है। ब्रह्मराक्षस-स्वाध्याय, तप, नियम उपवास, ब्रह्मचर्य, देवता, सन्यासी और गुरुओ की पूजा न करने वाले, भ्रष्टा- चार, अपवित्र, अपने को ब्राह्मण और अब्राह्मण कहने वाले अर्थात् अब्राह्मण होने पर ब्राह्मण और ब्राह्मण होने पर अब्राह्मण कहने वाले, अपने को शूर गिनने वाले, मन्दिर और पानी मे क्रीडा करने वाले मे छिद्र देखकर पञ्चमी या पौर्णमासी के दिन आक्रमण करते है। राक्षस और पिशाच—प्रायः दुर्बल, छली स्वभाववाले, चोर, लोभी, धूर्त्त पुरुष मे छिद्र पाकर द्वितीया, तृतीया और अष्टमी के दिन आक्रमण करते है। [ सुश्रुत मे कहा है—देवग्रह पौर्णमासी मे, असुर सन्ध्याकालो मे, गन्धर्व प्राय अष्टमी मे यक्ष प्रतिपदा मे, पितृ-जन कृष्णपक्ष मे, सर्प पञ्चमी मे, राक्षस रात्रि मे और पिशाच चतुर्दशी मे आक्रमण करते हैं। ] १ प्रतिवाक्य ‘धर्षयन्ति’ इति क्रियापद च पठ्यते क्वचित् ।
४५० चरकसंहिता [ अ० ६ ग्रह असंख्य हैं, उनमें ये ही आठ ग्रह अधिक दीखने से मुख्य हैं, इसलिये इन्हीं आठ ग्रहो की व्याख्या की है ॥ २८ ॥ सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु यो हस्तावुद्यम्य रोषसंरम्भात्रिःसङ्गमन्वेष्वा- त्मनि वा पातयेत् स ह्यसाध्यो ज्ञेयः, तथा यः साश्रुनेत्रो मेढ्रप्रवृत्तरक्तः क्षतजिह्वः प्रस्रुतनासिकश्छिद्यमानमर्मा प्रतिहन्यमानपाणिः सततं विक्कू- जन् दुर्वर्णस्तृषार्तः पूतिगन्धिश्च हिंसार्थमुन्मत्तो ज्ञेयस्तं परिवर्जयेत् ॥२६॥ इन सब भूतोन्मादों मे जो पुरुष क्रोध के वेग के कारण हाथों को ऊंचा उठा कर बिना किसी शंका या संकोच के, बिना ज्ञान के अपने या पराये पर मारने के लिये पटके तो उसे असाध्य समझना चाहिये । इसी प्रकार से जिस रोगी की आंखो से आंसू बहे, लिंग-इन्द्रिय से रक्त आता हो, जीभ कट जाये, नासिका से पानी बहता हो, त्वचा फट जाये, मारने के लिये दोनो हाथ उठा रक्खे हों, निरन्तर कराहता ( अव्यक्त शब्द करता ) रहता हो, देखने मे भद्दा कुरूप, प्यासा, शरीर से दुर्गन्ध आती हो, उसे हिंसार्थी उन्माद रोगी ( पागल ) समझे, वह रोगी असाध्य है । [ चरकोषस्कार मे साध्य-असाध्य के विषय मे लिखा है कि—इन सब भूतोन्मादो मे उन्माद का प्रयोजन हिंसा, रति और पूजा है । इनमे से हिंसार्थी उन्माद असाध्य है और रति और पूजा के निमित्त हुए उन्माद साध्य है।]॥२६॥ रत्यर्चनकामोन्मादिनौ तु भिषगभिचाराभिशापाभ्यां बुद्ध्वा तद- ज्ञोपहारबलिमिश्रेण मन्त्रभैषज्यविधिनोपक्रमेत् ॥ ३० ॥ रति और पूजन के लिए उत्पन्न उन्माद मे वैद्य को चाहिये कि अभिचार और अभिशाप को समझ कर इनके अग भूत जो उपहार ( बलि आदि ) हो, उसके साथ मन्त्र विधि और भैषज्य विधि (घृतपान आदि) द्वारा चिकित्सा करे॥३०॥ तत्र द्वयोरपि निजागन्तुनिमित्तयोरुन्मादयोः समासविस्तराभ्यां भेषजविधि व्याख्यास्यामः ॥ ३१ ॥ इसके आगे निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो का सक्षेप और व स्तार से चिकित्सा का उपदेश करेगे ॥ ३१ ॥ उन्मादे वातजे पूर्वं स्नेहपानं विशेषवित् । कुर्यादावृतमार्गे तु सस्नेहं मृदु शोधनम् ॥ ३२ ॥ कफपित्तभवेऽप्यादौ वमनं सविरेचनम् । स्निग्धस्विन्नस्य कर्तव्यं शुद्धे संसर्जनक्रमः ॥ ३३ ॥ वात आदि दोषों के भेदों को जाननेवाले वैद्य वातजन्य उन्माद की
अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१
अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१ उत्पन्नावस्था मे घृत का पान करावे । क्योकि कफ पित्त द्वारा मार्ग के अवरुद्ध होने से प्रथम वमन, विरेचन रूपी शोधन करना उचित है। शोधन स्नेहयुक्त और मृदु हो इससे वायु का प्रकोप नही होता । कफ और पित्त से उत्पन्न उन्मादो मे भी रोगी का स्नेहन और स्वेदन करके वमन और विरेचन देना उचित है। रोगी के शुद्ध होने पर पेया विलेपी रूप से अन्न सेवन का क्रम चालू करे ॥ ३२-३३ ॥ निरूहान् स्नेहबस्तींश्च १ शिरसश्च विरेचनम् । ततः कुर्याद्यथादोषं तेषां भूयस्त्वमाचरेत् ॥ ३४ ॥ हृदिन्द्रियशिरःकोष्ठे संशुद्धे वमनादिभिः । मनःप्रसादमाप्नोति स्मृतिं संज्ञां च विन्दति ॥ ३५ ॥ पीछे से निरूह ( आस्थापन ), स्नेह बस्ति ( अनुवासन ), शिरोविरेचन करावे । दोष के अधिक होने पर दोषानुसार बार बार वमन, विरेचन करावे । वमन आदि कार्यों से हृदय ( छाती ), चक्षु आदि इन्द्रियो के, शिर, कोष्ठ ( आमाशय-पक्वाशय ) के शुद्ध होने पर रोगी का मन प्रसन्न हो जाता है, वह स्मृति और संज्ञा ( ज्ञान ) को प्राप्त करता है ॥ ३४-३५ ॥ शुद्धस्याऽऽचारविभ्रंशे तीक्ष्णं नावनमञ्जनम् । ताडनं च मनोबुद्धिदेहसंतर्जनं हितम् ॥ ३६ ॥ शोधन करने पर भी यदि रोगी मे आचार की अपवित्रता हो तो तीक्ष्ण नस्य, तीक्ष्ण अञ्जन, दण्ड आदि से पीटना, मन, बुद्धि और शरीर को उद्विग्न करने वाले कार्य करने हितकारी हैं ॥ ३६ ॥ यः शक्तो विनयेत्पट्टैः संयम्य सुदृढैः सुखैः । अपेतलोष्ठकाष्ठाद्यैः संरोध्यश्च तमोगृहे ॥ ३७ ॥ तर्जनं त्रासनं दानं सान्त्वनं हर्षणं भयम् । विस्मयो विस्मृतेर्हेतोर्नयन्ति प्रकृतिं मनः ॥ ३८ ॥ जो उन्माद-रोगी नम्रता से वश मे आ सके उसको सुदृढ और सुखकारक जिनसे उसे देह मे पीड़ा या व्रण न हो ऐसे वस्त्रों से बाध कर अन्धकारयुक्त घर मे बन्द कर दे । घर मे से ढेले, लकड़ी आदि सब हटा देवे जिससे ये न चुभे न किसी प्रकार की चोट लगे । तर्जन ( डाट डपट ), करना, दान, हर्षोत्पादन, आश्वासन, भयदिखाना, विस्मय ( चकित करना ), आदि क्रियाओं से विस्मृत हुआ मन ( विमूढ चित्त ) पुनः प्रकृति में आ जाता है ॥३७-३८॥ १. 'निरूहणस्नेहबस्ती' इति वा ।