भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

अ० ४] शारीरस्थानम् ५५

शरीर का श्रेष्ठ धातुस्वरूप शुक्र शरीर के प्रत्येक अंग से उत्पन्न होता है। वह
हर्ष के कारण उत्पन्न तथा हर्ष के ही द्वारा प्रेरित होकर आत्मा का आश्रय भूत
यह बीज रूप धातु पुरुष के शरीर से बाहर आकर उचित मार्ग से गर्भाशय में
प्रवेश करके आर्तव के साथ मिलता है ॥ ७ ॥
तत्र पूर्वं चेतनाधातुः सत्वकरणो गुणग्रहणाय प्रवर्तते । स हि
हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता मन्ता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा
विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽव्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्रधान-
मव्यक्तं जीवो ज्ञः पुद्गलश्चेतनावान्विभुर्भूतात्मा चेन्द्रियात्मा
चान्तरात्मा चेति ॥ ८ ॥
सबसे प्रथम मन के साधनवाला चेतना-धातु गुण को ग्रहण करने के लिये
प्रवृत्त होता है। उसी चेतना धातु को हेतु, कारण, निमित्त, अक्षर, कर्त्ता,
मन्ता, वेदिता, बोद्धा, द्रष्टा, धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप, पुरुष, प्रभव,
अव्यय, नित्य, गुणी (गुणवान्), ग्रहण (मूर्त्ता को ग्रहण करने वाला), प्रधान,
अव्यक्त, जीव, ज्ञ, पुद्गल, चेतनावान्, विभु, भूतात्मा, इन्द्रियात्मा और अन्त-
रात्मा इन पर्यायों से कहते हैं ॥ ८ ॥
स गुणोपादानकालेऽन्तरिक्षं पूर्वतरमन्येभ्यो गुणेभ्य उपादत्ते;
यथा प्रलयात्यये सिसृक्षुर्भूतान्यक्षरभूतः सत्त्वापादानः पूर्वतरमाकाशं
सृजति, ततः क्रमेण व्यक्ततरगुणान्धातृन्वाय्वादींश्चतुरः, तथा देह-
ग्रहणेऽपि प्रवर्तमानः पूर्वतरमाकाशमेवोपादत्ते, ततः क्रमेण व्यक्ततर-
गुणान्धातूनवाय्वादींश्चतुरः, सर्वमपि तु खल्वेतद् गुणोपादानमणुना
कालेन भवति ॥ ९ ॥
वह चेतना धातु गुणों के उत्पत्ति काल में अन्य वायु आदि गुणों से पूर्व,
सब से प्रथम अन्तरिक्ष का ग्रहण करता है। क्योकि प्रलय के अनन्तर सृष्टि
के प्रारम्भ में सृष्टि को बनाने की इच्छा वाला प्रधान, अक्षर, पुरुष, सत्त्व को
लेकर सब से प्रथम आकाश को बनाता है। इसके बाद क्रम से अधिक
व्यक्त गुणों वाले वायु आदि चार धातुओं को उत्पन्न करता है। उसी
प्रकार देह के ग्रहण करने के अवसर में भी प्रवृत्त हुआ आत्मा सबसे पूर्व
आकाश को ही ग्रहण करता है, फिर क्रम से उससे अधिक स्पष्ट गुणों
वाले वायु आदि चार धातुओं को लेता है। इनके गुणों का पूर्ण रीति से
ग्रहण करना बहुत थोड़े समय मे ही हो जाता है। [इस प्रकार आकाश
में एक गुण, वायु में दो गुण (शब्द, स्पर्श), अग्नि में तीन गुण