भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

४२४ चरकसंहिता [ अ० ८ कषायतिक्तमधुरैर्विद्यान्मुखरसैः क्रमात् । वाताद्यैरुचि जाता मानसी दोषदर्शनात् ॥ ६१ ॥ अरोचकात्कासवेगाद्दोपोत्क्लेशाद्भयादपि । छर्दिर्या सा विकाराणामन्येषामप्युपद्रवः ॥ ६२ ॥ सर्वस्त्रिदोषजो यक्ष्मा दोषाणां तु बलाबलम् । परीक्ष्यावस्थितं वैद्यः शोषिणं समुपाचरेत् ॥ ६३ ॥ ( ७ ) जिहा और हृदय मे आश्रित वात, पित्त, कफ, पृथक् पृथक् अथवा समस्त दोषो से या मानसिक विषय ( काम, शोक, क्रोध ) के दूषित होने से आहार मे अरुचि हो जाती है । मुख मे कषाय रस होने पर वातजन्य, तिक्त- रस होने पर पित्तजन्य, मधुररस होने पर कफजन्य अरुचि को समझना चाहिये । मन के अप्रिय ( द्विष्ट ) वस्तु के दर्शन मे मानसी अरुचि उत्पन्न होती है । अरुचि, कास का वेग, दोष का उत्क्लेश और भय इन अनेक कारणों मे जो वमन होता है, वह अन्य विकारो मे भी उपद्रव रूप होता है । सब यक्ष्मा त्रिदोषजन्य है । इसलिये वैद्य को चाहिये कि रोगी की अवस्थानुसार दोषो के बलाबल को देखकर चिकित्सा करे ॥ ६०-६३ ॥ प्रतिश्याये शिरःशूले कासे श्वासे स्वरक्षये । पार्श्वशूले च विविधाः क्रियाः साधारणीः शृणु ॥ ६४ ॥ पीनसे स्वेदमभ्यङ्ग धूप्तमालेपनानि च । परिषेकावगाहांश्च यावकं वाट्यमेव च ॥ ६५ ॥ लवणाम्लकटूष्णांश्च रसांस्तेनोपबृंहितान् १ । लावतित्तिरिदक्षाणा वर्तकाना च कल्पयेत् ॥ ६६ ॥ सपिप्पलीकं सयवं सकुळत्थं सनागरम् । दाडिमामलकोपेतं स्निग्धमाजं रस पिबेत् ॥ ६७ ॥ तेन षड् विनिवर्तन्ते विकाराः पीनसादयः । मूलकानां कुलत्थाना यूषैर्वा सूपकल्पितैः ॥ ६८ ॥ यवगोधूमशाल्यन्नैर्यथासात्म्यमुपाचरेत् । पिबेत्प्रसादं वारुण्या जलं वा पाञ्चमूलिकम् ॥ ६९ ॥ धान्यनागरसिद्धं वा तामलक्याऽथवा शृतम् । पर्णिनीभिश्चतसृभिस्तेन चान्नानि कल्पयेत् ॥ ७० ॥ १ 'स्नेहोपसंहितान्' इति च ।