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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८१

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८१ क्वाथ-योग श्लोक के चतुर्थांशो में कहे गये है । इनको शहद के साथ मिलाकर प्रयोग करे । ये पित्तनाशक है ॥ ३०-३२ ॥ सर्वेषु मेहेषु मतौ तु पूर्वौ कषाययोगौ विहितास्तु सर्वे । मन्थस्य पाने यवभावनाया स्युर्भोजने पानविधौ पृथक्च ॥ ३३ ॥ सिद्धानि तैलानि घृतानि चैव देयानि मेहेष्वनिलात्मकेषु । मेदः कफश्चैव कषाययोगैः स्नेहेश्च वायुः शममेति तेषाम् ॥ ३४ ॥ ( १) सब से पूर्व (दार्बी और सुराह्वा) कहे दो योगो को सब प्रकार के प्रमेहो मे देवे । इन बाईस प्रयोगो को मन्थ के पान मे, जौ की भावना देने मे, भक्ष्य और पेय पदार्थों के सस्कार मे विवेचनापूर्वक देवे । ( २ ) वात प्रमेह में इन्हीं कषायो से सिद्ध घी और तैल का प्रयोग करे । इन कषाया से मेद और कफ शान्त होते हे और स्नेहन से वायु शान्त होता है ॥ ३३-३४ ॥ [ वातज और कफपित्तज मे यापन के लिये कषाय पीये वसामेह में अग्निमन्थ का, मज्जामेह मे गिलोय और चीते का, उसमे कूठ, कुड़ा, पाठा और कटुरोहिणी मिला ले । हस्तिमेह मे हाथी, शूकर, गधा, ऊट इनकी अस्थि के सार का उपयोग करे । मधुमेह मे कदर और खदिर का, कफानुगतादि मेहो मे तदनुसार उपदेश किये कषायो से साधित तैलो का उपयोग करे ओर पित्तानु- गत म घृत और यमको का प्रयोग करे—अष्टाग-स० ] । कम्पिल्लसप्तच्छदशालजानि बैभीतरौहीतककौटजानि । कपित्थपुष्पाणि च चूर्णितानि क्षौद्रेण लिह्यात्कफपित्तमेही ॥ ३५ ॥ पिबेद्रसेनामलकस्य वापि कल्कीकृतान्यक्षसमानि काले । जीर्णे च भुञ्जीत पुराणमन्नं मेही रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः ॥ ३६ ॥ ( ३ ) कफ प्रमेह और पित्त-प्रमेह मे—कमीला, सतवन की छाल, शाल की लकडी इनका चूर्ण या बहेडा, रोहेडा की छाल, कुटज की छाल इनका चूर्ण अथवा कैथ के फूलो के चूर्ण को मधु के साथ चाटे । अथवा इन्ही तीनो योगो मे से एक का चूर्ण ( एक कर्ष ) करके आवले के रस के साथ पीवे । औषध के जीर्ण होने पर पुराने शालि आदि के भात को जगल पशु-पक्षियो के स्वादु मास-रसो के साथ खावे ॥ ३५-३६ ॥ दृष्ट्वाऽनुबन्धं पवनात्मकस्य पित्तस्य वा स्नेहविधिर्विकल्प्यः । तैलं कफे स्यात्त्वकषायसिद्धं पित्ते घृतं पित्तहरैः कषायैः ॥ ३७ ॥ वायु के साथ पित्त या कफ का अनुबन्ध देखकर स्नेह विधि मे भेद करना चाहिये । अर्थात् कफ मे कफघ्न औषधियो के कषाय मे सिद्ध तैल बरते । पित्त का अनुबन्ध होने पर पित्तघ्न ओषधियो के कषाय मे सिद्ध घृत बरते ॥३७॥

३८२ चरकसंहिता [ अ० ६ त्रिकण्टकाश्मन्तकसोमवल्कैर्भल्लातकैः सातिविषैः सलोध्रैः । वचापटोलार्जुननिम्बमुस्तैर्हरिद्रया पद्मकदीप्यकैश्च ॥ ३८ ॥ मञ्जिष्ठया वाऽगुरुचन्दनैश्च सर्वैः समुस्तैः कफवातजेषु । मेहेषु तैलं, विपचेद् घृतं तु पैत्तेषु, मिश्रं त्रिषु लक्षणेषु ॥ ३६ ॥ ( ५ ) त्रिकण्टकाद्य तैल, घृत और यमक—( १ ) गोखरू, अश्मन्तक, सोमवल्क ( श्वेत खदिर ) । ( २ ) भिलावा अतीस, लोध । ( ३ ) वच, पर- वल, अर्जुन, नीम की छाल, नागरमोथा । ( ४ ) हल्दी, पद्माख, अजवायन । ( ५ ) मजीठ, अगर और लाल चन्दन इन पाच योगो को मोथे के साथ मिला कर कफ-वातजन्य प्रमेहो ( कफमेह मे वायु का योग हो ) मे, तैल का पाक करे । तैल से चतुर्थाश कल्क और चौगुने जल मे धीरे २ तैल पकावे । पित्त- जन्य प्रमेह मे वायु का अनुबन्ध हा तो इनके कल्क से घृत पाक करे । तीनो दोषो के लक्षण हो तो इन्ही द्रव्यो के कल्क से घी और तैल के यमक को यथा- विधि सिद्ध करके प्रयोग करे१ । ॥३८-३६॥ फलत्रिकं दारुनिशा विशालां मुस्ता च निःक्वाथ्य निशा सकल्काः । पिवेत्कषाय मधुसंप्रयुक्तं सर्वप्रमेहेषु समुद्धृतेषु ॥ ४० ॥ ( ६ ) फल त्रिकादि क्वाथ—त्रिफला, दारुहल्दी, विशाला ( इन्द्रायण ), मोथा इनका क्वाथ करके हल्दी के कल्क का प्रक्षेप मिला कर मधु के साथ प्रवृद्ध प्रमेहो मे पीवे ॥४०॥ लोध्रं शटी पुष्करमूलमेलां मूर्वा विडङ्गं त्रिफलां यवानीम् । चव्यं प्रियंगुं क्रमुक विशाला किराततिक्तं कटुरोहिणीं च ॥ ४१ ॥ भाङ्गीनतं चित्रकपिप्पलीना मूलं सकुष्ठातिविष सपाठम् । कलिङ्गकान्केशरमिन्द्रसाह्वा नख सपत्रं मरिचं सर्वं च ॥ ४२ ॥ द्रोणेऽम्भसः कर्षसमानि पक्त्वा पूते चतुर्थागजलावशेषे । रसेऽर्धभागं मधुनः प्रदाय पक्षं निधेयो घृतभाजनस्थः ॥ ४३ ॥ लोध्रासवोऽय कफपित्तमेहान् क्षिप्रं निहन्याद् द्विपलप्रयोगात् । पाण्ड्वामयार्शांस्यरुचि ग्रहण्या दोष किलासं विविधं च कुष्ठम् ॥४४॥ इति लोध्रासवः२ । १ यहा पर पाच योग है । सब के साथ मोथा मिलाना चाहिये । कई आचार्य ‘समुस्तैः’ के स्थान पर ‘समस्तै ’ पढते है । उनके लिये एक ही योग है । अष्टाग-सग्रह मे इसको एक ही योग पढा है । वहा पर चतुर्जातक का प्रयोग करने के लिये लिखा है । २ ‘मध्वासव’ इति च पाठः ।

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८३

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८३ ( ७ ) लोध्रासव—लोध्र, कचूर, पोहकरमूल, छोटी इलायची, मूर्वा मूल, बायविडंग, त्रिफला, अजवायन, चविका, फल प्रियंगु, क्रमुक (सुपारी या पट्टिका लोध्र), इन्द्रायण, चिरायता, कुटकी, भार्गी, तगर, चीतामूल, पिप्पलीमूल, कूठ, अतीस, पाठा, इन्द्रजा, नागकेसर, इन्द्रसाह्वा ( छोटी इन्द्रायण ), नखी, तेज- पत्र, कालीमिर्च, प्लव ( केवटी मोथा ) प्रत्येक वस्तु १ कर्ष लेकर दो द्रोण पानी में क्वाथ करे। चतुर्थांश ( ( २ आढक ) रहने पर छान ले। इसमें एक आढक मधु मिला कर घी से भावित पात्र में डाल कर पन्द्रह दिना तक सन्धान करके रख दे। मात्रा—दो पल है, यह लोध्रासव कफजन्य, पित्तजन्य प्रमेहो का, पाण्डुरोग, अर्श अरुचि, ग्रहणीरोग, किलास और नाना प्रकार के कुष्ठ का नष्ट करता हे ॥४१-४४॥ क्वाथः स एवाष्टपले च दन्त्या भल्लातकानां च चतुष्पलं स्यात् । सितोपला त्वष्टपला विशेषः क्षौद्रं च तावत्पृथगासवौ तौ ॥ ४५ ॥ ( ८) दन्त्यासव—पूर्वोक्त लोध्रासव के क्वाथ में दन्तीमूल के आठ पल, मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा ( १ आढक ) मिला कर रखे। यह दन्त्यासव है। ( ६ ) भल्लातकासव—लोध्रासवोक्त क्वाथ आधा द्रोण, विशुद्ध भिलावा का चूर्ण ४ पल, मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा डाल कर सन्धान करे। ये दोनो आसव कफजन्य और पित्तजन्य प्रमेहा को नष्ट करते है ॥ ४५ ॥ सारोदकं वाथ कुशोदकं वा मधूदकं वा त्रिफलारस वा। शीधु पिबेद्वा निगदं प्रमेही माध्वीकमग्र्यं चिरसंस्थितं वा ॥४६॥ ( १० ) षडगपानीय विधि से खैर की लकडी का सावित जल, कुशा मूल का जल ( क्वाथ ), शहद का शरबत, त्रिफला का क्वाथ या रस, दोष रहित शीधु ( जौ का मद्य ), या पुरातन श्रेष्ठ माध्वोक ( मधु या द्राक्षा आदि से बना मद्य ) पीवे ॥ ४६ ॥ मांसानि शूल्यानि मृगद्विजानां खादेद्यवानां विविधांश्च भक्ष्यान् । संशोधनाविष्टकषायलेहैः सन्तर्पणोत्थान् १ शमयेत्प्रमेहान् ॥४७॥ भृष्टान् यवान् भक्षयतः प्रयोगाच्छुष्कांश्च सक्तून्न भवन्ति मेहाः । श्वित्रं च कुष्ठं च कफ च कृच्छ्रं तथैव मुद्गामलकप्रयोगात् ॥४८॥ सन्तर्पणोत्थेषु गदेषु योगा मेदस्विना ये च मयोपदिष्टाः । विरूक्षणार्थं कफपित्तजेषु सिद्धाः प्रमेहेष्वपि ते प्रयोज्याः ॥४९॥ १ सतर्पणज्ञ इति च पाठः ।

३८४ चरकसंहिता [अ० ६ व्यायामयोगैर्विविधैः प्रगाढैरुद्वर्तनैः स्नानजलावसेकैः। सेव्यत्वगेलागुरुचन्दनाद्यैर्विलेपनैश्चाशु न सन्ति मेहाः ॥५०॥ क्लेदश्च मेदश्च कफश्च वृद्धः प्रमेहहेतुः१ प्रसमीक्ष्य तस्मात् । वैद्येन पूर्वं कफपित्तजेषु मेहेषु कार्याण्यपतर्पणानि ॥ ५१ ॥ या वातमेहान्प्रति पूर्वमुक्ता वातोल्बणाना विहिता क्रिया सा । वायुर्हि मेहेष्वतिकर्पिताना कुर्यात्यसाध्यान् प्रति नास्ति चिन्ता॥५२॥ येर्हेतुभिर्ये प्रभवन्ति मेहास्तेषु प्रमेहेषु न ते निषेव्याः । हेतोरसेवा विहिता यथैव जातस्य रोगस्य भवेच्चिकित्सा ॥ ५३ ॥ (१०) पशु-पक्षियो के शलाका पर भुने मास, जो से बने नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थ खावे । रुतर्पण से उत्पन्न प्रमेहो का सशोधन, अरिष्ट, कषाय, अवलेहो द्वारा शान्त करे । (११) भुने हुए जौ को, सूखे सत्तूओ का, मूग ओर आवलो के आहार को नित्य खाने से प्रमेह, श्वित्र, कुष्ठ, कफ रोग ओर मूत्रकृच्छू नही होते । (१२) सन्तर्पण से उत्पन्न रोगो मे तथा मेदस्वी पुरुषो के लिये विरूक्षण योग जो पहिले सन्तर्पणीय अध्याय मे तथा 'अष्टौ-निन्दिताय' अध्याय मे कहे है, उनका कफज ओर पित्तज प्रमेहो मे प्रयोग करे । (१३) नाना प्रकार की व्यायामों से, बलपूर्वक मर्दन से, स्नानजल के परिषेक से, खस, दालचीनी, इलायची, अगरु, चन्दन आदि के लेपन से प्रमेह नष्ट होते है। (१४) प्रवृद्ध क्लेद, मेद और कफ प्रमेह के कारण है, इसलिये वैद्य को चाहिये कि कफ-पि- त्तज प्रमेहो मे अपतर्पण करे । (१५) वात-प्रमेहो की जो चिकित्सा प्रथम कही है, वही चिकित्सा वाताल्बण प्रमेही की होनी चाहिये । क्योकि प्रमेहो मे अत्य- धिक कर्षण होने से वायु प्रकुपित हो जाती है, इसलिये ये वाताल्बण है। असाध्य वातजन्य प्रमेहो का चिकित्साविधि मे विचार करना व्यर्थ है । (१६) जिन जिन कारणों से प्रमेह उत्पन्न होता है, प्रमेही को चाहिये कि उनका सेवन न करे । जैसे—स्वस्थ पुरुषो मे रोगोत्पत्ति के कारणों को सेवन न करने का विधान है उसी प्रकार यहा भी कारणों को सेवन न करना ही चिकित्सा है ॥ ४७-५३ ॥ हारिद्रवर्णं रुधिरं च मूत्रं विना प्रमेहस्य हि पूर्वरूपैः । यो मूत्रयेत्तं न वदेत्प्रमेहं रक्तस्य पित्तस्य हि स प्रकोपः ॥५४॥ १ 'नाशं प्रयाति' इति च पाठ ।

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४१५

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४१५ की स्मृति और बुद्धि को बढाने के लिये कुष्ठ-नाशन अध्याय मे संग्रह किया है ॥ १७७-१७६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने कुष्ठचिकित्सितं नाम सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ७ ॥ अष्टमोऽध्यायः अथातो राजयक्ष्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम 'राजयक्ष्मा की चिकित्सा' का वर्णन करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ दिवौकसां कथयतामृषिभिर्वै श्रुता कथा । कामव्यसनसंयुक्ता पौराणी शशिनं प्रति ॥ ३ ॥ रोहिण्यामतिसक्तस्य शरीरं नानुरक्षतः । आजगामाल्पतामिन्दोर्देहः स्नेहपरिक्षयात् ॥ ४ ॥ दुहितॄणामसंभोगाच्छ्लेष्मांशं च प्रजापतेः । क्रोधो निःश्वासरूपेण मूर्तिमान् निःसृतो मुखात् ॥ ५ ॥ पजापतेर्हि दुहितॄरष्टाविंशतिमंशुमान् । भार्यार्थं प्रतिजग्राह न च सर्वास्र्ववर्तत ॥ ६ ॥ गुरुणा तमवध्यातं भार्यास्वसमवर्तिनम् । रजःपरीतसबलं¹ यक्ष्मा शशिनमाविशत् ॥ ७ ॥ सोऽभिभूतोऽतिबलिना² गुरुक्रोधेन निष्प्रभः । देवदेवर्षिसहितो जगाम शरणं गुरुम् ॥ ८ ॥ अथ चन्द्रमसः शुद्धां मतिं बुद्ध्वा प्रजापतिः । प्रसादं कृतवान्सोमस्ततोऽश्विभ्यां चिकित्सितः ॥ ६ ॥ स विमुक्तो ग्रहश्चन्द्रो विरराज विशेषतः । ओजसा वर्धितोऽश्विभ्यां शुद्धं सत्त्वमवाप च ॥ १० ॥ क्रोधो यक्ष्मा ज्वरो रोग एकोऽर्थो दुःखसंज्ञितः । यस्मात्स राज्ञः प्रागासीद्राजयक्ष्मा ततो मतः ॥ ११ ॥ १ 'रजोऽन्धमबल दोन' इति च । २ 'गुरुणा' इति च

४१६ चरकसंहिता [ अ० ८ स यक्ष्मा हुङ्कृतोऽश्विभ्यां मानुषं लोकमागतः । लब्ध्वा चतुर्विधं हेतुं समाविशति मानवान् ॥ १२ ॥ यक्ष्मा की उत्पत्ति का उपाख्यान—देवताओं के कहते हुए ऋषियो ने चन्द्रमा के काम व्यसन से सम्बन्धित पुराण मे वर्णित कथा को इस प्रकार सुना है— भगवान् प्रजापति की अट्ठाईस कन्याओ का विवाह चन्द्रमा के साथ हुआ था । इन कन्याओ को भार्या रूप मे लेकर चन्द्रमा ने सबके साथ समानता का व्यवहार नही किया । शरीर पर ध्यान न रखते हुए उसने रोहिणी के साथ अति-आसक्ति का व्यवहार किया । इस आसक्ति से शरीर का स्नेह क्षीण होने के कारण चन्द्रमा का शरीर कृश हो गया । शेष स्त्रियो ने चन्द्रमा के इस अस- मान व्यवहार की बात दक्ष प्रजापति से कही । तब दक्ष प्रजापति के मुख से निःश्वास रूप मे मूर्त्तिमान् क्रोध उत्पन्न हुआ । भार्या रूप मे सबका ग्रहण करने पर समान व्यवहार न होने पर असमान व्यवहार करने वाला चन्द्रमा को गुरु ( प्रजापति ) ने शाप दिया । इसमे रजोगुण से युक्त निर्बल चन्द्रमा मे यक्ष्मा ने प्रवेश किया उसको यक्ष्मा हो गया१ । वह चन्द्रमा गुरु ( श्वशुर ) के अत्यन्त बलवान् क्रोध से तिरस्कृत होकर कान्तिरहित हो गया । तब देवा और देवर्षियो को साथ मे लेकर चन्द्रमा गुरु ( प्रजापति ) की शरण मे गया । इसके पश्चात् चन्द्रमा की बुद्धि शुद्ध हो गई जान कर गुरु प्रसन्न हो गये । इसके पीछे अश्विनी- १ (१) प्रजापति की अट्ठाईस कन्याये अट्ठाईस नक्षत्र ये है । (१) अश्विनी, (२) भरणी, (३) कृत्तिका, (४) रोहिणी, (५) मृगशिरा, (६) आर्द्रा, (७) पुनर्वसु, (८) पुष्या, (६) आश्लेषा, (१०) मघा, (११) पूर्वा फाल्गुनी, (१२) उत्तरा फाल्गुनी, (१३) हस्ता, (१४) चित्रा, (१५) स्वाति, (१६) विशाखा, (१७) अनुराधा, (१८) ज्येष्ठा, (१६) मूला, (२०) पूर्वाषाढा, (२१) उत्तराषाढ़ा, (२२) श्रवणा, (२३) धनिष्ठा, (२४) शतभिषा, (२५) पूर्वा भाद्रपदा, (२६) उत्तरा भाद्रपदा, (२७) रेवती और (२८) अभिजित् । (२) राजयक्ष्मा के लक्षण—स्नेह का परिक्षय, शरीर का कृश और निष्प्रभ (आज का ह्रास) होना, ये तीन लक्षण है जो कि सबसे प्रथम शरीर पर दिखाई देते है । क्षीण होते हुए चन्द्र मे ये तीनो लक्षण स्पष्ट होने से चन्द्र की कथा से ही राजयक्ष्मा को जोड दिया है । दिन रात्रि ये दो अश्वी है । वे ही क्षीण होते हुए चन्द्र के क्षय को दूर करके पुनः पुनः पूर्ण कर देते हैं । इस प्रकार यह अलकार से कथन है ।

अ० ८ ] २७ चिकित्सितस्थानम् ४१७

अ० ८ ] २७ चिकित्सितस्थानम् ४१७ कुमारो ने उसकी चिकित्सा की । इस प्रकार रोग से मुक्त चन्द्रमा विशेष रूप से शोभित होने लगा, उसका ओज बढने लगा और शुद्ध सत्त्व ( मन ) को प्राप्त हुआ । क्रोध, यक्ष्मा, ज्वर, रोग ये सब एक ही अर्थ को बतलाते है । यह रोग सबसे प्रथम नक्षत्रराज चन्द्रमा को हुआ, अतएव राजयक्ष्मा नाम से कहा जाता है। यह यक्ष्मा रोग अश्विनीकुमारो के हुकार से भयभीत होकर मनुष्य- लोक मे आगया । यह चार प्रकार के कारणो का प्राप्त करके मनुष्यो मे प्रवेश कर जाता है ॥ ८-१२ ॥ अयथाबलमारम्भ वेगसन्धारणं क्षयम् । यक्ष्मणः कारणं विद्याच्चतुथं विषमाशनम् ॥ १३ ॥ यक्ष्मा के चार कारण—( १ ) अपने बल वा शक्ति से अधिक कार्य करना, ( २ ) वेगो का रोकना, ( ३ ) धातुक्षय और ( ४ ) विषम भोजन, राजयक्ष्मा के ये चार कारण है ॥ १३ ॥ युद्धाध्ययनभाराध्वलङ्घनलवनादिभिः । पतनैरभिघातैर्वा साहसर्वा तथाऽपरः ॥ १४ ॥ अयथाबलमारम्भेर्जन्तोरुरसि विक्षते । वायुः प्रकुपितो दोषावुदीर्योभौ विधावति ॥ १५ ॥ स शिरःस्थः शिरःशूल करोति गलमाश्रितः । कण्ठोद्ध्वंस च कास च स्वरभेदमरोचकम् ॥ १६ ॥ पार्श्वशूलं च पार्श्वस्थो वर्चोभेदं गुदे स्थितः । जम्भा ज्वरं च सन्धिस्थ उरस्थश्चोरसो रुजम् ॥ १७॥ क्षोभनाच्चोरसो रक्तं कासमानः कफानुगम् । जर्जरेणोरसा कृच्छ्रमुरःशूली निरस्यति ॥ १८ ॥ इति साहसिको यक्ष्मा रूपैरेतैः प्रपद्यते । एकादशभिरात्मज्ञः सेवेतातो१ न साहसम् ॥ १९ ॥ ( १ ) शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न क्षय—खूब युद्ध करना, खूब अध्ययन ( पढना ), बहुत भार उठाना, बहुत मार्ग चलना, बहुत लङ्घन, बहुत लवन ( कूदना ), गिरना, चोट लगना, साहस तथा शक्ति से बाहर के अन्यान्य कार्य करने पर पुरुष की छाती मे क्षत हो जाता है। तब प्रकुपित वायु-पित्त और कफ दोनो दोषो को उदीर्ण करके इधर-उधर भागता है। शिर मे पहुच कर शिरःशूल उत्पन्न करता है, गले मे आश्रित होकर कण्ठोद्ध्वंस, १. 'भजेत्तस्मात्' इति वा पाठः ।

४१८ चरकसंहिता [ अ० ८ कास, स्वरभेद और अरुचि उत्पन्न करता है। पार्श्व मे स्थित पार्श्वशूल को गुदा मे स्थित होकर अतीसार को, सन्धियों मे स्थित वायु जम्भाई और ज्वर को, उरः मे स्थित वायु छाती मे दर्द को उत्पन्न करता है। उरः (फेफड़ों) मे छत होने से रोगी के खांसते समय कफ से मिला रक्त बाहर आता है। छाती के जर्जरित होने से कष्ट के साथ कफ निकलता है। साहसिक यक्ष्मा इन कारणो से उत्पन्न होता है, यह यक्ष्मा ग्यारह लक्षणो सहित होता है। इसलिये अपने सामर्थ्य को जानने वाला पुरुष कभी साहस नही करे ॥ १४-१६ ॥ ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् । वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः ॥ २० ॥ तदा वेगप्रतीघातात्कफपित्ते समीरयन् । ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव १ विकारान्कुरुतेऽनिलः ॥ २१ ॥ प्रतिश्यायं च कासं च स्वरभेदमरोचकम् । पार्श्वशूलं शिरःशूलं ज्वरमंसावमर्दनम् ॥ २२ ॥ अङ्गमर्दं मुहुश्छर्दि वर्चोभेदं त्रिलक्षणम् । रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मा यैरुच्यते महान् ॥ २३ ॥ (२) वेग-सन्धारण से उत्पन्न यक्ष्मा—लज्जा से, घृणा से वा भय के कारण जब मनुष्य वायु, मूत्र तथा मल के उपस्थित वेगो को रोकता है, तब वेगों के रुक जाने से प्रकुपित वायु कफ और पित्त को ऊपर, नीचे, तिरछे तीनों गतियों मे प्रेरित करके अनेक विकारो को उत्पन्न करता है। तब प्रतिश्याय, कास, स्वरभेद, अरोचक, पार्श्वशूल, शिरःशूल, ज्वर, कधो मे पीड़ा, अंगमर्द बार बार वमन, अतीसार ये नाना विकार तीनो लक्षणो से उत्पन्न होते हैं। राजयक्ष्मा के ये ग्यारह रूप है, जिनको देख कर राजयक्ष्मा महान् रोग कहा जाता है ॥ २०-२३ ॥ हर्षोत्कण्ठाभयत्रासक्रोधशोकातिकर्शनात् । व्यवायान्शनाभ्या च शुक्रमोजश्च हीयते ॥ २४ ॥ ततः स्नेहक्षयाद्वायुर्वृद्धो दोषानुदीरयन् ॥ प्रतिश्यायं ज्वरं कासमङ्गमर्दं शिरोरुजम् ॥ २५ ॥ श्वासं विड्भेदमरुचि पार्श्वशूलं स्वरक्षयम् । करोति चांससन्तापमेकादशमिमान् गदान् ॥ २६ ॥ १ 'तिर्यगधः कुर्याद्' इति च

४२० चरकसंहिता [ अ० ८ स्त्रीमद्यमांसप्रियता प्रियता चावगुण्ठने ॥ ३४ ॥ मक्षिकाघुणकेशानां तृणानां पतनानि च । प्रायोऽन्नपाने, केशानां नखानां चाभिवर्धनम् ॥ ३५ ॥ पतत्रिभिः पतङ्गैश्च श्वापदैश्चाभिधर्षणम् । स्वप्ने केशास्थिराशीनां भस्मनश्चाधिरोहणम् ॥ ३६ ॥ जलाशयानां शैलानां वनानां ज्योतिषामपि । शुष्यतां क्षीयमाणानां पततां यच्च दर्शनम् ॥ ३७ ॥ प्राग्रूपं बहुरूपस्य तज्ज्ञेयं राजयक्ष्मणः । राजयक्ष्मा का पूर्वरूप—प्रतिश्याय (जुकाम), दुर्बलता, दोषरहित पदाथो मे भी दोष का दीखना, शरीर मे बीभत्सता दीखना, घृणा होना, खाते हुए भी बल और मास का क्षीण होना, स्त्री-प्रियता (मैथुन की चाह), मद्यप्रियता, मासप्रियता, शर्मीलापन (लोगो से मिलने मे संकोच), खान पान मे मक्खियो, घुण, केश, तिनकों का गिरना, केश और नखो का जल्दी जल्दी बढ़ना,स्वप्न मे पक्षियो तथा व्याघ्र आदि हिंसक पशुओ से पराजित होना, बालो, अस्थिया ओर राख के ढेर पर चढ़ना, तालाबो का सूखते हुए, पर्वतो को तथा वनो को क्षीण होते हुए ओर ताराओ को गिरते हुए देखना, यह बहुत रूप वाले यक्ष्मा के पूर्वरूप है ॥ ३३-३७ ॥ रूपं तस्य यथोद्देशं परं शृणु सभेषजम् ॥ ३८ ॥ यथा स्वेनोष्मणा पाकं शारीरा यान्ति धातवः । स्रोतसा च यथास्वेन धातुः पुष्यति धातुना ॥ ३९ ॥ स्रोतसां संनिरोधाच्च रक्तादीनां च संक्षयात् । धातूष्मणां चापचयाद्राजयक्ष्मा प्रवर्तते ॥ ४० ॥ तस्मिन्काले पचत्यग्निर्यदन्नं कोष्ठमाश्रितम् । मलीभवति तत्प्रायः कल्पते किंचिदोजसे ॥ ४१ ॥ तस्मात्पुरीषं संरक्ष्यं विशेषाद्राजयक्ष्मिणः । सर्वधातुक्षयार्तस्य बल तस्य हि विड्बलम् ॥ ४२ ॥ रसः स्रोतःसु रुद्धेषु स्वस्थानस्थो विवर्धते । स ऊर्ध्वं कासवेगेन बहुरूपः प्रवर्तते ॥ ४३ ॥ जायन्ते व्याधयश्चातः षडेकादश वा पुनः । येषां सङ्घातयोगेन राजयक्ष्मेति कल्प्यते ॥ ४४ ॥ अब यक्ष्मा के रूप और औषध सुनो—शरीर मे अपनी गरमी से धातुओ का पाक ( पोषण ) होता है। धातु अपने अपने स्रोतो द्वारा जाकर धातु का

अ० ८ ] चिकित्तिसस्थानम् ४२१

अ० ८ ] चिकित्तिसस्थानम् ४२१ पोषण करता है, रस से रक्त का और रक्त से मास का पोषण होता है। स्रोतों के रुक जाने से, रक्त आदि धातुओं के क्षीण होने से और धातुओ की उष्णिमा के घट जाने से राजयक्ष्मा रोग उत्पन्न हो जाता है। इस अवस्था मे कोष्ठाग्नि आमाशय मे जिस अन्न का परिपाक करती है, उसका अधिक भाग मल बन जाता है। कुछ थोडा सा भाग ही ओज मे परिणत होता है। इसलिये राज- यक्ष्मा के रोगी मे मल की रक्षा करनी चाहिये। क्योकि मल के सिवाय अन्य सब धातु इसमे क्षीण हो जाते है अतः यक्ष्मा रोगी का बल ( शक्ति ) मल ही है¹ । अतः रोगी को अतिसार से बचाना चाहिये। स्रोतो के रुक जाने पर अपने स्थान मे ही रस का सचय अर्थात् वृद्धि होने लगती है, यह रस खासी के वेग के कारण ( आमाशय से ) ऊपर की ओर मुख नाक से अनेक रूपो मे प्रवृत्त होता है। इसके पश्चात् छ. या ग्यारह रोग ( लक्षण यक्ष्मा के ) हो जाते है, जिनके एकत्र समूह को राजयक्ष्मा के नाम से कहते है ॥ ४०-४४ ॥ यक्ष्मा के लक्षण— कासोऽसतापो वैस्वर्य ज्वरः पार्श्वशिरोरुजौ । शोणितश्लेष्मणोश्छर्दिः श्वासः कोष्ठामयोऽरुचिः ॥ ४५ ॥ रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मणः षडिमानि वा । यक्ष्मा के ग्यारह रूप—कास, कन्धो मे ताप, ( पीडा ) स्वरभेद, ज्वर, पार्श्वशूल, शिरोवेदना, रक्तवमन, कफ का आना, श्वास, कोष्ठामय (अतिसार), अरुचि, ये यक्ष्मा के ग्यारह रूप है ॥ ४५-॥ कासो ज्वरः पार्श्वशूल स्वरवचोंगदोऽरुचिः ॥ ४६ ॥ छः रूप—कास, ज्वर, पार्श्वशूल, स्वरभेद, मलभेद और अरुचि ॥ ४६ ॥ सर्वैरधैस्त्रिभिर्वाऽपि लिङ्गैर्मासबलक्षये । युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा ॥ ४७ ॥ १ आहार रस के जीर्ण होते समय पाचकाग्नि से प्रसाद और मल दो भाग बनते है। प्रसाद भाग भी स्थूल और सूक्ष्म दो भागो मे बट जाता है। सूक्ष्म भाग उसी धातु का पोषण करता है, और स्थूल भाग आगे पहुच जाता है, वहा पर अग्रिम धातु की गरमी से तीन भाग बनते है। इस प्रकार होते समय मज्जा से दो ही भाग बनते है, उसमे मलभाग नही होता। यक्ष्मा के रोगी मे मल भाग अधिक बनता है, प्रसाद भाग कम बनता है। ऐसा यत्न करना चाहिये कि शरीर इस मल मे से भी अधिक से अधिक प्रसाद-अश को ले सके, अतः मल की रक्षा करने को कहा है।

४२२ चरकसंहिता [ अ० ८

बल और मास के क्षीण होने पर इन ग्यारह या छः अथवा तीन (ज्वर, कास, रक्तवमन) लक्षणों से युक्त यदि रोगी हो तो उसको असाध्य समझे। परन्तु यदि रोगी का बल और मास क्षीण न हुआ हो और उसको ग्यारह लक्षण भी हो तो भी उसको साध्य समझे ॥ ४७ ॥ घ्राणमूले स्थितः श्लेष्मा रुधिरं पित्तमेव वा । मारुताध्मातशिरसो मारुतः श्यायते प्रति ॥ ४८ ॥ प्रतिश्यायस्ततो घोरो जायते देहकर्षणः । तस्य रूपं शिरःशूलं गौरवं घ्राणविप्लवः ॥ ४९ ॥ ज्वरः कासः कफोत्क्लेशः स्वरभेदोऽरुचिः क्लमः । इन्द्रियाणामसामर्थ्यं यक्ष्मा चातः प्रवर्त्तते ॥ ५० ॥ पिच्छिलं बहलं विस्रं हरितं श्वेतपीतकम् । कासमानो रसं यक्ष्मी निष्ठीवति कफानुगम् ॥ ५१ ॥ (१) वायु से पूर्ण शिर वाले रोगी के नासिका-मूल मे स्थित कफ, रक्त या पित्त जिस समय वायु के प्रति गमन करते है, तब शरीर को कम करने वाला भयानक प्रतिश्याय (जुकाम) उत्पन्न होता है। शिरमे दर्द, भारीपन, नासिका से स्राव बहना, ज्वर, कास, कफ का उत्क्लेश, स्वरभेद, अरुचि, क्लम, इन्द्रियो का अपने विषय मे प्रवृत्त न होना, ये प्रतिश्याय के पूर्वरूप है। पीछे से प्रति- श्याय यक्ष्मा मे बदल जाता है। यक्ष्मा रोगी खाँसते समय कफ से मिश्रित चिकना, घना, दुर्गन्धयुक्त, हरा, श्वेत, पीला रस (थूक) थूकता है ॥४८-५१॥ अंसपार्श्वाभितापश्च तापः पादकरस्य च । ज्वरः सर्वाङ्गगश्चेति लक्षणं राजयक्ष्मणः ॥ ५२ ॥ राजयक्ष्मा का लक्षण—अंस और पाश्र्वो का अभिताप (पीडा), हाथ और पैरो मे दाह, जलन, सर्वशरीरगत ज्वर यह राजयक्ष्मा के लक्षण है ॥५२॥ वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात्कासवेगात्सपीनसात् । स्वरभेदो भवेद्वाताद्रूक्षः क्षामश्चलः स्वरः ॥ ५३ ॥ तालुकण्ठपरीदाहः १ पित्ताद्वक्तुमसूयते । कफान्मन्दी विबद्धश्च स्वरः खुरखुरायते ॥ ५४ ॥ सन्नो रक्तविबन्धत्वात्स्वरः कृच्छ्रात्प्रवर्त्तते । कासातिवेगात्करुणः पीनसात्कफवातिकः ॥ ५५ ॥ (२) स्वरभेद—वायु से, पित्त से, कास से, पीनस से, स्वरभेद होता है।


१ 'परिक्षोषः' इति च ।

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२३

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२३ इनमें वात से उत्पन्न स्वरभेद मे— स्वर रूक्ष, निर्बल और कम्पित होता है, पित्त के कारण—तालु और कण्ठ मे दाह होता है, रोगी बोलना पसन्द नहीं करता, उसे बोलने मे कष्ट होता है । कफ के कारण—स्वर मन्द ( धीमा ), बधा ( रुका ) हुआ, खुरखुर करता है, रक्त से उत्पन्न मे—रक्त का विबन्ध होने से स्वर बैठा हुआ और बहुत कष्ट से प्रवृत्त होता है, खाँसी के अतिवेग के कारण स्वरभेद मे स्वरयन्त्र खराब हो जाता है, पीनस (प्रतिश्याय) से उत्पन्न स्वरभेद के लक्षण कफजन्य, वातजन्य प्रतिश्याय के समान होते है ॥५३-५५॥ पार्श्वशूलं त्वनियतं संकोचायामलक्षणम् । ( ३ ) पार्श्वशूल—सकोच तथा विस्तार निश्चित नही है, यह लक्षण (पार्श्व- शूल ) भी अवश्यम्भावी नही है, पार्श्वशूल कभी सक्रोच मे होता है, और कभी आयाम अवस्था मे होता है । पार्श्वशूल—यक्ष्मा मे कभी ता फेफड़ो के सकुचित अवस्था मे होता है, और कभी फेफडो के फूलने की अवस्था मे होता है, निमो- निया की तरह एक अवस्था मे निश्चित नही रहता । शिरःशूलं ससंतापं यक्ष्मणः स्यात्सगौरवम् ॥ ५६ ॥ ( ४ ) यक्ष्मा के रोगी को शिर मे शूल, सन्ताप ( दाह ) और भारीपन प्रतीत होता है ॥ ५६ ॥ अतिखिन्ने शरीरे तु यक्ष्मिणो विषमाशनात् । कण्ठात्प्रवर्तते रक्त श्लेष्मा चोत्क्लिष्टसंचितः ॥ ५७ ॥ रक्तं विबद्धमार्गत्वान्मासादीन्नानुपद्यते । आमाशयस्थमुत्क्लिष्टं बहुत्वात्कण्ठमेति वा ॥ ५८ ॥ ( ५ ) शरीर के आते शिथिल या दुर्बल होने के कारण, विषम भोजन करने पर, रागी के कण्ठ द्वारा उत्क्लेश से सञ्चित रक्त और कफ की प्रवृत्ति होती है । मार्गों के रुके होने से रक्त मास आदि धातुओ मे वह पहुँचता ( वह फुस्फुसो मे सञ्चित हो जाता ) है, अथवा आमाशय मे सञ्चित होने (बढ़ने) पर उत्क्लेश के कारण कण्ठ की ओर आ जाता है। रक्त का वमन होता है ॥५७-५८॥ वातश्लेष्मविबन्धत्वादुरसः श्वासमृच्छति । दोषैरुपहते चाग्नौ सपिच्छमतिसार्यते ॥ ५६ ॥ ( ६ ) छाती के वायु और कफ से भरे हाने पर श्वास (श्वास मे कठिनता) रोग उत्पन्न होता है । वातादि दोषों द्वारा अग्नि के मन्द हो जाने से पिच्छा- युक्त अतिसार होता है ॥ ५६ ॥ पृथग्दोषैः समस्तैर्वा जिह्वाहृदयसंश्रितैः । जायतेऽरुचिराहारैस्तुष्टेरर्थैश्च मानसैः ॥ ६० ॥

४२४ चरकसंहिता [ अ० ८ कषायतिक्तमधुरैर्विद्यान्मुखरसैः क्रमात् । वाताद्यैरुचि जाता मानसी दोषदर्शनात् ॥ ६१ ॥ अरोचकात्कासवेगाद्दोपोत्क्लेशाद्भयादपि । छर्दिर्या सा विकाराणामन्येषामप्युपद्रवः ॥ ६२ ॥ सर्वस्त्रिदोषजो यक्ष्मा दोषाणां तु बलाबलम् । परीक्ष्यावस्थितं वैद्यः शोषिणं समुपाचरेत् ॥ ६३ ॥ ( ७ ) जिहा और हृदय मे आश्रित वात, पित्त, कफ, पृथक् पृथक् अथवा समस्त दोषो से या मानसिक विषय ( काम, शोक, क्रोध ) के दूषित होने से आहार मे अरुचि हो जाती है । मुख मे कषाय रस होने पर वातजन्य, तिक्त- रस होने पर पित्तजन्य, मधुररस होने पर कफजन्य अरुचि को समझना चाहिये । मन के अप्रिय ( द्विष्ट ) वस्तु के दर्शन मे मानसी अरुचि उत्पन्न होती है । अरुचि, कास का वेग, दोष का उत्क्लेश और भय इन अनेक कारणों मे जो वमन होता है, वह अन्य विकारो मे भी उपद्रव रूप होता है । सब यक्ष्मा त्रिदोषजन्य है । इसलिये वैद्य को चाहिये कि रोगी की अवस्थानुसार दोषो के बलाबल को देखकर चिकित्सा करे ॥ ६०-६३ ॥ प्रतिश्याये शिरःशूले कासे श्वासे स्वरक्षये । पार्श्वशूले च विविधाः क्रियाः साधारणीः शृणु ॥ ६४ ॥ पीनसे स्वेदमभ्यङ्ग धूप्तमालेपनानि च । परिषेकावगाहांश्च यावकं वाट्यमेव च ॥ ६५ ॥ लवणाम्लकटूष्णांश्च रसांस्तेनोपबृंहितान् १ । लावतित्तिरिदक्षाणा वर्तकाना च कल्पयेत् ॥ ६६ ॥ सपिप्पलीकं सयवं सकुळत्थं सनागरम् । दाडिमामलकोपेतं स्निग्धमाजं रस पिबेत् ॥ ६७ ॥ तेन षड् विनिवर्तन्ते विकाराः पीनसादयः । मूलकानां कुलत्थाना यूषैर्वा सूपकल्पितैः ॥ ६८ ॥ यवगोधूमशाल्यन्नैर्यथासात्म्यमुपाचरेत् । पिबेत्प्रसादं वारुण्या जलं वा पाञ्चमूलिकम् ॥ ६९ ॥ धान्यनागरसिद्धं वा तामलक्याऽथवा शृतम् । पर्णिनीभिश्चतसृभिस्तेन चान्नानि कल्पयेत् ॥ ७० ॥ १ 'स्नेहोपसंहितान्' इति च ।

की साधारण ( सशमनी ) चिकित्साए सुनो।

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२५ प्रतिश्याय, शिरःशूल, कास, श्वास, स्वरभग और पार्श्वशूल मे नाना प्रकार की साधारण ( सशमनी ) चिकित्साए सुनो। (१) प्रतिश्याय मे—स्वेद, अभ्यग, धूप, आलेपन, परिषेक, अवगाहन, यावक ( यवान्न ), वाव्य ( यवमण्ड, जौ का दलिया ) इनका प्रयोग करे । (२) लाव, तीतर, मुर्गा और बटेर, इनके मासो से लवण, अम्ल कटु रसयुक्त उष्ण और घी आदि से युक्त मास रसो की कल्पना करे। (३) पिप्पली, जौ, कुलथी, सोठ, अनारदाना ( अनार का रस ) आवला इनके द्वारा साबित घी आदि से स्निग्ध बनाकर बकरी के मास का प्रयोग करे । इसके प्रयोग से प्रतिश्याय आदि छ विकार शान्त होते है। (४) मूली वा कुलथी से यथाविधि यूष सिद्ध करके अथवा जौ, गेहूँ, शालि के अन्न के सात्म्य के अनुसार रोगी को देवे । (५) वारुणी मद्य के ऊपर का स्वच्छ भाग अथवा विदारीगन्ध आदि पञ्चमूल से सिद्ध जल या धनिया ओर सोठ से साधित जल, अथवा तामलकी (भुई आवला) से सिद्ध जल, या चारो पर्णिनियो (मुद्गपर्णी, माषपर्णी शालपर्णी और पृश्निपर्णी) से सिद्ध जल पीने के लिये देवे । इनसे ही साधित जल मे या इनमे सस्कृत भक्ष्य बनाकर देवे ॥६४ ७०॥ कृशरोत्कारिकामाषकुलत्थयवपायसैः । संकरस्वेदविधिना कण्ठं पार्श्वमुरः शिरः ॥ ७१ ॥ स्वेदयेत्पत्रभङ्गेण शिरश्च परिषेचयेत् । बलागुडूचीमधुकश्रुतैर्वा वारिभिः सुखैः ॥ ७२ ॥ बस्तमत्स्यशिरोभिर्वा नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् । कण्ठे शिरसि पार्श्वे च पयोभिर्वा सवातकैः ॥ ७३ ॥ औदकानूपमांसानि सलिलं पाञ्चमूलिकम् । सस्नेहमारनालं वा नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ७४ ॥ जीवन्त्याः शतपुष्पाया बलाया मधुकस्य च । वचाया वेशवारस्य विदार्या मूलकस्य च ॥ ७५ ॥ औदकानूपमासानामुपनाहाश्च संस्कृताः । शस्यन्ते च चतुःस्नेहा शिरःपार्श्वांसशूलिनाम् ॥ ७६ ॥ शतपुष्पा समधुक कुष्ठ तगरचन्दने । आलेपनं स्यात्सघृत शिरःपार्श्वांसशूलनुत् ॥ ७७ ॥ स्वेदन—(१) कृशरा (तिल, चावल, उडद की यवागू), उत्कारिका (रोटी के समान बना खाद्य द्रव्य जौ आदि का ), उड़द, कुलथी, जौ, पायस

४२६ चरकसंहिता [ अ० ८ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ( खीर अथवा मावे के रूप मे ) द्वारा सकर-स्वेद की विधि से, पार्श्व, कण्ठ, छाती और शिर पर स्वेद दे । ( २ ) वातहर पत्तो से अथवा खरैटी, गिलोय, मुलहठी, इनसे साधित सुहाते गरम क्वाथ से शिर का परिषेचन करे । (३) बकरे वा मछली के सिर के क्वाथो से नाडीस्वेद द्वारा अथवा वातनाशक द्रव्यो से साधित क्वाथो से नाडी स्वेद विधि द्वारा कण्ठ सिर और पार्श्वों मे स्वेदन करे । [ वातहर औषधिया—बिल्व, अग्निमन्य, काश्मर्य, श्रेयसी, पाटला, बला, शाल- पर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारिका, एरण्ड और मूलक । ] ( ४ ) औदक या आनूप पशु-पक्षियो के मास से अथवा पचमूल क्वाथ से या काजी मे घी, तैल, वसा आदि स्नेह मिलाकर नाड़ीस्वेद दे । ( ५ ) जिनके सिर, पार्श्व और कन्धी मे शूल होता हो उनके लिये १—जीवन्ती, सोया, बला, मुलहठी २—वचा, वेशवार, विदारी, मूली, ३—औदक मास, ४—आनूप मास इनसे पृथक् २ सस्कृत उपनाह लगावे । [ अस्थि से रहित पिसा मास सिजाकर काली मरिच मिलाकर तैयार किया 'वेशवार' कहाता है । ] ( ६ ) शिर, पार्श्व और कन्धी के शूल मे–सोया, मुलहठी, कूठ, तगर, चन्दन इनको घी मे मिला कर लेप करे ॥ ७१-७७ ॥ बला रास्ना तिलाः सर्पिर्मधुकं नीलमुत्पलम् । पलङ्कषा देवदारु चन्दनं केशरं घृतम् ॥ ७८ ॥ वीरा बला विदारी च कृष्णगन्धा पुनर्नवा । शतावरी पयस्या च कत्तृणं मधुकं घृतम् ॥ ७९ ॥ चत्वार एते श्लोकार्थैः प्रदेहाः परिकीर्तिताः । ( ७ ) प्रदेह—१—जिन यक्ष्मा के रोगियो मे द्वन्द्व दोष के कारण शिर, स्कन्ध और पार्श्व मे वेदना होती हो, उनके लिये आधे २ श्लोक मे समाप्त होने वाले निम्न लिखित प्रदेहो का लेप करना चाहिये । यथा—१—खरैटी, रास्ना, तिल, घी, मुलहठी, नीलाकमल, २–गुग्गुल, देवदारु, चन्दन, केशर ( अथवा नागकेसर ) और घी, ३–क्षीरकाकोली, बला, विदारी, लाल सहजन, पुनर्नवा, ४–शतावरी, क्षीरकाकोली ( अथवा विदारीकन्द ), कत्तृण, मुलहठी और घी इनका लेप करे ॥ ७८–७९ ॥ शस्ताः संसृष्टदोषाणा शिरःपार्श्वांसशूलिनाम् ॥ ८० ॥ नावनं धूमपानानि स्नेहाश्चोत्तरभक्तिकाः । तैलान्यभ्यङ्गयोगानि बस्तिकर्म तथा परम् ॥ ८१ ॥ जलौकालाबुशृङ्गैर्वा प्रदुष्टं व्यधनेन वा । शिरःपार्श्वांसशूलेषु रुधिरं तस्य निर्हरेत् ॥ ८२ ॥

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२७

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२७ (१८) सिर, पार्श्व और स्कन्ध मे शूल होने पर-नस्य, धूमपान, भोजन के पश्चात् स्नेहपान, अभ्यग के लिये तैल और बस्तिकर्म करे । पित्त से दूषित रक्त को जलौका, कफ से दूषित को अलाबु, वात से दूषित को शृङ्ग द्वारा, अथवा अति दूषित व्यापक रूप मे रक्त को शिरावेध से निकाले ॥ ८०-८२ ॥ प्रदेहः सघृतश्चेष्टः पद्माकोशीरचन्दनैः । दूर्वामधुकमञ्जिष्ठाकेशरैर्वा घृताप्लुतैः ॥ ८३ ॥ प्रपौण्डरीकनिर्गुण्डीपद्मकेशरमुत्पलम् । कशेरुकाः पयस्या च ससर्पिष्क प्रलेपनम् ॥ ८४ ॥ (६) पद्माख, खस, चन्दन इनको घी मे मिलाकर अथवा दूब, मुलहठी, मजीठ और नागकेशर इनको घी मे मिला कर प्रलेप करे । (१०) पुण्डरीक काष्ठ, सम्भालु, पद्म ( कमल ), नागकेसर ( अथवा कमल-केसर ), नीलोत्पल, कशेरु, क्षीरकाकोली इन्हे पीस कर घी के साथ मिलाकर लेप करे ॥ ८३-८४ ॥ चन्दनाद्येन तैलेन शतधौतेन सर्पिषा । अभ्यङ्गः पयसा सेकः शस्तश्च मधुकाम्बुना ॥ ८५ ॥ माहेन्द्रेण सुशीतेन चन्दनादिशृतेन वा । परिषेकः प्रयोक्तव्य इति सशमनी क्रिया ॥ ८६ ॥ इति संशमनी क्रिया । (११) चन्दनाद्य तैल, अथवा शतधौत घृत का अभ्यग उत्तम है । दूध या मुलहठी के क्वाथ का परिषेचन हितकारी है । (१२) सुशीतल वर्षोजल से अथवा चन्दनादि गण ( चन्दनाद्य तैलोक्त ) के क्वाथ से परिषेचन करे । यह सशमन चिकित्सा का उपदेश कर दिया ॥ ८५-८६ ॥ दोषाधिकानां वमनं शस्यते सविरेचनम् । स्नेहस्वेदोपपन्नाना सस्नेहं यन्न कर्षणम् ॥ ८७ ॥ (१३) यक्ष्मा के जिन रोगियो मे दोष की अधिकता हो उनको प्रथम स्ने- हन और स्वेदन कराके पीछे से स्नेहयुक्त वमन और स्नेहयुक्त विरेचन देवे । परन्तु ये वमन-विरेचन ऐसे होने चाहिये जिनसे रोगी का शरीर कृश या निर्बल न हो जाय ॥ ८७ ॥ शोषी मुञ्चति गात्राणि पुरीषस्रंसनादपि । अबलापेक्षिणीं मात्रा कि पुनर्यो विरिच्यते ॥ ८८ ॥ यक्ष्मा रोगी मल के स्रसन ( छूटकर लगने ) मात्र से मर जाता है । इस- लिये रोगी के बल की अपेक्षा न करके दी गई विरेचन की मात्रा का क्या

४२८ चरकसंहिता [ अ० ८ कहना ? उससे तो मर ही जायेगा । इसलिये बहुत ही विचार कर अमलतास, निशोथ आदि का मृदु विरेचक उपयोग करे ॥ ८८ ॥ योगान्संशुद्धकोष्ठस्य कासे श्वासे स्वरक्षये । शिरःपार्श्वांसशूलेषु सिद्धान्नेतान्प्रयोजयेत् ॥ ८९ ॥ बलाविदारिगन्धाद्यैर्विदार्या मधुकेन वा । सिद्धं सलवणं सर्पिर्नस्य स्यात्स्वर्यमुत्तमम् ॥ ९० ॥ प्रपौण्डरीकं मधुकं पिप्पली बृहती बला । क्षीरं सर्पिश्च तत्सिद्धं स्वर्यं स्यान्नावनं परम् ॥ ९१ ॥ शिरः पार्श्वान्सशूलघ्नं कासश्वासनिवर्हणम् । प्रयुज्यमानं बहुशो घृतमौत्तरभक्तिकम् ॥ ९२ ॥ जब कोष्ठ शुद्ध हो जाये तो कास, श्वास, स्वरक्षय मे, शिर शूल, पार्श्वशूल और असशूल मे निम्न लिखित सिद्ध योगो का प्रयोग करे । (१) बला, विदारीगन्धादिगण (स्वल्प पञ्चमूल), अथवा विदारीकन्द और मुलहठी इनके क्वाथ मे तथा सैन्धव नमक के कल्क से सिद्ध घृत का नस्य देने से स्वरभग मिटता है १ (२) पुण्डरीक काष्ठ, मुलहठी, पिप्पली, खरैटी और गाय का दूध इनसे साधित घृत का नस्य स्वरभेद को नष्ट करता है । (३) शिरःशूल, पार्श्वशूल और असशूल, कास और श्वास को नष्ट करने के लिये भोजन के पश्चात् प्राय घृतपान करे ॥ ८९-९२ ॥ दशमूलेन पयसा सिद्धं मांसरसेन च । बलागर्भ घृत सद्यो रोगानेतान्प्रबाधते ॥ ९३ ॥ (४) दशमूलाद्य घृत—दशमूल क्वाथ ८ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, मासरस २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, बला का कल्क १ शराव, इनसे यथाविधि सिद्ध किया हुआ घी शिरःशूल आदि रोगो को नष्ट करता है ॥ ९३ ॥ भक्तस्योपरि मध्ये वा यथाग्नि प्रविचारितम् । रास्नाघृतं वा सक्षीरं सक्षीरं वा वलाघृतम् ॥ ९४ ॥ (५) भोजन के मध्य मे या भोजन के पश्चात् यक्ष्मा के रोगी की अग्नि १ श्री गगाधर सेन ने पाठ निम्न पढा है—'बलाविदारीगन्धाभ्या पिप्पल्या मधुकेन च ॥' अष्टाग-सग्रह मे पिप्पल्या के स्थान पर 'विदार्या' है । विदारी- गन्धा से शालपर्णी का ग्रहण होगा । इस प्रकार से दो योग मानकर बला, शालपर्णी, पिप्पली, मुलहठी और सैन्धानमक इनसे घृत सिद्ध करना चाहिये, ऐसा योग माना है ।

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२६

के बलानुसार, रास्ना घृत को दूध के साथ, अथवा बलाघृत को दूध के साथ मे
दे । [ रास्नाघृत आगे इसी अध्याय मे कहेगे और बलाघृत वातरक्त-चिकित्सा
मे कहा हे। यहा पर दोनो घृतो को चतुर्गुण दूध से रास्नाकल्क, या बला कल्क
द्वारा सिद्ध करे ] ॥ ६४ ॥
लेहान्कासापहान्स्वर्यान्श्वासहिक्कानिबर्हणान् ।
शिरःपार्श्वांसशूलघ्नान् स्नेहांश्चातः परं शृणु ॥ ६५ ॥
घृतं खर्जूरमृद्वीकाशर्कराद्राक्षेद्सुयुतम् ।
सपिप्पलीकं वैस्वर्यकासश्वासनिबर्हणम् ॥ ६६ ॥
दशमूलशृतात्क्षीरात्सद्येोदुद्धियाद्भृतम् ।
सपिप्पलीकं सक्षौद्रं तत्परं स्वरबोधनम् ॥ ६७ ॥
शिरःपार्श्वांसशूलघ्नं कासश्वासज्वरापहम् ।
इसके आगे कास, श्वास, शिरःशूल, पार्श्वशूल ओर स्कन्धशूल का नष्ट
करने वाले स्नेह और लेहा को सुनो ।
(१) खर्जूर, मुनक्का, मुलहठी, फालसा ओर पिप्पली इनके एक शराव
कल्क से ८ प्रस्थ जल मे २ प्रस्थ घृत यथाविधि पकावे । यह घृत स्वरभेद,
कास, श्वास को नष्ट करता है ।
(२) दशमूल से साधित दूध से निकाले हुए नूतन घी को पिप्पली ओर
मधु के साथ खाने से स्वरभेद, शिर शूल, पार्श्वशूल, असशूल, कास श्वास और
ज्वर नष्ट होता है। अथवा पाचो पचमूलो से साधित दूध से निकाले ताजे घी
को पिप्पली और मधु के साथ खाने से स्वरभेद आदि सातो विकार नष्ट
होते है ॥ ६५-६७ ॥
पञ्चभिः पञ्चमूलैर्वा शृताद् यदुदियाद् घृतम् ॥ ६८ ॥
पञ्चानां पञ्चमूलाना रसे क्षीरचतुर्गुणे ।
सिद्धं सापेजयेत्येतद्यक्ष्मणः सप्तकं बलम् ॥ ६६ ॥
(३) पञ्च-पञ्चमूल घृत—ब्राह्म-रसायन मे कहे पाचो पचमूलो का क्वाथ
८ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ यथाविधि पकावे । यह घृत यक्ष्मा के
स्वरभेद, शिर शूल, असशूल, पार्श्वशूल, कास, श्वास और ज्वर को नष्ट
करता है ॥ ६८-६६ ॥
खर्जूरं पिप्पली द्राक्षा पथ्या शृङ्गी दुरालभा ।
त्रिफला पिप्पली मुस्तं शृङ्गाटगुडशर्कराः ॥ १०० ॥
वीरा शटी पुष्कराह्व्यं सुरसः शर्करा गुडः ।

४३० चरकसंहिता [ अ० ८ नागरं चित्रको लाजाः पिप्पल्यामलकं गुडः ॥ १०१ ॥ श्लोकार्धविहितानेतोँल्लिह्यान्ना मधुसर्पिषा । कासश्वासापहान्स्वर्यान्पार्श्वशूलापहास्तथा ॥ १०२ ॥ ( ४ ) चार लेह—१—पिण्डखर्जूर, पिप्पली, मुनक्का, हरड़, काकड़ा- शृङ्गी और दुरालभा । २—त्रिफला, पिप्पली, मोथा, सिंघाड़ा, गुड और शर्करा । ३—क्षीरकाकोली, कचूर, पोहकरमूल, तुलसी, शर्करा, और गुड़ । ४—सोंठ, चीता, लाजा, पिप्पली, आँवला और गुड आधे आधे श्लोको मे कहे हुए इन चार योगो को मधु और घी के साथ चाटने से कास, श्वास, स्वर- भेद और पार्श्वशूल नष्ट होते है ॥ १००-१०२ ॥ सितोपला तुगाक्षीरी पिप्पली बहुलां त्वचम् । अन्त्यादूर्ध्वं द्विगुणितं लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ १०३ ॥ चूर्णितं प्राशयेद्वा तच्छ्वासकासकफातुरम् । सुप्तजिह्वारोचकिनमल्पाग्निं पार्श्वशूलिनम् ॥ १०४ ॥ हस्तपादाङ्गदाहेषु ज्वरे रक्ते तथोर्ध्वगे । ( ५ ) सितोपलादि लेह—मिसरी १६ भाग, बंशलोचन ८ भाग, पिप्पली ४ भाग, इलायची २ भाग और दालचीनी १ भाग इस प्रकार पीछे से पूर्व के द्रव्य को दुगुना लेकर मधु और घी मे चाटे । इसके प्रयोग से श्वास, कास और कफ नष्ट होता है । सुप्तजिह्वा ( जिसमे स्पर्श या मधुर आदि रसों का ज्ञान नही होता ), अरुचि, मन्दाग्नि, पार्श्वशूल, हाथ पाँव शरीर मे जलन, ज्वर और ऊर्ध्वगामी रक्त-पित्त मे लाभकारी है ॥ १०३-१०४- ॥ वाससर्पिः शतावर्या सिद्धं वा परमं हितम् ॥ १०५ ॥ ( ६ ) वासा घृत और शतावरी ( कल्क और कषाय ) से सिद्ध घृत अति- शय हितकारी है ॥ १०५ ॥ दुरालभा श्वदंष्ट्रां च चतस्रः पर्णिनीर्बलाम् । भागान्पलोन्मितान्कृत्वा पलं पर्पटकस्य च ॥ १०६ ॥ पचेद्दशगुणे तोये दशभागावशेषिते । रसे सुपूते द्रव्याणामेषां कल्कान्समावपेत् ॥ १०७ ॥ शट्याः पुष्करमूलस्य पिप्पलीत्रायमाणयोः । तामलक्याः किराताना तिक्तस्य कुटजस्य च ॥ १०८ ॥ फलाना शारिवायाश्च सुपिष्टान्नकर्षसंमितान् । ततस्तेन घृतप्रस्थं क्षीरद्विगुणितं पचेत् ॥ १०९ ॥

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३१

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३१ ज्वर दाह भ्रमं कासमसपार्थशिरोरुजम् । तृष्णां छर्दिमतीसारमेतत् सर्पिरपोहति ॥ ११० ॥ इति दुरालभादि घृतम् । ( ७ ) दुरालभादि घृत—दुरालभा, गोखरू, चारो पर्णिनियों ( मुद्गपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी ) खरैटी, पित्तपापडा प्रत्येक १-१ पल इनको दस गुने ( २० प्रस्थ ) पानी मे पकावे । जब दसवाँ भाग रह जाये तो छान ले । इसमे कचूर, पोहकरमूल, पिप्पली, त्रायमाणा, तामलकी (भुई आँवला), चिरायता, कुडे के फल ( इन्द्रजौ ) और सारिवा प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनका कल्क मिला दे, घी एक प्रस्थ और दूध घी से दुगुना ( २ प्रस्थ ) मिला कर यथाविधि घी सिद्ध करे । यह घी ज्वर, दाह, भ्रम, कास, कधो मे पीडा, पार्श्व- शूल, शिर-शूल, तृष्णा, वमन और अतिसार को नष्ट करता है ॥ १०६-११० ॥ जीवन्तीं मधुकं द्राक्षा फलानि कुटजस्य च । शटी पुष्करमूलं च व्याघ्री गोक्षुरकं बलाम् ॥ १११ ॥ नीलोत्पलं तामलकीं त्रायमाणा दुरालभाम् । पिप्पली च समं पिष्ट्वा घृतं वैद्यो विपाचयेत् ॥ ११२ ॥ एतद् व्याधिसमूहस्य रोगेशस्य समुत्थितम् । रूपमेकादशविधं सर्पिरग्र्य व्यपोहति ॥ ११३ ॥ इति जीवन्त्यादिघृतम् । ( ८ ) जीवन्त्यादि घृत—जीवन्ती, मुलहठी, मुनक्का, इन्द्रजौ, कचूर, पोह करमूल, कटेरी, गोखरू, बला, नीला कमल, भूई आँवला, त्रायमाणा, दुरालभा और पिप्पली ये सम परिमाण मे लेकर इनके कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत रोगसमूह रूप रोगराज ( यक्ष्मा ) के ग्यारह प्रकारों के रूप को नष्ट करता है । [ यहाँ पर पानी चार गुणा लेवे ] ॥ १११-११३ ॥ बलां स्थिरां पृश्निपर्णी बृहती सनिदिग्धिकाम् । साधयित्वा रसे तस्मिन्पयो गव्यं सनागरम् ॥ ११४ ॥ द्राक्षाखर्जूरसर्पिर्भिः पिप्पल्या च शृतं सह । सक्षौद्रं ज्वरकासघ्नं स्वर्य चैतत्प्रयोजयेत् ॥ ११५ ॥ ( ६ ) बलादि क्षीर—बला, स्थिरा ( शालपर्णी ), पृश्निपर्णी, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी इनको सम परिमाण मे लेकर आठ गुने जल मे क्वाथ करे । चतुर्थांश रहने पर छान ले । इसमे क्वाथ से चतुर्थांश गाय का दूध, दूध से अष्टमांश सोंठ, पिण्डखर्जूर, घी, पिप्पली मिलावे । इनसे सिद्ध दूध मे