चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३५ सुरामाध्वीकसीधूना तैलस्य मधुसर्पिषोः । कवलान्धारयेदिष्टान्क्षीरस्येक्षुरसस्य च ॥ १४० ॥ ( १७) मुख की विरसता को नष्ट करने वाली और रुचिकारक ओषधियो की सुनो— ( १) दोनो समय प्रात साय ( भोजन से पूर्व प्रात और सायं भोजन के पीछे, सोते समय ) मुख को साफ करने के लिये दातुन करे ; ( २ ) कषायो से मुख का प्रक्षालन करे, ( ३ ) मुख मे कवल धारण करे । पीछे से प्रायोगिक धूम पान करे । दीपक-पाचक औषध और हितकारी, मन लुभाता खान-पान खावे । ( ४ ) पाच योग—( १ ) दालचीनी, मोथा, इलायची, धनिया, ( २ ) मोथा, आवला, दालचीनी, ( ३ ) दारुहल्दी, दालचीनी, अजवायन, ( ४ ) पिप्पली, तेजवल, ( ५ ) अजवायन और तिन्तिडीक ( वृक्षाम्ल या इमली ) ये पाच योग श्लोक के एक २ चरण मे कहे हैं, ये रोचक और मुख को शोधन करते है । इनकी गोलिया बना कर मुख मे रक्खे, इनके चूर्णों से मुख को साफ करे । इनको पानी मे घोल कर ( या छाछ आदि मे भी ) मुख मे कवल धारण करे । ( ५ ) सुरा, माध्वीक, सीधु, तेल, घी, मधु, दूध और गन्ने का रस इनमे से जो अभीष्ट हो, उसका कवल मुख मे धारण करे ॥ १३४-१४० ॥ यवानी तिन्तिडीकं च नागरं साम्लवेतसम् । दाडिम बदर चाम्लं कार्षिकं चोपकल्पयेत् ॥ १४१ ॥ धान्यसौवर्चलाजाजीत्वराङ्गं चार्धकार्षिकम् । पिप्पलीना शतं चैकं द्वे शते मरिचस्य च ॥ १४२ ॥ शर्करायाश्च चत्वारि पलान्येकत्र चूर्णयेत् । जिह्वाविशोधनं हृद्यं तच्चूर्णं भक्तरोचनम् ॥ १४३ ॥ हृत्प्लीहपार्श्वशूलघ्नं विबन्धानाहनाशनम् । कासश्वासहरं ग्राहि ग्रहण्यर्शोविकारनुत् ॥ १४४ ॥ इति यवानीषाडवम् । ( १८ ) यवानीषाडव—अजवायन, तिन्तिडीक, सोठ, अम्लवेतस, अनार- दाना, खट्टे बेर प्रत्येक एक कर्ष, धनिया, सचल नमक, जीरा, दालचीनी प्रत्येक आधा कर्ष, पिप्पली १०० ( सख्या मे ), मरिच काली २००, खाण्ड ४ पल लेकर मिलावे । यह चूर्ण जिह्वा का विशोधक, भोजन मे रुचि करने वाला हृदयशूल, प्लीहा, पार्श्वशूल विबन्ध, आनाह, कास, श्वास, ग्रहणी और अर्शरोग को नष्ट करता और संग्राहक है ॥१४१-१४४॥