चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४३८ चरकसंहिता [ अ० ८ मे मांसो के प्राप्तिस्थान ( योनि ) आठ प्रकार के बतलाए हैं । वैद्य को चाहिये कि विवेचनापूर्वक यक्ष्मा के रोगी को उन मांसो का प्रयोग करावे ॥१५५-१५६॥ प्रसह्या भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः । आहारार्थं प्रदातव्या मात्रया वातशोषिणे ॥ १६० ॥ प्रतुदा विष्किराश्चैव धन्वजाश्च मृगद्विजाः । कफपित्तपरीतानां प्रयोज्याः शोषरोगिणाम् ॥ १६१ ॥ विधिवत्सूपसिद्धानि मनोज्ञानि मृदूनि च । रसवन्ति सुगन्धीनि मांसान्येतानि भक्षयेत् ॥ १६२ ॥ मासमेवाश्नतः शोषो माध्वीकं पिबतोऽपि च । नियतान्ल्पचित्तस्य चिरं काये न तिष्ठति ॥ १६३ ॥ जो यक्ष्मा का रोगी वात-प्रधान हो उसको प्रसह्य, भूशय, आनूप, जलज और जलचर पशु-पक्षियो का मास मात्रा मे भोजन के लिये देना चाहिये । जिस यक्ष्मा-रोग मे कफ और पित्त प्रबल हो उसका प्रतुद, विष्किर और धन्वज ( जाङ्गल ) पशु पक्षियो का मास देवे । विधिपूर्वक तैयार किये, मन को लुभाने वाले मृदु, शुभ रस और सुगन्धि से युक्त इन मांसो का रोगी खावे । मास का आहार करते हुए और माध्वीक को पीते हुए उदारचित्त [ जो चिन्ता नहीं करता ] रोगी के शरीर मे यक्ष्मा देर तक नहीं रहता ॥१६०-१६३॥ वारुणीमण्डनित्यस्य बहिर्मार्जनसेविनः । अविधारितवेगस्य यक्ष्मा न लभतेऽन्तरम् ॥ १६४ ॥ प्रसन्ना वारुणी शीधुमरिष्टानासवान्मधु । यथार्हमनुपानार्थं पिबेन्मांसानि भक्षयेत् ॥ १६५ ॥ मद्यं तैक्ष्ण्योष्ण्यवैशद्यसूक्ष्मत्वात्स्रोतसा मुखम् । प्रमथ्य विवृणोत्याशु तन्मोक्षात्सप्त धातवः ॥ १६६॥ पुष्यन्ति धातुपोषाच्च शीघ्र शोषः प्रशाम्यति । जो मनुष्य प्रतिदिन वारुणी-मण्ड का सेवन करता है, शरीर का बहि - शोधन करता है, उपस्थित वेगो को नही रोकता उसको यक्ष्मा रोग पीडित नही कर सकता । प्रसन्ना, वारुणी, शीधु, अरिष्ट, आसव, मधु इनमे से जो पदार्थ रोगी को योग्य लगे उसे अनुपान के रूप मे पान करे ओर मास खावे । मद्य तीक्ष्ण, उष्ण, विशद और सूक्ष्म होने से बलात् स्रोतों के मुखो को शीघ्र खोल देता है, मुखों के खुल जाने से रस आदि सातो धातुओ का पोषण होता है । धातुओ के पोषण होने से यक्ष्मा रोग शीघ्र शान्त हो जाता है ॥१६४-१६६॥