चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ४] शारीरस्थानम् ५५
अ० ४] शारीरस्थानम् ५५
शरीर का श्रेष्ठ धातुस्वरूप शुक्र शरीर के प्रत्येक अंग से उत्पन्न होता है। वह
हर्ष के कारण उत्पन्न तथा हर्ष के ही द्वारा प्रेरित होकर आत्मा का आश्रय भूत
यह बीज रूप धातु पुरुष के शरीर से बाहर आकर उचित मार्ग से गर्भाशय में
प्रवेश करके आर्तव के साथ मिलता है ॥ ७ ॥
तत्र पूर्वं चेतनाधातुः सत्वकरणो गुणग्रहणाय प्रवर्तते । स हि
हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता मन्ता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा
विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽव्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्रधान-
मव्यक्तं जीवो ज्ञः पुद्गलश्चेतनावान्विभुर्भूतात्मा चेन्द्रियात्मा
चान्तरात्मा चेति ॥ ८ ॥
सबसे प्रथम मन के साधनवाला चेतना-धातु गुण को ग्रहण करने के लिये
प्रवृत्त होता है। उसी चेतना धातु को हेतु, कारण, निमित्त, अक्षर, कर्त्ता,
मन्ता, वेदिता, बोद्धा, द्रष्टा, धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप, पुरुष, प्रभव,
अव्यय, नित्य, गुणी (गुणवान्), ग्रहण (मूर्त्ता को ग्रहण करने वाला), प्रधान,
अव्यक्त, जीव, ज्ञ, पुद्गल, चेतनावान्, विभु, भूतात्मा, इन्द्रियात्मा और अन्त-
रात्मा इन पर्यायों से कहते हैं ॥ ८ ॥
स गुणोपादानकालेऽन्तरिक्षं पूर्वतरमन्येभ्यो गुणेभ्य उपादत्ते;
यथा प्रलयात्यये सिसृक्षुर्भूतान्यक्षरभूतः सत्त्वापादानः पूर्वतरमाकाशं
सृजति, ततः क्रमेण व्यक्ततरगुणान्धातृन्वाय्वादींश्चतुरः, तथा देह-
ग्रहणेऽपि प्रवर्तमानः पूर्वतरमाकाशमेवोपादत्ते, ततः क्रमेण व्यक्ततर-
गुणान्धातूनवाय्वादींश्चतुरः, सर्वमपि तु खल्वेतद् गुणोपादानमणुना
कालेन भवति ॥ ९ ॥
वह चेतना धातु गुणों के उत्पत्ति काल में अन्य वायु आदि गुणों से पूर्व,
सब से प्रथम अन्तरिक्ष का ग्रहण करता है। क्योकि प्रलय के अनन्तर सृष्टि
के प्रारम्भ में सृष्टि को बनाने की इच्छा वाला प्रधान, अक्षर, पुरुष, सत्त्व को
लेकर सब से प्रथम आकाश को बनाता है। इसके बाद क्रम से अधिक
व्यक्त गुणों वाले वायु आदि चार धातुओं को उत्पन्न करता है। उसी
प्रकार देह के ग्रहण करने के अवसर में भी प्रवृत्त हुआ आत्मा सबसे पूर्व
आकाश को ही ग्रहण करता है, फिर क्रम से उससे अधिक स्पष्ट गुणों
वाले वायु आदि चार धातुओं को लेता है। इनके गुणों का पूर्ण रीति से
ग्रहण करना बहुत थोड़े समय मे ही हो जाता है। [इस प्रकार आकाश
में एक गुण, वायु में दो गुण (शब्द, स्पर्श), अग्नि में तीन गुण
५६ चरकसंहिता [ अ० ४ (शब्द, स्पर्श, रूप), जल में चार गुण (शब्द, स्पर्श, रूप और रस) और पृथ्वी में पाच गुण (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) उत्पन्न करता है।] इसी प्रकार शरीर में गुण उत्पन्न करने में प्रवृत्त होने पर भी सब से प्रथम आकाश के गुण को ही उत्पन्न करता है, इसके पीछे क्रम से स्पष्ट गुणवाले वायु आदि भूतों को उत्पन्न करता है। भूतों के गुणों का ग्रहण बहुत ही थोड़े समय मे हो जाता है। [जिस प्रकार सूर्य कान्तमणि में सूर्य की किरणें आती हुई नहीं दीखतीं, परन्तु रूई तिनके के जलने से किरणो का आना प्रतीत होता है, उसी प्रकार शरीर के अन्दर भूतों के कार्य से इनके गुणों का तथा चेतना धातु का अनुमान होता है] ॥ ६ ॥ स तु सर्वगुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि समूर्च्छितः सर्वधा- तुकलनीकृतः खेटभूतो भवत्यव्यक्तविग्रहः सदसद्भूताङ्गावयवः ॥१०॥ द्वितीये मासि घनः संपद्यते- पिण्ड पेश्यर्बुदं वा, तत्र घनः [पिण्डः] पुरुषः, स्त्री पेशी, अर्बुदं नपुंसकम् ॥ ११ ॥ तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च योगपद्येनाभिनिर्व- र्त्तन्ते ॥ १२ ॥ गर्भ का प्रथम रूप खेट-सव गुणों वाला यह चेतना धातु गर्भ रूप में होकर प्रथम मास में मूर्च्छित, निश्चेष्ट, गतिरहित अव्यक्त, सम्पूर्ण धातुओं वाला, श्लेष्मा के पिण्ड के समान होता है, उस समय उसका शरीर अस्पष्ट रूप अंगों वाला होता है, उस समय उसके अंग पृथक् २ नहीं बने होते। उस समय उसका नाम 'खेट' होता है। घन-दूसरे मास में यह गर्भ रूप धातु कठिन, पिण्ड गोल माठ के आकार का वा पेशी-लम्बो मास पेशी के समान वा अर्बुद-गोल और ऊची गांठ के समान बन जाता है। इन में से घन (पिण्ड) रूप हो तो पुरुष, पेशी हो तो स्त्री, अर्बुद हो तो नपुंसक होता है। तीसरे मास में सम्पूर्ण इन्द्रिया और शिर आदि सब अंग तथा आमाशय आदि अवयव एक साथ बनने लगते हैं ॥१२॥ तत्रास्य केचिदङ्गावयवा मातृजादीनवयवान् विभज्य पूर्वमुक्ता यथावत्, महाभूतविकारप्रविभागेन त्विदानीमस्य तांश्चैवाङ्गावयवान् कांश्चित्पर्यायान्तरेणापरांश्चानुव्याख्यास्यामः - मातृजादयोऽप्यस्य महा- भूतविकारा एव। तत्रास्याऽऽकाशात्मकं - शब्दः श्रोत्रं लाघवं सौक्ष्म्यं विवेकश्च । वाय्वात्मकं-स्पर्शः स्पर्शनं रौक्ष्यं प्रेरणं धातुव्यूहनं चेष्टाश्च शारीर्यः । अग्न्यात्मकं- रूप दर्शनं प्रकाशः पक्तिरौष्ण्यं च । अबात्मकं
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५७
रसो रसन शत्य मार्दवः स्नेहः क्लेदश्च । पृथिव्यात्मक गन्धो घ्राण
गौरवं स्थैर्यं मूर्तिश्च ॥ १३ ॥
गर्भ के अंग और अवयवों में से कुछ अवयव जो कि माता आदि से उत्पन्न
होते हैं, प्रथम कह चुके हैं । उन प्रथम कहे हुए अवयवों को भी अब दूसरे
प्रकार से महाभूतों का प्रविभाग करते हुए क्रम से प्राप्त तथा अन्य न कहे हुए
अंगों ( अवयवों ) का भी वर्णन करेंगे ।
माता आदि से उत्पन्न होने वाले गर्भ के अवयव भी पांचों महाभूतों के
विकार ही हैं । इनमें इस गर्भ के शब्द, श्रोत्र, लघुता, अति सूक्ष्मता और
विवेक ये अश आकाश से उत्पन्न होते हैं। वायु से स्पर्श, त्वचा, रूक्षता,
प्रेरण, धातु रचना और शारीरिक चेष्टायें उत्पन्न होती हैं । अग्नि से रूप, चक्षु,
प्रकाश, पाचन और उष्णिमा ये अंश उत्पन्न होते हैं । जल से रस, रसना,
शीतलता, कोमलता, स्नेह और क्लेद ये अंश उत्पन्न होते है । पृथिवी से गन्ध,
नासिका, भारीपन, स्थिरता ओर कठिनता ये अंश उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥
एवमयं लोकसमितः पुरुषः । यावन्तो हि लोके भावविशेषास्ता-
वन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे, तावन्तो लोके, इति बुधास्त्वेवं द्रष्टु-
मिच्छन्ति ॥ १४ ॥
पुरुष की लोकतुल्यता—इस प्रकार पाच महाभूतों के विकारो से बना होने
के कारण यह पुरुष लोक समित अर्थात् लोक के तुल्य है । लोक में जितने भी
आध्यात्मिक अथवा अहंकार आदि भौतिक पदार्थ विशेष हैं, उतने ही सब
पदार्थ इस पुरुष मे भी हैं और जितने भाव ( पदार्थ ) पुरुष में हैं, उतने ही
इस लोक में हैं । इस प्रकार से लोक और पुरुष की समानता ज्ञानी पुरुष
देखना चाहते है ॥ १४ ॥
एवमस्येन्द्रियाण्यङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते, अन्यत्र तेभ्यो
भावेभ्यो येऽस्य जातस्योत्तरकालं जायन्ते, तद्यथा—दन्ता व्यञ्जनानि
व्यक्तीभावः, तथायुक्तानि चापराणि, एषा प्रकृतिः, विकृति पुनरतोऽ-
न्यथा । सन्ति खल्वस्मिन् गर्भे केचिच्च नित्या भावाः, सन्ति चानित्याः
केचित् । तस्य य एवाङ्गावयवाः सन्तिष्ठन्ते, त एव स्त्रीलिङ्गं पुंल्लिङ्गं
नपुंसकलिङ्गं वा बिभ्रति । ततः स्त्रीपुरुषयोर्ये वैशेषिका भावाः प्रधान-
संश्रया गुणसंश्रयाश्च, तेषां यतो भूयस्त्वं ततोऽन्यतरभावः । तद्यथा—
क्लैव्यं भीरुत्वमवैशारद्यमनवस्थानमधोगुरुत्वमसहनन शैथिल्यं मार्दवं
५८ चरकसंहिता [ अ० ४
तथायुक्तानि चापराणि स्त्रीकराणि, अतो विपरीतानि पुरुषकराणि, उभ-
यभागावयवा नपुंसककराणि ॥ १५ ॥
इस प्रकार से इस गर्भ की इन्द्रिया, अंग और अवयव एक साथ बनने
प्रारम्भ हो जाते है। परन्तु जो पदार्थ इस गर्भ की उत्पत्ति के पीछे बनते
हैं, वे गर्भ में बनने आरम्भ नहीं होते । जैसे-दात, व्यञ्जन, (मूँछ, दाढ़ी
आदि) शुक्र और रज की उत्पत्ति तथा स्थूल मास आदि ये देर में उत्पत्ति के
पीछे बनने प्रारम्भ होते हैं। यह तो मनुष्य की प्रकृति अर्थात् स्वभाव है और
इसके विपरीत जब कभी दात आदि गर्भ में ही बन जाते हैं, तब यह विकृति
कहाती है। इस गर्भ में कुछ पदार्थ नित्य होते हैं। जो जब तक शरीर रहता
है तब तक रहते हैं जमे-हाथ, पाँव आदि और कुछ भाव अनित्य हैं जो
शरीर के साथ सदा नहीं रहते जैसे-दान आदि । इस गर्भ मे शरीर के
साथ जो अग या अवयव रहते हैं वे ही अवयव स्त्रीलिंग पुरुपलिंग या नपुंसक-
लिंग के लक्षणों को धारण करते हैं। इनमें स्त्री और पुरुष के लक्षणों में ज-
विशेष लक्षण भेदक होते हैं, वे प्रधान या मुख्य होते हैं, जिन गुणों की प्रथा-
नता वा अधिकता रहती है, वही विशेष लिंग या चिह्न बनते हैं। अधिकता न
रहने पर वे विपरीत होते हैं। जैसे-क्लीवता, भीरुत्व, मोह, चंचलता, कटि से
निचले भाग का भारी होना, शरीर का संगठित न होना, शिथिलता, कोमलता
तथा स्तन आदि, अन्य जन्म के उपरान्त होने वाले लक्षणों का होना, स्त्रीलिंग
की उत्पत्ति में कारण है। इन लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना पुरुष की
उत्पत्ति मे कारण है। दोनों प्रकार के अवयव वा लक्षण नपुंसक की उत्पत्ति
में कारण हैं॥ १५ ॥
तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेवास्य चेतसि वेदना
निबन्धं प्राप्नोति, तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते प्रार्थयते च, तद्द्वै-
हृद्य्यमाचक्षते वृद्धा । मातृजं चास्य हृदय मातृहृदयेनाभिसम्बद्धं
भवति रसवाहिनीभि संवाहिनीभिः, तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः संप-
द्यते। तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृद्य्यस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति
कर्तु, विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा, समानयोगक्षेमा हि
माता तदा गर्भेण केषुचिदर्थेषु । तस्मात्प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणो-
पचरन्ति कुशलाः ॥ १६ ॥
गर्भ की इन्द्रिया जिस समय बनती है, उसी समय चित्त में सुख दुःख के
ज्ञान का सम्बन्ध भी हो जाता है। इसलिये तब से लेकर गर्भ स्पन्दन (गति)
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५६ किया करता है, वह नाना वस्तुओं की याचना करता है। अतः ज्ञानी पुरुष उस समय माता के शरीर में 'द्वैहृदय्य' अर्थात् दो हृदय बने बतलाते हैं। इस गर्भ का हृदय माता से बनता है, गर्भ का हृदय गर्भ का पोषण करने वाली रसवाहिनी नाड़ियों द्वारा माता के हृदय के साथ सम्बन्धित रहता है। इसलिये माता और गर्भ की इच्छा रसवाहिनी नाड़ी द्वारा मिली रहती है। उस समय माता की इच्छा गर्भ की इच्छा होती है। इसी कारण को देख कर विद्वान् लोग गर्भवती माता की इच्छा का व्याघात करना उचित नहीं जानते। इस माता की इच्छा का विनाश करने मे गर्भ की मृत्यु अथवा गर्भ मे विकार आ जाता है। कुछ बातों में माता और गर्भ का योग और क्षेम (सुख और रक्षा आदि) समान होता है। इसलिये कुशल पुरुष प्रिय और हितकारक उपचारों से गर्भिणी का विशेष रूप मे उपचार करते हैं ॥१६॥ तस्या गर्भापन्नेद्वैहृदय्यस्य च विज्ञानार्थं लिङ्गानि समासेनोपदे- क्ष्यामः। उपचारसाधन ह्याज्ञाने दोषः । ज्ञानं च लिङ्गतः । तस्मा- दिष्टो लिङ्गोपदेशः । आर्तवादर्शनमास्यसंस्रवणमन्नाभिलाषश्छर्दिर- रोचकोऽम्लकामता च विशेषेण श्रद्धाप्रणयनं चोच्चावचेषु भावेषु गुरु- गात्रत्वं चक्षुषोग्लानिः स्तनयोः स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्ण्य- मत्यर्थं श्वयथुः पादयोरीषल्लोमराड्युद्गमो योन्याश्च चाटालत्वमिति गर्भे पर्यागते रूपाणि र्भवन्ति ॥ १७॥ दो हृदयो के लक्षण—स्त्री के गर्भ स्थिर हो जाने और उसके द्वैहृदय्य अर्थात् दो हृदय हो जाने को पहचानने के लिये सक्षेप में लक्षण कहते हैं। लक्षणो का ज्ञान होने से ही परिचर्य्या ठीक २ प्रकार से होती है। विशेष लक्षणों से ही ज्ञान हो सकता है। इसलिये लक्षणों का उपदेश करना आवश्यक है। जैसे—आर्त्तव का दिखाई न देना, मुख से पानी बहना, भोजन में अनिच्छा, वमन (प्रात काल मे विशेष), अरुचि, खटाई की विशेष इच्छा, नाना खाद्य पदार्थों में इच्छा, शरीर में भारीपन, आँखों में ग्लानि, स्तनों में दूध, ओठ और चूचकों के चारों ओर खूब गहरे काले रग का निक्षेप होना, पावो मे थोड़ा थोड़ा सूजन, शरीर में रोमांच, योनि में फैलाव ये गर्भ के आने के उपरान्त (दो-हृदय होने) के लक्षण हैं ॥१७॥ सा यद्यदिच्छेत्तत्तदस्य दद्यादन्यत्र गर्भोपघातकरेभ्यो भावेभ्यः। उस समय गर्भिणी जो जो वस्तु चाहे वह वह इसको देनी चाहिये, परन्तु गर्भ को हानि पहुचानेवाले कोई पदार्थ नहीं देना चाहिये।
६० चरकसंहिता [ अ० ४ गर्भोपघातकरास्त्विमे भावाः । तद्यथा—सर्वमतिगुरूष्णतीक्ष्णं दारुणाश्च चेष्टाः । इमांश्चान्यानुपदिशन्ति वृद्धाः-देवतारक्षोऽनुचरपरि- रक्षणार्थं न रक्तानि वासांसि बिभृयान्न मदकराणि चाद्यान्यभ्यवहरेन्न यानमधिरोहेन्न मांसमश्नीयात्सर्वेन्द्रियप्रतिकूलांश्च भावान् दूरतः परि- वर्जयेद्यच्चान्यदपि किंचिल्स्त्रियो विद्युः ॥ १८ ॥ ये नीचे लिखी बातें गर्भ का नाश करनेवाली हैं। जैसे—बहुत गुरु, बहुत गरम और बहुत तीक्ष्ण सब पदार्थ ओर दारुण दु खदायी चेष्टायें गर्भ को हानि पहुँचाने वाला है। वृद्ध, ज्ञानी पुरुष नीचे लिखी बातों को भी गर्भ को हानि करने वाली बतलाते हैं। जैसे—देवों और राक्षसों के भृत्यों से बचने के लिये गर्भिणी लाल वस्त्रों को न पहिने, मद करने वाले खाद्य पदार्थों को न खावे, सवारी पर न चढ़े, मांस नहीं खावे, इन्द्रियों के प्रतिकूल सब बातों को दूर से ही छोड़ देवे। इनके अतिरिक्त और भी जिन २ बातों को वृद्ध स्त्रियो बतलावे उनको भी त्याग देव । [ जैसे—कुए में झाँकना, कोठे पर ऊँचा चढ़ना, नदी का तैरना आदि ] ॥१८॥ तीव्राया तु खलु प्रार्थनायां काममहितमप्यस्यै हितेनोपहितं दद्या- त्प्रार्थनाविनयनार्थामति । प्रार्थनासंधारणाद्धि वायुः कुपितोऽन्त. शरीर- मनुचरन् गर्भस्यापद्यमानस्य विनाशं वैरूप्यं वा कुर्यात् ॥ १९ ॥ तीव्र माग होने पर अहितकारक वस्तु भी हितकारक पदार्थ के साथ गर्भिणी को देनी चाहिये। जिससे कि माग या इच्छा या चाह को आघात न पहुँचे । क्योंकि इच्छा का विघात होने से वायु कुपित होकर शरीर के अन्दर फिरता हुआ गर्भ को नाश वा विकृत कर देता है ॥१९॥ चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्व- मधिकमापद्यते विशेषेण ॥ २० ॥ चतुर्थ मास मे गर्भ स्थिर हो जाता है। इसलिये तब से गर्भिणी का शरीर भारी हाने लगता है ॥२०॥ पञ्चमे मासि गर्भस्य मासशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कार्श्यमापद्यते विशेषेण ॥ २१ ॥ पाचवे मास में गर्भ के अन्दर अन्य मासों की अपेक्षा मास और रक्त का अधिक सञ्चय होता है। इसलिये इस मास में गर्भिणी विशेष कमजोर हा जाती है ॥ २१ ॥
अ० ४ ] शारीरस्थानम् ६१ षष्ठे मासि गर्भस्य बलवर्णोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः । तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण ॥ २२ ॥ छठे महिने में और मासों की अपेक्षा गर्भ में बल और वर्ण की वृद्धि विशेष रूप से होती है । इसलिये इस मास में गर्भिणी के अन्दर बल और वर्ण की विशेष हानि होती है ॥ २२ ॥ सप्तमे मासि गर्भः सर्वैर्भावैराप्याय्यते, तस्मात्तदा गर्भिणी सर्वो- त्कारैः क्लान्ततमा भवति ॥ २३ ॥ सातवें मास मे गर्भ मे मास, रक्त आदि सब पदार्थ एक साथ बढ़ते हैं । इसलिये इस मास में गर्भिणी के अन्दर मास, रक्त आदि सब प्रकार से घट जाते हैं, अतः वह सब प्रकार से कृश हो जाती है ॥ २३ ॥ अष्टमे मासि गर्भश्च मातृतो गर्भतश्च माता रसवाहिनीभिः संवा- हिनीभिर्मुहुरोजः परस्परत आददातेग र्भस्यासंपूर्णत्वात्, तस्मात्तदा गर्भिणी मुहुर्मुहुर्मुदा युक्ता भवति मुहुर्मुहुश्च ग्लाना तथा गर्भः, तस्मा- त्तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थितत्वात्, त चैवमभि- समीक्ष्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशलाः ॥ २४ ॥ आठवे मास में रस को ले जाने वाली रसवाहिनी नाड़ियों द्वारा ओज माता से गर्भ में और गर्भ से माता मे बार बार कभी इधर कभी उधर परस्पर आता जाता रहता है । क्योंकि इस समय गर्भ असम्पूर्ण रहता है । इसलिये इस समय गर्भिणी बार बार प्रसन्न और बार बार म्लान होती है । इसी प्रकार गर्भ भी बार बार प्रसन्न और बार बार म्लान होता है । जिस समय ओज माता मे रहता है तब माता प्रसन्न और गर्भ म्लान और जब ओज गर्भ में रहता है उस समय गर्भ प्रसन्न और माता म्लान रहती है । इसलिये ओज के स्थिर न होने से गर्भ का जन्म आपत्तिजनक होता है । इस मास में जन्मा हुआ गर्भ निश्चित रूप में जीवित उत्पन्न नही होता । गर्भ में ओज हो तब यदि गर्भ बाहर आये तो बालक जीवित बाहर आता है, परन्तु माता की मृत्यु होना सम्भव है । यदि ओज माता में हो तब गर्भ बाहर आये तो मृत बालक बाहर आता है । इस दृष्टि से ज्ञानी पुरुष आठवे मास को गर्भिणी के सामने नही गिनते । क्योंकि यदि इसी मास की उत्पत्ति को गर्भिणी सुन ले तो सम्भवतः डर जाये । इस भय के कारण वायु कुपित होकर गर्भ का नाश कर सकता है ॥ २४ ॥ तस्मिन्नेकदिवसातिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकाळ- मित्याहुरादशमान्मासात्, एतावान्कालः, परं कुक्षाववस्थानं गर्भस्य ॥२५॥
एवमनयाऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ ॥ २६ ॥ आठवें मास के व्यतीत होने पर एक दिन चढने पर नवम मास से लेकर दस वें मास तक के समय तक 'प्रसव-काल' कहते हैं । [ सुश्रुत मे बारहवें मास तक प्रसव काल माना है । साधारणत. २८० दिन के पश्चात् प्रसव काल होता है ] । इसके उपरान्त गर्भ का कुक्षि मे अधिक समय रहना दोषयुक्त, रोग आदि के कारण जानना चाहिये । इस प्रकार उपरोक्त क्रम से गर्भ कुक्षि म बनता ओर वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ २५-२६ ॥ मात्रादीनां तु खलु गर्भकराणां भावानां संपदस्तथा वृत्तस्य सौष्ठ- वान्मातृतश्चैवापस्नेहोपस्वेदाभ्यां कालपरिणामात्स्वभावसंसिद्धेश्च कुक्षौ वृद्धिं प्राप्नोति ॥ २७ ॥ गर्भ की वृद्धि के कारण—गर्भ को बनाने वाले माता-पिता आदि कारणों के उत्तम होने से, आचार की श्रेष्ठता मे, उपस्नेह तथा उपस्वेद [ शरीर की गरमी जैसे की पक्षियों के शरीर की गरमी से अण्डे पोषित होते हैं ] इन गुणों से, काल के परिणाम से और स्वभाव से ही गर्भ गर्भाशय से बढता है ॥२७॥ मात्रादीनां तु खलु गर्भकराणां भावानां व्यापत्तिनिमित्तमस्या जन्म भवति ॥ २८ ॥ ये त्वस्य कुक्षौ वृद्धिहेतुसमाख्याता भावास्तेषां विपर्ययादुदरे विना- शमापद्यतेऽथवाऽप्यचिरजातः स्यात् ॥ २९ ॥ गर्भ को बनाने वाले माता पिता आदि कारणों के दूषित होने से गर्भ का जन्म नहीं होता । जो पदार्थ गर्भाशय मे गर्भ की वृद्धि मे कारण बतलाये हैं, इन के विपरीत होने से गर्भ या तो पेट मे नष्ट हो जाता है, अथवा समय से पूर्व उत्पन्न हो जाता है ॥ २८-२६ ॥ गर्भविकृति के कारण— यतस्तु कार्त्स्न्येनाविनश्यन्विकृतिमापद्यते तदनुव्याख्यास्यामः— यदा स्त्रिया दोषप्रकोपणोक्तान्यासेवमानायाः दोषाः प्रकुपिताः शरीरमु- पसर्पन्तः शोणितगर्भाशयावुपपद्यन्ते न तु कार्त्स्न्येन शाणितगर्भाशयो दूषयन्ति तदेयं गर्भं लभते स्त्री । यदा गर्भस्य तस्य मातृजानामवय- वानामन्यतमोऽवयवो विकृतिमापद्यते एकोऽथवाऽनेके । यस्य यस्य ह्यवयवस्य बीजे बीजभागे वा दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, तं तमवयवं विकृतराविशति, यदा ह्यस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभागः प्रदोषमाप- द्यते, तदा वन्ध्यां जनयति । यदा पुनरस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभा-
गावयवः प्रदोषमापद्यते, तदा पूतिप्रजां जनयति । यदा त्वस्याःशोणिते गर्भाशयबीजभागावयवः स्त्रीकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोषमापद्यते, तदा स्त्र्याकृतिभूयिष्ठामस्त्रियं वान्ता १ नाम जनयति । ता स्त्रीव्यापदमाचक्षते ॥ ३० ॥ जिस प्रकार गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त हो जाता है, उसका वर्णन करते हैं—जिस समय दोषो को प्रकुपित करने वाले कारणो का सेवन करती हुई स्त्री में प्रकुपित हुए दोष शरीर में फैल कर रक्त और गर्भाशय मे पहुंच जाते हैं, परन्तु सम्पूर्ण रूप से रक्त और गर्भाशय को दूषित नहीं करते, उस समय यदि स्त्री को गर्भ रह जाये तो माता से उत्पन्न होने वाले गर्भ के अवयवों में से किसी एक में अथवा बहुतों में विकार उत्पन्न हो जाता है। जिस जिस अवयव के बीज में अथवा बीज के एक भाग मे दोष प्रकुपित होते हैं, तब उस उस अवयव में विकृति उत्पन्न हो जाता है। जिस समय स्त्री के रक्त में गर्भाशय का बीज ( उत्पत्ति कारण ) भाग दूषित हो जाता है, तब तब संतान वन्ध्या ( बांझ ) उत्पन्न होती है और जब स्त्री का रक्त या गर्भाशय के बीज का एक भाग दूषित होता है, तब 'पूति प्रजा' ( सडे अगों वाली ) सन्तान उत्पन्न होती है। जिस समय स्त्री का रक्त और गर्भाशय के बीज का एक भाग तथा स्त्री को बनाने वाले शरीर के बीजभागों का एक भाग दूषित हो जाता है, तब स्त्री के लक्षणों वाली ( उपस्थ, स्तन आदि लक्षणों से युक्त ) परन्तु अस- म्पूर्ण लक्षणों वाली 'रान्ता' या बार्त्ता नाम की प्रजा को उत्पन्न करते हैं। इसको स्त्री व्यापत् अर्थात् स्त्री के आर्तव दोष से उत्पन्न व्यापत्ति वा स्त्री शरीर की रचना में होने वाली हानि कहते हैं ॥ ३० ॥ एवमेव यदा पुरुषस्य बीजे बीजभाग प्रकोषमापद्यते, तदा वन्ध्यं जनयति । यदा पुनरस्य बीजे बीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते तदा पूतिप्रजा जनयति । यदा त्वस्य बीजे बीजभागावयवः पुरुषकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोषमापद्यते, तदा पुरुषाकृतिभूयिष्ठमपु- रूप तृणपूलिक नाम जनयति, ता पुरुषव्यापदमाचक्षते ॥ ३१॥ इसी प्रकार पुरुष के बीज में बीज का भाग दोष युक्त होता है, तब पुरुष वन्ध्य को उत्पन्न करता है और जब पुरुष के बीज मे पुरुष का उत्पन्न करने वाले बीज का एकभाग दूषित होता है तब 'पूति प्रजा' अर्थात् दुर्गन्धयुक्त अगो वाली सतान उत्पन्न होती है और जब पुरुष के बीज को
१ 'वार्ता नाम' इति च पाठः ।
६४ चरकसंहिता [ अ० ४ उत्पन्न करने वाले बीज का कोई एक भाग का भी कोई अंश दूषित होता है, तथा पुरुष-शरीर को बनाने वाले भागों का एक अंश दूषित हो जाता है, तब पुरुष के समान बहुत सी आकृति वाला, जो वास्तव में पुरुष नहीं होता ऐसे 'तृण पूलिक' नामक सन्तान को उत्पन्न करता है । इसको पुरुष व्यापत् कहते हैं, [ क्योंकि यह पुरुष से प्राप्त होने वाले और पुरुष शरीर को बनाने वाले बीजांश- दोष से गर्भ में विघ्न आता है ] ॥ ३१ ॥ एतेन मातृजानां पितृजानां चावयवानां विकृतिव्याख्यानेन सात्म्य- जानां रसजानां सत्त्वजानां चावयवानां विकृतिर्व्याख्याता ॥ ३२ ॥ इस प्रकार माता पिता से उत्पन्न होने वाले अवयवों की विकृति के वर्णन से सात्म्य, रस और सत्त्व इन से होने वाली अवयवों की विकृति का भी वर्णन हुआ जान लेना चाहिए ॥ ३२ ॥ निर्विकारः परस्त्वात्मा सर्वभूतानां निर्विशेषः । सत्त्वशरीरयोस्तु विशेषाद्विशेषोपलब्धिः ॥ ३३ ॥ गर्भ आत्मजन्य भी है, परन्तु इस कारण से गर्भ में विकार उत्पन्न नहीं होता । क्योंकि श्रेष्ठ आत्मा निर्विकार ( विकार-रहित ) है । वह सब प्राणियों में समान रूप से रहता है । मन और शरीर की विशेषता से इसे सुख-दुःख आदि का विशेष ज्ञान होता है ॥ ३३ ॥ तत्र त्रयस्तु शरीरदोषाः वातपित्तश्लेष्माणः, ते शरीरं दूषयन्ति । द्वौ पुनः सत्त्वदोषौ रजस्तमश्च, तौ सत्त्वं दूषयतः । ताभ्यां च सत्त्व- शरीराभ्यां दुष्टाभ्यां विकृतिरुपजायते, नोपजायते चाप्रदुष्टाभ्याम् ॥३४॥ शरीर के तीन दोष होते हैं, वात, पित्त और कफ । ये दोष शरीर को दूषित करते हैं । मन के दो दोष हैं रज और तम । ये दोनों मन ( सत्त्व ) को दूषित करते हैं । इन दोनों—मन और शरीर के दुष्ट होने से विकार उत्पन्न होता है और इनके दूषित न होने से विकृति भी नहीं होता ॥ ३४ ॥ तत्र शरीरं योनिविशेषाच्चतुर्विधमुक्तमग्रे ॥ ३५ ॥ प्रथम 'खुड्डीका अध्याय' में कह चुके हैं कि योनि भेद से यह शरीर चार प्रकार का ( जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज ) है ॥ ३५ ॥ त्रिविधं खलु सत्त्वं - शुद्धं, राजसं, तामसमिति । तत्र शुद्धमदोष- माख्यातं कल्याणांशत्वात्, राजसं सदोषमाख्यात रोषांशत्वात्, तथा तामसमपि सदोषमाख्यात मोहांशत्वात् ॥ ३६ ॥
अ० ४ ] ५ शारीरस्थानम् ६५
अ० ४ ] ५ शारीरस्थानम् ६५ तेषां तु त्रयाणामपि सत्त्वानामेकैकस्य भेदाग्रमपरिसंख्येयं तरतम- योगाच्छरीर-योनि-विशेषेभ्यश्चान्योन्यानुविधानत्वाच्च । शरीरमपि सत्त्वमनुविधीयते, सत्त्वं च शरीरं । तस्मात्कतिचिच्च सत्त्वभेदाननू- कसाद्दश्याभिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुव्याख्यामः ॥ ३७ ॥ सत्त्व ( मन ) तीन प्रकार का है । शुद्ध, राजस और तामस । इनमें शुद्ध ( सात्त्विक ) दोषरहित है, क्योंकि यह शुभ ( कल्याण ) कामना का अंश है । राजस दोष युक्त है ? क्योंकि वह रोष का अंश है । तामस भी दोष युक्त है क्योकि वह मोह का अंश है । इन तीनों सत्त्वों में से एक एक के भेद तर, तम, योग से शरीरविशेष, योनि विशेष और एक दूसरे में परस्पर मे मिले होने से असख्य हा जाते है । शरीर भी सत्त्व ( मन ) के अनुसार होता है और मन शरीर के अनुसार होता है । इनमे से कुछ भेदों की तुल्यता दिखाते हुए यहा पर दृष्टान्त रूप में बतलाते है ॥ ३६-३७ ॥ तद्यथा—शुचिं सत्याभिसंधं जितात्मानं सविभागिनं ज्ञान-विज्ञा- न-वचन-प्रतिवचन-शक्ति-सपन्नं स्मृतिमन्तं काम-क्रोध-लोभ-मान- मोहेर्ष्या-हर्षामर्षोपेतं समं सर्वभूतेषु ब्राह्मं विद्यात् ॥ ३८ ॥ सात्त्विक चित्तो के सात भेद—( १ ) ब्राह्म—पवित्र, सत्य प्रतिज्ञावाला, जितात्मा, सम्पत्ति और सत्फल को अन्यों में बाटकर भोगने वाला, ज्ञान- विज्ञान, वचन-प्रतिवचन की शक्ति से युक्त, स्मृतिमान्, काम, क्रोध, लोभ, अभिमान, मोह, ईर्ष्या, हर्ष और क्रोध से रहित, सब प्राणियों में सम बुद्धि रखने वाला हो उसे ब्राह्म प्रकृति जाने ॥ ३८ ॥ इज्याध्ययन-व्रत-होम-ब्रह्मचर्य-परमतिथिव्रतमुपशान्त-मद-मान— राग-द्वेष-मोह-लोभ-रोषं प्रतिभा-वचन-विज्ञानोपधारण-शक्ति-संपन्नमार्षं विद्यात् ॥ ३९ ॥ ( २ ) आर्ष—जो यज्ञ करने वाला, अध्ययनशील, व्रत का पालक होम- शील ब्रह्मचर्य का पालक, अतिथि का पूजक, मद, मान राग, द्वेष, मोह, लोभ और रोष से रहित, प्रतिभा से युक्त वचन, विज्ञान, उपधारण इन शक्तियों से सम्पन्न पुरुष हो उसको आर्ष चित्त वाला जाने ॥ ३९ ॥ ऐश्वर्यवन्तमादेयवाक्यं यज्वानं शूरमोजस्विनं तेजसोपेतमक्लि- ष्टकर्माणं दीर्घदर्शिनं धर्मार्थकामाभिरतमैन्द्रं विद्यात् ॥ ४० ॥ ( ३ ) ऐन्द्र—जो ऐश्वर्यवान्, ग्रहण करने योग्य वाक्य वाला, यज्ञ करने वाला, शूर, ओजस्वी, तेज से युक्त, साहसिक ( बुरे, दूसरे पर आघात पहुँचाने
६६ चरकसंहिता [ अ० ४
वाले) क्रूर कर्मों को न करने वाला, दूरदर्शी, धर्म, अर्थ और काल दत्तचित्त
पुरुष को 'ऐन्द्र' समझे ॥ ४० ॥
लेखास्थवृत्तं प्राप्तकारिणमसंप्रहार्यमुत्थानवन्तं स्मृतिमन्तमैश्वर्य-
लम्भिनं व्यपगतराग-द्वेष-मोहं याम्यं विद्यात् ॥ ४१ ॥
(४) याम्य—जो कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की मर्यादा के भीतर रहनेवाला,
प्राप्तकारी, ( अवसर के अनुसार काम करने वाला ), असंप्रहार्य अर्थात् जिस
पर कोई प्रहार न कर सके वा जिसकी मार रोकी न जा सके, उन्नतिशील,
स्मृतिमान्, ऐश्वर्य्यशील, राग, द्वेष, मोह से रहित पुरुष हो उसको 'याम्य'जाने ४१
शूरं धीरं शुचिमशुचिद्वेषिणं यज्वानमम्भोविहार-रतिमक्लिष्टकर्माणं
स्थानकोपप्रसादं वारुणं विद्यात् ॥ ४२ ॥
( ५ ) वारुण—जो शूरवीर, धीर, पवित्र ओर मैलेपन से द्वेष करनेवाला
यज्ञ करने वाला, जल क्रीड़ा मे रत, क्लिष्ट कर्मों से भिन्न सुख से होने वाले
कर्मों को करने वाला, उचित स्थान में कोप तथा प्रसाद करने वाला पुरुष हो
उसको 'वारुण जाने ॥ ४२ ॥
स्थान मानोपभोगपरिवारोपसपन्नं सुखविहारं धर्मार्थकामनित्यं
शुचिं व्यक्तकोपप्रसादं कौबेरं विद्यात् ॥ ४३ ॥
( ६ ) कौवेर—जो स्थान, मान, उपभोग, सामग्री, परिवार ( कुटुम्ब )
से युक्त, नित्य धर्म, अर्थ और काम में तत्पर, पवित्र सुखपूर्वक विहार विनोद
करने वाला, उचित स्थान पर कोप और प्रसन्नता प्रकट करने वाला पुरुष हो
उसको 'कौवेर' प्रकृति का जाने ॥ ४३ ॥
प्रिय-नृत्य गीत-वादित्रोल्लापक-श्लोकाख्यायिकेतिहास-पुराणेषु कुशलं
गन्ध-माल्यानुलेप-नव-वसन-स्त्रीविहार-नित्यमनसूयकं गान्धर्वं विद्यात्
( ७ ) गान्धर्व—जो नृत्य, गीत, बाजे, स्तोत्र, श्लोक, आख्यायिका,
इतिहास, पुराणों को पसन्द करने वाला, इनमें कुशल, सुगन्ध, माला, अनु-
लेपन, वस्त्र, स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, अनिन्द्य पुरुष हो उसको
'गान्धर्व' जाने ॥ ४४ ॥
इत्येवं शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधं भेदांशं विद्यात्कल्याणांशत्वात्,
संयोगात्तु ब्राह्ममत्यन्तशुद्धं व्यवस्येत् ॥ ४५ ॥
ये शुद्ध सत्त्व के सात भेद हैं, ये शुभ या कल्याण के अंश है। इसके संयोग
होने से 'ब्राह्म' को ही सब से अधिक शुद्ध निर्दोष जाने ॥ ४५ ॥
राजस सत्त्व के ६ भेद—
शूरं चण्डमसूयकमैश्वर्यवन्तमौपधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजक- मासुरं विद्यात् ॥ ४६ ॥ (१) आसुर—जो शूरवीर, प्रचण्ड, दूसरे की निन्दा करने वाला, ऐश्वर्यशाली, छल कपट करने वाला, रुद्र के तुल्य कोप से शत्रुओं को रुलाने वाला, भयकर, दूसरों पर दया न करने वाला, अपनी ही बड़ाई चाहने वाला, आत्माभिमानी हो उसको 'आसुर' जाने ॥ ४६ ॥ अमर्षणमनुबन्धकोपं छिद्रप्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमा मिषप्रियतमं स्वप्नायासबहुलमर्षुं राक्षसं विद्यात् ॥ ४७ ॥ (२) राक्षस—जो असहनशील, कारण से कुपित होने वाला, छिद्र अर्थात् शत्रु के कमजोर स्थान पर चोट करने वाला, क्रूर, भोजन में अधिक रुचि रखने वाला, मांस का बहुत प्यारा, खूब सोने और खूब परिश्रम करने वाला, ईर्ष्या- शील हो उसको 'राक्षस' चित्त वाला जाने ॥ ४७ ॥ महालसं(शनं) स्त्रैण स्त्रीरहस्काममशुचि शुचिद्वेषिणं भीरु भीषयि- तारं विकृत-विहाराहार-शीलं पैशाचं विद्यात् ॥ ४८ ॥ (३) पैशाच—जो बहुत खाने वाला, स्त्री के समान स्वभाव का, स्त्रियों के साथ एकान्त मे रहने की इच्छावाला, अपवित्र, शुद्धता वा स्वच्छता से द्वेष करनेवाला, भीरु, दूसरों को डरानेवाला, विकृत आहार और विकृत विहार वाला हो उसको 'पैशाच' स्वभाव का जाने ॥ ४८ ॥ क्रुद्धं शूरमक्रुद्धं भीरु तीक्ष्णमायासबहुलं संत्रस्तगोचरमाहारविहा- रपरं सार्पं विद्यात् ॥ ४९ ॥ (४) सार्प—जो क्रोधित होने पर शूर और अक्रोधित होने पर भीरु, तीखे स्वभाव का, परिश्रम करनेवाला, भययुक्त स्थानों मे भी दीखनेवाला और आहार विहार करने वाला हो उस पुरुष को 'सार्प' स्वभाव का जाने ॥ ४९ ॥ आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचारमसूयकमसंविभागिनमतिलो लुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् ॥ ५० ॥ (५) प्रैत—जो सदा भोजन की इच्छा करने वाला, बहुत दुःखकारी शील और आचार और उपचार से युक्त, निन्दा करने वाला, दूसरों को अपने धन में से भाग न देने वाला, बहुत लोभी, कर्म न करने वाला पुरुष हो उसको 'प्रैत' अर्थात् प्रेत स्वभाव का जाने ॥ ५० ॥ अनुषक्तकाममजस्रमाहार-विहार-परमनवस्थितममर्षिणमसंचयं- शाकुणं विद्यात् ॥ ५१ ॥
६८ चरकसंहिता [ अ० ४ इत्येवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षड्विध भेदांशं विद्याद्रोषांशत्वात् ५२ ( ६ ) शाकुन—जो कामो मे फसा हुआ, निरन्तर आहार-विहार मे रित, चञ्चल, असहनशील, सचय न करने वाला पुरुष हो उसको 'शाकुन' जाने । इस प्रकार से रोष अर्थात् क्रोध के अश होने से राजस सत्त्व के ये छः भेद जाने ॥ ५१-५२ ॥ तामस के तीन प्रकार— निरलंकरिष्णुमधमवेशं जुगुप्सिताचाराहार-मैथुन-पर स्वप्नशीलं पाशवं विद्यात् ॥ ५३ ॥ ( १ ) पाशव—जो शरीर को अलकृत करने की इच्छा न रखने वाला, अपवित्रस्वभाव, निन्दितआचार और भोजनवाला, मैथुनकामी, सोने के स्वभाववाला पुरुष हो उसको 'पाशव' प्रकृति का जाने ॥ ५३ ॥ भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्त-काम-क्रोध सरणशीलं तोयकाम मात्स्य विद्यात् ॥ ५४ ॥ ( २ ) मात्स्य—जो डरपाक, अज्ञानी, भोजन का लोभी, अस्थिरचित्त, चंचल, काम और क्रोध में फसा हुआ, भ्रमणशील, पानी की अधिक चाह करनेवाला हो उसको 'मात्स्य' प्रकृति का जाने ॥ ५४ ॥ अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्ध्या हीनं वानस्पत्यं विद्यात् ५५ इत्येव खलु तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविध भेदाश विद्यान्मोहांशत्वात् ५६ ( ३ ) वानस्पत्य—जो आलसी, केवल भोजन मे ही दत्तचित्त, सब प्रकार के ज्ञान वा बुद्धि से रहित जड़ पुरुष हो उसको 'वानस्पत्य' अर्थात् स्थावर प्रकृति का जाने । इस प्रकार से मोह का अश होने से तामस सत्त्व के तीन भेद हैं ॥ ५५-५६ ॥ इत्यपरिसंख्येयभेदानां खलु त्रयाणामपि सत्त्वानां भेदैकदेशो व्याख्यातः, शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधो ब्रह्मर्षि-शक्र-वरुण-यम-कुबेर- गन्धर्व-सत्त्वानुकारेण, राजसस्य षड्विधो दैत्य-राक्षस-पिशाच-सर्प-प्रेत- शकुनि-सत्त्वानुकारेण, तामसस्य त्रिविधः पशु-मत्स्य-वनस्पति-सत्त्वा- नुकारेण । कथं च यथासत्त्वमुपचारः स्यादिति । केवलश्वायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति गर्भावक्रान्तिसंप्रयुक्तः। तस्यार्थस्य विज्ञाने सामर्थ्यं—गर्भकरणा च भावानामनुसमाधिर्विघातश्च विघातकरणा भावानामिति ॥५७॥ इस प्रकार से तीनों प्रकार के सत्त्वों (चित्तों) के असंख्य भेद होने पर भी कुछ भेदों के कुछ अंश की व्याख्या कर दी है। ब्रह्म, ऋषि, शक्र, यम,
अ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६
अ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६ वरुण, कुबेर, गन्धर्व इनके सत्त्व के अनुसार क्रम से शुद्ध सत्त्व के सात भेद हैं। दैत्य, पिशाच, राक्षस, सर्प, प्रेत और शकुनि इनके सत्त्व के अनुसार राजस सत्त्व के छः भेद हैं। पशु, मत्स्य और वनस्पति इनके सत्त्व के अनुसार तामस सत्त्व के तीन भेद हैं। किस प्रकार से इन सत्त्वों के अनुसार प्राणियों के साथ बर्त्ताव हो, इसका दिग्दर्शन करा दिया है। इस प्रकार से प्रतिज्ञानुसार यह गर्भावक्रान्ति प्रकरण सम्पूर्ण रूप से कह दिया है। इसमें जानने के प्रयोजन, गर्भकारक भावों के अनुष्ठान, गर्भ के नाश करने वाले कारणों को इस अध्याय से सम्पूर्ण रूप से कह दिया है ॥५७॥ तत्र श्लोकाः—निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षौ क्रमेण च । वृद्धिहेतुश्च गर्भस्य पञ्चार्थाः शुभसञ्ज्ञिताः ॥ ५८ ॥ अजन्मनि च यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि । इमांस्त्रीनशुभान् भावानाहुर्गर्भविघातकान् ॥५९॥ शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक् । सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥६०॥ अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एव ज्ञातुमर्हति । ये च गर्भविघातोक्ता भावांस्तांश्चाप्युदारधीः ॥६१॥ गर्भ के लिये पाच बातें शुभ है—गर्भ का कारण, आत्मा, प्रकृति, बुद्धि और गर्भ का कुक्षि में बढने का कारण। ये पाच अर्थ गर्भ के लिये शुभ कहाते हैं। गर्भ के न होने मे कारण, गर्भ के विनाश में तथा विकार में कारण ये तीन बातें गर्भ को नाश करनेवाले 'अशुभ' कहे जाते हैं। जो वैद्य इन शुभ-अशुभ रूपी आठों बातों को भली प्रकार से जानता है, वह राजा की चिकित्सा करने योग्य है। उदार, विशाल बुद्धिवाले वैद्य को गर्भ की रक्षा वा प्राप्ति के उपाय तथा गर्भ के नाश करनेवाले कारण भी जानने चाहिये ॥५८-६१॥ इत्यग्निवेश कृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने महतीगर्भाव- क्रान्तिशारीर नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः । अथातः पुरुषविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'पुरुषविचय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
७० चरकसंहिता [ अ० ५
पुरुषोऽयं लोकसंमित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः । यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके, इत्येवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—नैतावता वाक्ये- नोक्तं वाक्यार्थमवगाह्यामहे, भगवता बुद्ध्या भूयस्तरमनुव्याख्यायमानं शुश्रूषामहे— इति ।
ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने उपदेश किया है कि यह पुरुष लोक के तुल्य है, लोक में जितने भी विशेष भाव (पदार्थ) है, वे सब इस पुरुष (शरीर) मे हैं, और जितनी बाते इस पुरुष मे हैं, उतनी ही सब लोक में हैं, इस प्रकार कहते हुए भगवान् पुनर्वसु को शिष्य अग्निवेश ने कहा— हे भगवन् ! इतना कह देने से ही हम सम्पूर्ण वाक्यार्थ नही समझ सकते । हे भगवन् ! आपकी बुद्धि से हम अधिक विस्तार में इसको सुनना चाहते हैं ।
तमुवाच भगवानात्रेयः—अपरिसंख्येया लोकावयवविशेषाः, पुरु- षावयवविशेषा अप्यपरिसंख्येया । तेषा यथास्थूलं भावान् सामान्य- मभिप्रेत्योदाहरिष्यामः, तानेक मना निबोध सम्यगुपवर्ण्यमानानग्नि- वेश ! षड्धातवः समुदिता 'लोक' इति शब्द लभन्ते । तद्यथा—पृथिव्या- पस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च षड्धातवः समु- दिताः 'पुरुष' इति शब्दं लभन्ते ॥ ३ ॥
इस पर अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—लोक के विशेष अवयव (वृक्ष, तृण, पशु आदि) तथा पुरुष के विशेष अवयव (स्नायु, कण्डरा, धमनी आदि) भी असख्य हैं। परन्तु यहा पर मोटी माटी बातो का सामान्य रूप से दिग्दर्शन करायेगे । हे अग्निवेश ! उनका वर्णन एकाग्र-चित्त होकर ध्यान से सुनो ! छ धातुऐ मिलकर एक समुदाय 'पुरुष' नाम से कहे जाते हैं । अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश और अव्यक्त ब्रह्म । इन छ धातु का समुदाय मिलकर 'पुरुष' ऐसा कहा जाता है ॥ ३ ॥
तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्ति', आपः क्लेदः, तेजोऽभिसंतापो, वायुः प्राणो, वियच्छिषिराणि, ब्रह्माऽन्तरात्मा, यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापति- रन्तरात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्त्व, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदित्यस्तु आदान, रुद्रो रोषः, सोमःप्रसादो, वसवः सुखम्, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहो, विश्वेदेवाः सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च, तमो मोहो, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं,
अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७१
अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७१ यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, यथा द्वापरस्तथा स्थाविर्यं, यथा कलिरैवमातुर्यं, यथा युगान्तस्तथा मरणमिति । एव- मनुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश ! सामा- न्य विद्यात् ॥ ४ ॥ इस पुरुष में पृथिवी कठिन भाग है, क्लेद अर्थात् जलवाला अंश आप (जल) है, तेज उष्णिमा है, वायु प्राण है, आकाश छिद्ररूप है, ब्रह्म आत्मा है। जिस प्रकार लोक में ब्रह्म की विभूति है उसी प्रकार पुरुष में अन्तरात्मा की विभूति (ऐश्वर्य) है। लोक में ब्रह्म की विभूति प्रजापति है, पुरुष में अन्त- रात्मा की विभूति 'सत्त्व' है। लोक में जो इन्द्र है, पुरुष में वही अहंकार है। लोक में जो आदित्य है, पुरुष में वही आदान है। लोक में जो रुद्र है पुरुष में वही रोष (क्रोध) है। लोक का सोम पुरुष में प्रसाद है। लोक में जो वसु हैं, वे पुरुष में सुख हैं। लोक के दो अश्विनी हैं, पुरुष में वे ही कान्तिरूप हैं। लोक में जो मरुत हैं पुरुष में वह उत्साह है। लोक में जो विश्वेदेव हैं, पुरुष में वे इन्द्रियां और इन्द्रियों के विषय हैं। लोक का तम पुरुष में मोह है। लोक की ज्योति पुरुष में ज्ञान है। जिस प्रकार लोक में सर्ग अर्थात् सृष्टि का प्रारम्भ है उसी प्रकार पुरुष में गर्भाधान क्रिया है। जिस प्रकार लोक में सत्युग है उसी प्रकार पुरुष में बाल्य-अवस्था है। जिस प्रकार लोक में त्रेतायुग है उसी प्रकार पुरुष में यौवन है। जिस प्रकार लोक में द्वापर है उसी प्रकार पुरुष में बुढ़ापा है। जिस प्रकार लोक में कलियुग है उसी प्रकार पुरुष में रोग है। जिस प्रकार लोक में युग का समाप्ति है उसी प्रकार पुरुष में मृत्यु है। इस प्रकार से हे अग्निवेश ! लोक और पुरुष इन दोनों के उन २ विशेष अवयवों को समानता को अनुमान के द्वारा जान लेना चाहिये जिनका यहां वर्णन नहीं किया है ॥ ४ ॥ इत्येववादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-एवमेतत्सर्वमनप- वादं यथोक्तं भगवता लोकपुरुषयोः सामान्यम् । किन्वस्य सामान्यो- पदेशस्य प्रयोजनमिति ॥ ५ ॥ इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा-हे भगवन् ! आपने जो लोक और पुरुष की समानता कही है वह बिना किसी अपवाद के निर्विवाद ठीक है। परन्तु इस समानता के उपदेश का प्रयोजन क्या है ? ॥ ५ ॥ भगवानुवाच-कथमग्निवेश ! सर्वलोकमात्मन्यात्मानं च सर्वलोके समनुपश्यतः सत्या बुद्धिः समुत्पत्स्यते इति, सर्वलोकं ह्यात्मनि पश्यतो
७२ चरकसंहिता [ अ० ५
भवत्यात्मैव सुखदुःखयो कर्ता नान्य इति, कर्मात्मकत्वाच्च हेत्वादिभि-
र्युक्तः सर्वलोकोऽहमिति विदित्वा ज्ञान पूर्वमुत्थाप्यतेऽपवर्गायेति ।
तत्र संयोगापेक्षी लोकशब्दः, षड्धातुसमुदायो हि सामान्यत-
सर्वलोकः ॥ ६ ॥
भगवान् बोले- हे अग्निवेश क्योंकि-अपने में सम्पूर्ण लोक और सम्पूर्ण
लोक में अपनी समानता देख कर 'सत्य बुद्धि' उत्पन्न होती है । सम्पूर्ण लोक
को अपने में देखने से प्रतीत होता है कि अपना आत्मा ही सुख-दुःख का
कर्त्ता है और दूसरा नहीं। कर्म के कारण यह सब कुछ होने से तथा आगे कहे
जाने वाले हेतु आदि से 'मैं सम्पूर्ण लोक हूं' ऐसा जान लेने पर ही मोक्ष के
लिये प्रथम ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यहां 'लोक' शब्द संयोग की अपेक्षा से
है। छः धातुओं का समुदाय ही सामान्यत 'सर्वलोक' है ॥ ६ ॥
तस्य हेतुरुत्पत्तिर्वृद्धिरुपप्लवो वियोगश्च । तत्र हेतुरुत्पत्तिकारणं,
उत्पत्तिर्जन्म, वृद्धिराप्यायनं, उपप्लवो दुःखागम । षड्धातुविभागो
वियोगः, स जीवापगमः, स प्राणनिरोधः, स भङ्गः, स लोकस्वभावः ।
तस्य मूलं सर्वोपप्लवानां च प्रवृत्तिः, निवृत्तिरुपरमः । प्रवृत्तिर्दुःख
निवृत्तिः सुखमिति यज्ज्ञानमुत्पद्यते तत्सत्य, तस्य हेतुः सर्वलोकसामा-
न्यज्ञान, तत्प्रयोजनं सामान्योपदेशस्येति ॥ ७ ॥
उसके उत्पत्ति, वृद्धि, उपप्लव और वियोग ये पाच हेतु हैं। इनमें से
उत्पत्ति के कारण को 'हेतु' कहते हैं। उत्पत्ति का अर्थ 'जन्म' है। वृद्धि का
अर्थ है बढ़ना। दुःख का आना 'उपप्लव' है, छ धातुओं के विभाग का नाम
'वियोग' है, यही जीव का देह से पृथक् होजाना है। इसी को प्राण का नाश
और इसी को 'भग' कहते हैं। यह लोक का स्वभाव है। सब सुख दुःखों को
प्रवृत्ति इसका मूल कारण है। सब से उपरम निवृत्ति है। प्रवृत्ति दुःख है,
निवृत्ति सुख है। जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह सत्य है । इस सत्य ज्ञान का
कारण सम्पूर्ण लोक की समानता का ज्ञान होना है। समानता के उपदेश करने
का यही प्रयोजन है ॥ ७ ॥
अथाग्निवेश उवाच-किंमूला भगवन् ! प्रवृत्तिर्निवृत्तौ वा उपाय
इति ॥ ८ ॥
अग्निवेश ने पूछा- हे भगवन् ! ससाररूप प्रवृत्ति का कारण तथा मोक्ष
रूप निवृत्ति का उपाय क्या है ? ॥ ८ ॥
भगवानुवाच - मोहेच्छा-द्वेष-कर्म-मूला प्रवृत्तिः, तज्जा ह्यहङ्कार-
सङ्ग-संशयाभिसंप्लवाभ्यवपात-विप्रत्ययाविशेषाऽनुपायास्तरुणमिव द्रुम-
अ० ५ ] शारीरस्थानम् ७३ मतिविपुलशाखास्तरवोऽभिभूय पुरुषमवतत्यैवोत्तिष्ठन्ते, यैरभिभूतो न सत्तामतिवर्तते । भगवान् आत्रेय बोले—मोह (मिथ्याज्ञान), इच्छा, द्वेष और कर्म (धर्मा- धर्म) इनके कारण से प्रवृत्ति होती है। जैसे—एक छोटे वृक्ष को इसी वृक्ष से उत्पन्न बहुत बड़ी बड़ी शाखाये और अन्य अनेक वृक्ष घेर लेते है, उसी प्रकार इन मोह आदि से उत्पन्न अहंकार (मैं हू ऐसा भाव), अच्छा बुरा सग, सशय, अभिसप्लव (अपने को सब कुछ मानना), अभ्यवपात (बाह्य सम्बन्धों की ममता में फसना), विप्रत्यय (विपरीत प्रतीति करना), अविशेष (धर्म अधर्म आदि मे समान प्रतीति) और अनुपाय (स्नान, मार्जन, होम, जप, अग्नि मे प्रवेश आदि अवास्तविक उपायो का अवलम्बन) पुरुष को घेर कर स्वय प्रबल हो जाते हैं। इनसे दब कर पुरुष अपनी वास्तविक सत्ता वा प्रवृत्ति के कारण को नहीं जान सकता । तत्रैवजाति-रूप-वित्त-वृत्त-बुद्धि-शील-विद्याभिजन-वयो-वीर्य- प्रभाव-सपन्नोऽहमित्यहङ्कारः, यद्यन्मनोवाक्कायकर्म नापवर्गाय स सङ्गः। कर्मफल-मोक्ष-पुरुष-प्रेत्यभावादयः सन्ति वा नेति सशयः, सर्वास्ववस्थास्व- नन्योऽहमहं स्रष्टा स्वभावसंसिद्धोऽहमहं शरीरेन्द्रिय-बुद्धि-स्मृति-विशेष- राशिरिति ग्रहणमभिसप्लवः, मम मातृ पितृ-भ्रातृ-दारापत्य-बन्धु-मित्र- भृत्य-गणो गणस्य चाहमित्यभ्यवपातः, कार्याकार्य-हिताहित-शुभाशुभेषु विपरीताभिनिवेशो विप्रत्ययः, ज्ञाज्ञयोः प्रकृतिविकारयोः प्रवृत्तिनिवृ- त्त्योश्च सामान्यदर्शनमविशेषः, प्रोक्षणानशनाग्निहोत्र-त्रिःसवनाभ्युक्ष- णावाहन-यजन-याजन याचना-सलिल-हुताशन-प्रवेशादयः समारम्भाः प्रोच्यन्ते ह्यनुपायाः । इस अवस्था मे वह जाति, रूप, वित्त, आचार, बुद्धि, शील, विद्या, कुटुम्ब, वय, वीर्य, प्रभाव से मैं ऐश्वर्य्यशाली हूँ ऐसा भाव होना 'अहकार' है । मन, वाणी, शरीर के जो कार्य मोक्ष के लिये न हों वह 'सग' है । कर्मों के फल, मोक्ष, पुरुष (आत्मा) प्रेत्यभाव अर्थात् पुनर्जन्म आदि है या नहीं इसका नाम 'सशय' है। सब अवस्थाओं में मैं ही एक मात्र हूँ, मैं ही स्रष्टा हूँ, मै स्वभाव से सिद्ध हूँ, मै ही शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, स्मृति विशेष का समूह हूँ-ऐसा सम- झना अभिसप्लव है । मेरी माता, मेरे पिता, मेरे भाई, मेरी स्त्री, मेरे पुत्र, मेरे बन्धु, मेरे मित्र, मेरे भृत्य आदि और मै इनका हूँ, इसी का नाम ममता 'अभ्य वपात' है । कार्य-अकार्य, हित-अहित, शुभ-अशुभ में विपरीत (कार्य में अकार्य और अकार्य में कार्य आदि का) ज्ञान होना 'विप्रत्यय' है । ज्ञानी-अज्ञानी
७४ चरकसंहिता [ अ० ५
प्रकृति-विकार, प्रवृत्ति-निवृत्ति इनमें समानता देखना 'अविशेष' है। प्रोक्षण,
उपवास, अग्निहोत्र, तीनवार भली प्रकार स्नान, अभ्युक्षण ( जल से मार्जन ),
आवाहन, यजन, याजन, याचना ( प्रार्थना ) जल में प्रवेश या अग्नि में प्रवेश
आदि कर्म परम मोक्ष के उपाय नहीं हैं, तो भी उनका उपाय समझना यह
'अनुपाय' है।
एवमयमधी धृति-स्मृतिरहङ्काराभिनिविष्टः सक्त ससशयोऽभिसंप्लु-
तबुद्धिरभ्यवपतितोऽन्यथादृष्टिरविशेषग्राही विमार्गगतिर्निवासवृक्षः
सत्त्व-शरीर-दोष-मूलानां मूलं सर्वदुःखानां भवति । एवमहङ्कारादिभि-
र्दोषैर्भ्राम्यमाणो नानिवर्तते प्रवृत्ति, सा च मूलमघस्य ॥ ६ ॥
इस प्रकार से यह पुरुष बुद्धि, धृति और स्मृति से रहित, अहङ्कार से अह-
ङ्कारी होकर, मोक्ष से दूर करने वाले कार्यों में फस कर, कर्मफल, मोक्ष, आत्मा
आदि मे सन्देह करता हुआ, अपने को ही कर्त्ता, धर्त्ता आदि सब कुछ समझता
हुआ, 'ये मेरे मै इनका' इस ममता के गड्ढे मे गिरा हुआ, अन्यथा-दृष्टि
अर्थात् सम्यग् दृष्टि से रहित होकर, धर्म-अधर्म, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य आदि में
विशेष विवेक न करता हुआ, विपरीत मार्ग से चलता हुआ चित्त और शरीर
के दोषों से उत्पन्न होने वाले समस्त दुःखों का निवास वृक्ष हो जाता है। इस
प्रकार से अहङ्कार आदि आठ दोषों के कारण चक्कर खाता हुआ प्रवृत्ति
( संसार ), से निकल नही सकता और यह प्रवृत्ति ही पाप का कारण है ॥६॥
निवृत्तिरपवर्गस्तत्परं तत् प्रशान्त तदक्षरं तद् ब्रह्म स मोक्षः । तत्र
मुमुक्षूणामुदयनानि व्याख्यास्यामः—
निवृत्ति का नाम 'अपवर्ग' है। यही परम सर्वश्रेष्ठ शान्त पद है, यही
अक्षर, यही ब्रह्म और इसी को मोक्ष कहते है। इस प्रसंग में मुमुक्षु पुरुषों के
लिये उन्नति के उपायों का उपदेश करते हैं।
तत्र लोकदोषदर्शिनो मुमुक्षोरादित एवाऽऽचार्याभिगमन, तस्योपदे-
शानुष्ठान, अग्नेरेवोपचर्या, धर्मशास्त्रान्वगमन १, तदर्थावबोधः, तेना-
वष्टम्भः, तत्र यथोक्ताः क्रियाः, सतामुपासनमसतां परिवर्जन, अस-
ङ्गत्तिर्दुर्जनैन, सत्य सर्वभूतहितमपरुषमनतिकाले परीक्ष्य वचन, सर्व-
प्राणिष्वात्मनीवावेक्षा, सर्वांसामस्मरणमसंकल्पनमप्रार्थनमनभिभा-
षण च स्त्रीणा, सर्वपरिग्रहत्यागः, कौपानं प्रच्छादनार्थं धातुरागनि-
वसन, कन्थासीवनहेतोः सूचीपिप्पलकं, शौचाधानहेतोर्जलकुण्डिका,
१. 'सर्वप्रवृत्तिष्ववसङ्गा' इति च पाठः ।