भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

४४६ चरकसंहिता [ अ० ६ अमर्त्यवाग्विक्रमवीर्यचेष्टो ज्ञानादिविज्ञानबलादिभिर्यः । उन्मादकालोऽनियतश्च यस्य भूतोत्थमुन्मादमुदाहरेत्तम् ॥ १७ ॥ अदूषयन्तः पुरुषस्य देहं देवाद्यः स्वैश्च गुणप्रभावैः । विशन्त्यदृश्यास्तरसा यथैव छायायातपौ दर्पणसूर्यकान्तौ ॥ १८ ॥ ( ५ ) आगन्तुज उन्माद—देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, राक्षस ( राक्षस और ब्रह्मराक्षस ) और पितर इन आठो ग्रहो का तिरस्कार करना, नियमपूर्वक व्रतादि का आचरण न करना और पूर्वजन्म मे उत्तम कर्म न होना ये आगन्तुज उन्माद रोग के कारण है । लक्षण—(१) जिस उन्माद-रोगी मे अमानुषीय ( दैवी ), वाणी, पराक्रम, शूरता, शरीर क्रियाये दिखाई दे, जिसका ज्ञान, बुद्धि, स्मृति, विज्ञान ( शिल्प सम्बन्धी ज्ञान ), और अमानुषी बल ( मनुष्य सीमा से अधिक ) प्रतीत हो, जिस उन्माद का काल निश्चय न हो ( कभी प्रात, कभी मध्याह्न और कभी सायकाल हो ), इस प्रकार के उन्माद को भूतोन्माद जानना चाहिये । जिस प्रकार अपने गुणो के प्रभाव से दर्पण मे छाया ( प्रतिबिम्ब ) और सूर्य कान्त- मणि मे सूर्य की किरणे प्रवेश करती है, परन्तु दिखाई नही देती, उसी प्रकार से देव आदि भी मनुष्य के शरीर को दूषित किये बिना ही अपने गुणों के प्रभाव से अतिवेग से प्रविष्ट हो जाते है । [ ये वात आदि दोषो के समान शरीर को दूषित नही करते ] ॥ १६-१८ ॥ आघातकालास्तु सपूर्वरूपाः प्रोक्ता निदानेऽथ सुरादिभिश्च । उन्मादरूपाणि पृथङ्निबोध कालं च गम्यान्पुरुषांश्च तेषाम् ॥ १९ ॥ अभिगमनीय पुरुषो पर आघात ( आक्रमण ) के काल और आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप ये निदान स्थान मे प्रथम कह दिये है । अब देवता आदि आठो ग्रहो के द्वारा उत्पन्न उन्माद के लक्षण, अभिगमन-काल और यह रोग जिन पुरुषों को होता है यह सब पृथक् २ सुनो । [ यद्यपि देव आदि का प्रवेश दिखाई नही देता तथापि ज्ञान, विज्ञान- शीलता आदि लक्षणो से इनका अनुमान करना चाहिये ] ॥ १६ ॥ तद्यथा—सौम्यदृष्टि गम्भीरमप्रधृष्यमकोपनमस्वप्नमभोजनाभिला- षिणमल्पस्वेद-मूत्र-पुरीष-वाचं शुभगन्धं फुल्ल-पद्म-वदनमिति देवोन्मत्तं विद्यात् ॥ २० ॥ ( १ ) देवोन्माद—दृष्टि प्रसन्न ( निर्मल आख ) हो, गम्भीर हो, लज्जाशील हो, क्रोध से रहित हो, निद्रा से रहित हो, भोजन की अभिलाषा से रहित हो,