चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३४ चरकसंहिता [ अ० ८ लेकर छाछ के साथ पीवे । दुरालभा, अदरक और पाठा इनको सम परिमाण में लेकर सुरा के साथ पीवे । ( ३ ) जामुन की गुठली, आम की गुठली, बेलगिरी, कैथ और सोंठ इनको समान भाग लेकर पेया ( यवागू ) के मण्ड के साथ पिलाने से अतिसार शान्त होता है । ( ४ ) ऊपर कहे पाठा आदि तीन योगो से खडयूष बनावे । इन खडयूषो को मसूर आदि दाल के योग्य, धान्य, घी आदि स्नेह से युक्त, चांगेरी छाछ और अनारदाने से खट्टे कर ले । ये अत्यन्त सांग्राहिक ( मल को बाधनेवाले ) है । ( ५ ) वेतस ( अम्ल- वेतस ), अर्जुन, जामुन, मृणाली ( वीरणमूल या लामज्जक ), सहजन, श्रीपर्णी ( गम्भारी ), मदयन्ती ( नवमल्लिका या मेहन्दी ), यूथिका ( जूही ), बिजौरा, धातकी, अनार इनके पत्तो से, घी आदि स्नेह से, कपित्थ आदि अम्ल, लवण से युक्त खडों को बनावे । ये पदा^१ अत्यन्त सङ्ग्राही हैं । ( ६ ) चागेरी, चुक्रिका ( इमली ) और दुग्धिका ( गुजराती मे नागला दूधेलो ) इनसे पृथक् २, दही का सर भाग ( मलाई ), घी और अनारदाने से यथाविधि खड बनावे । व्यजन के लिये शीघ्र पचाने वाले मासरसो को बेलगिरी आदि सग्राही वस्तुओ से सिद्ध करके दे वे । भोजन के लिये लाल चावल उत्तम हैं । ( ७ ) पीने के लिये स्थिरा, पञ्चमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी, गोखरू ) से सिद्ध जल, छाछ, सुरा, सिरका और अनार का रस दे । अतिसार से पीड़ित यक्ष्मा रोगी के लिये दीपन और ग्राही औषध कह दी है ॥१२३-१३३-॥ परं मुखस्य वैरस्यनाशनं रोचनं शृणु ॥ १३४ ॥ द्वौ कालौ दन्तपवनं भक्षयेन्मुखधावनम् । तद्वत्प्रक्षालयेदास्यं धारयेत्कवलग्रहान् ॥ १३५ ॥ पिबेद् धूमं ततो मृष्टमद्याद्दीपनपाचनम् । भेषजं पानमन्नं च हितमिष्टोपकल्पितम् ॥ १३६ ॥ त्वङ्मुस्तमेला धान्यानि मुस्तमामलकं त्वचम् । दार्वी त्वचो यवानी च पिप्पल्यस्तेजवत्यपि ॥ १३७ ॥ यवानी तिन्तिडीकं च पञ्चैते मुखधावनाः । श्लोकपादेष्वभिहिता रोचना मुखशोधनाः ॥ १३८ ॥ गुटिकां धारयेदास्ये चूर्णैर्वा शोधयेन्मुखम् । एषामालोडिताना वा धावयेत्कवलग्रहान् ॥ १३६ ॥ १ वेतस, अर्जुन, जामुन, एक योग, मृणाली, सहजन दूसरा योग और श्रीपर्णी आदि को पृथक् २ बरते । यह कविराज श्रीजयदेव की सम्मति है !