भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 428

४४४ चरकसंहिता [ अ० ६ बुद्धि, मन और स्मृति का भ्रंश होना ही उन्माद का स्वरूप है। कारण- भेद से उन्माद रोग दो प्रकार का है । ( १ ) निज—शरीर के दोष से उत्पन्न और ( २ ) आगन्तुज । इस उन्माद की उत्पत्ति पाच प्रकार की है । ( १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और ५ आगन्तुज१ ) प्रत्येक के लक्षण और चिकित्सा पृथक् २ कहेगे ॥ ८ ॥ रूक्षाल्पशीतान्नविरेकधातुक्षयोपवासैरनिलोऽतिवृद्धः । चिन्तादियुक्तं हृदयं प्रदूष्य बुद्धिं स्मृति चाप्युपहन्ति शीघ्रम् ॥ ९ ॥ अस्थानहासस्मितनृत्यगीतवागङ्गविक्षेपणरोदनानि । पारुष्यकाश्यरु णवणताश्च जीर्णे बलं चानिलजस्य रूपम् ॥ १० ॥ ( १ ) वातजन्य उन्माद—रूक्ष अल्प और शीतल अन्न से, वमन या विरेचन-रूप से दोषा का निकालने वाले कमो से रस-रक्त आदि धातुओ का क्षय होने से, उपवासो से, बढ़ा हुआ वायु अल्पमत्त्व ( निर्बल ) व्यक्ति के चिन्ता, शोक क्रोध, लोभ, काम आदि से युक्त हृदय को दूषित करके, बुद्धि स्मृति का भी शीघ्र ही नष्ट ( चञ्चल, अस्थिर, बेचैन ) कर देता है । लक्षण—इसके कारण से व्यक्ति बिना स्थान ( बिना अवसर ) ही जार मे हसने लगता है, मुस्कराता है, नाचता है, रोता है, अगो का इधर-उधर चलाता है, रोता है। रोगी का शरीर कठोर, कृश, अरुण ( लाल ) वर्ण का हो जाता है, आहार के जीर्ण होने पर रोग का बल बढ जाता है, ये वातजन्य उन्माद के लक्षण है ॥ ६-१० ॥ अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैर्भोज्यैश्चितं पित्तमुदीर्णवेगम् । उन्मादमत्युग्रमनात्मवस्य हृदि श्रितं पूर्ववदाशु कुर्यात् ॥ ११ ॥ अमर्षसंरम्भविनग्नभावाः सन्तर्जनाभिद्रवणौष्ण्यरोषाः । प्रच्छायशीतान्नजलाभिलाषाः पीता च भाः पित्तकृतस्य लिङ्गम् ॥ १२ ॥ ( २ ) पित्तज उन्माद—अजीर्ण, कटु, अम्ल, विदाही और उष्ण आहार से कुपित हुआ पित्त अनात्मवान् ( अधीर, निर्बल ) पुरुष के हृदय मे स्थित १ सुश्रुत और अष्टाङ्ग-सग्रह मे विषजन्य उन्माद का मान कर छ प्रकार के उन्माद माने है। वहा कहा है-‘षडुन्मादा भवन्ति’ । परन्तु क्योकि विष की मद-सज्ञा होने से इसका निजोन्माद मे ही अन्तर्भाव करना चाहिये । जैसे— 'यथास्व तत्र भेषजम्' । सुश्रुत—'यश्च मद्यकृत प्रोक्तो विषजो रौधिरश्च य । सर्व एव मदा नर्त्तं वातपित्तकफात् त्रयात् ॥