भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 434

४५० चरकसंहिता [ अ० ६ ग्रह असंख्य हैं, उनमें ये ही आठ ग्रह अधिक दीखने से मुख्य हैं, इसलिये इन्हीं आठ ग्रहो की व्याख्या की है ॥ २८ ॥ सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु यो हस्तावुद्यम्य रोषसंरम्भात्रिःसङ्गमन्वेष्वा- त्मनि वा पातयेत् स ह्यसाध्यो ज्ञेयः, तथा यः साश्रुनेत्रो मेढ्रप्रवृत्तरक्तः क्षतजिह्वः प्रस्रुतनासिकश्छिद्यमानमर्मा प्रतिहन्यमानपाणिः सततं विक्कू- जन् दुर्वर्णस्तृषार्तः पूतिगन्धिश्च हिंसार्थमुन्मत्तो ज्ञेयस्तं परिवर्जयेत् ॥२६॥ इन सब भूतोन्मादों मे जो पुरुष क्रोध के वेग के कारण हाथों को ऊंचा उठा कर बिना किसी शंका या संकोच के, बिना ज्ञान के अपने या पराये पर मारने के लिये पटके तो उसे असाध्य समझना चाहिये । इसी प्रकार से जिस रोगी की आंखो से आंसू बहे, लिंग-इन्द्रिय से रक्त आता हो, जीभ कट जाये, नासिका से पानी बहता हो, त्वचा फट जाये, मारने के लिये दोनो हाथ उठा रक्खे हों, निरन्तर कराहता ( अव्यक्त शब्द करता ) रहता हो, देखने मे भद्दा कुरूप, प्यासा, शरीर से दुर्गन्ध आती हो, उसे हिंसार्थी उन्माद रोगी ( पागल ) समझे, वह रोगी असाध्य है । [ चरकोषस्कार मे साध्य-असाध्य के विषय मे लिखा है कि—इन सब भूतोन्मादो मे उन्माद का प्रयोजन हिंसा, रति और पूजा है । इनमे से हिंसार्थी उन्माद असाध्य है और रति और पूजा के निमित्त हुए उन्माद साध्य है।]॥२६॥ रत्यर्चनकामोन्मादिनौ तु भिषगभिचाराभिशापाभ्यां बुद्ध्वा तद- ज्ञोपहारबलिमिश्रेण मन्त्रभैषज्यविधिनोपक्रमेत् ॥ ३० ॥ रति और पूजन के लिए उत्पन्न उन्माद मे वैद्य को चाहिये कि अभिचार और अभिशाप को समझ कर इनके अग भूत जो उपहार ( बलि आदि ) हो, उसके साथ मन्त्र विधि और भैषज्य विधि (घृतपान आदि) द्वारा चिकित्सा करे॥३०॥ तत्र द्वयोरपि निजागन्तुनिमित्तयोरुन्मादयोः समासविस्तराभ्यां भेषजविधि व्याख्यास्यामः ॥ ३१ ॥ इसके आगे निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो का सक्षेप और व स्तार से चिकित्सा का उपदेश करेगे ॥ ३१ ॥ उन्मादे वातजे पूर्वं स्नेहपानं विशेषवित् । कुर्यादावृतमार्गे तु सस्नेहं मृदु शोधनम् ॥ ३२ ॥ कफपित्तभवेऽप्यादौ वमनं सविरेचनम् । स्निग्धस्विन्नस्य कर्तव्यं शुद्धे संसर्जनक्रमः ॥ ३३ ॥ वात आदि दोषों के भेदों को जाननेवाले वैद्य वातजन्य उन्माद की