भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 420

४३६ चरकसंहिता [ अ० ८ तालीशपत्रं मारचं नागरं पिप्पली शुभा । यथोत्तरं भागवृद्ध्या त्वगेले चार्धभागिके ॥ १४५ ॥ पिप्पल्याष्टगुणा चात्र प्रदेया सितशर्करा । कासश्वासारुचिहरं तच्चूर्णं दीपनं परम् ॥ १४६ ॥ हृत्पाण्डुग्रहणीदोषशोषप्लीहज्वरापहम् । वम्यतीसारशूलघ्न मूर्ध्ववातानुलोमनम् ॥ १४७ ॥ कल्पयेद् गुटिका चैव चूर्णं पक्त्वा सितोपलेः । गुटिका ह्यग्निसंयोगाच्चूर्णाल्लघुतराः स्मृताः ॥ १४८ ॥ इति तालीशाद्यं चूर्णं गुटिकाश्च । ( १७ ) तालीशाद्य चूर्ण—तालीशपत्र १ भाग, काली मिरिच २ भाग, सोंठ ३ भाग, पिप्पली ४ भाग, वंशलोचन ५ भाग, दालचीनी ॥ भाग, छोटी इला यची ॥ भाग, खाण्ड पिप्पलो से आठगुणा (३२ भाग) मिलावे, यह चूर्ण कास, श्वास, अरुचि को नष्ट करता है, अग्निदीपक है। हृदय रोग, पाण्डु, ग्रहणी, शोष, प्लीहा, ज्वर, वमन, अतिसार और शूल को नष्ट करता है और ऊर्ध्ववात का अनुलोमन करता है। खाड की चासनी करके उसमे ये वस्तुये मिला कर गुटिकायें भी बना सकते है। ये गुटिकायें चूर्ण की अपेक्षा अधिक लघु है, क्योकि इनका पाक आग पर होता है ॥ १४५-१४८ ॥ शुष्यते क्षीणमांसस्य कल्पितानि विधानवित् । दद्यान्मासादमांसानि बृंहणानि विशेषतः ॥ १४६ ॥ शोषिणे बर्हिणं दद्याद् बर्हिशब्देन चापरान् । गृध्रानुलूकांश्चाषांश्च विधिवत्सूपकल्पितान् ॥ १५० ॥ काकांस्तित्तिरिशब्देन वर्तकशब्देन चोरगान् । भृष्टान्मत्स्यान्त्रशब्देन दद्याद् गण्डूपदानपि ॥ १५१ ॥ लोमशान्स्थूलनकुलान्बिडालान्त्रोपकल्पितान् । शृगालशावांश्च । भषक् शशशब्देन दापयेत् ॥ १५२ ॥ सिंहानृक्षास्तरक्षूंश्च व्याघ्रान्न-विधस्तथा । मामादान् मृगशब्देन दद्यान्मासाभिवृद्धये ॥ १५३ ॥ गजखङ्गितुरङ्गाणा वेशवारीकृत' १ भिषक् । दद्यान्महिषशब्देन मांसं मांसाभिवृद्धये ॥ १५४ ॥ पथ्य-कल्पना प्रकार को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि जो यक्ष्मा क १ 'वेशवारकृतान्' इति पाठ. ।