भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 413

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२६

के बलानुसार, रास्ना घृत को दूध के साथ, अथवा बलाघृत को दूध के साथ मे
दे । [ रास्नाघृत आगे इसी अध्याय मे कहेगे और बलाघृत वातरक्त-चिकित्सा
मे कहा हे। यहा पर दोनो घृतो को चतुर्गुण दूध से रास्नाकल्क, या बला कल्क
द्वारा सिद्ध करे ] ॥ ६४ ॥
लेहान्कासापहान्स्वर्यान्श्वासहिक्कानिबर्हणान् ।
शिरःपार्श्वांसशूलघ्नान् स्नेहांश्चातः परं शृणु ॥ ६५ ॥
घृतं खर्जूरमृद्वीकाशर्कराद्राक्षेद्सुयुतम् ।
सपिप्पलीकं वैस्वर्यकासश्वासनिबर्हणम् ॥ ६६ ॥
दशमूलशृतात्क्षीरात्सद्येोदुद्धियाद्भृतम् ।
सपिप्पलीकं सक्षौद्रं तत्परं स्वरबोधनम् ॥ ६७ ॥
शिरःपार्श्वांसशूलघ्नं कासश्वासज्वरापहम् ।
इसके आगे कास, श्वास, शिरःशूल, पार्श्वशूल ओर स्कन्धशूल का नष्ट
करने वाले स्नेह और लेहा को सुनो ।
(१) खर्जूर, मुनक्का, मुलहठी, फालसा ओर पिप्पली इनके एक शराव
कल्क से ८ प्रस्थ जल मे २ प्रस्थ घृत यथाविधि पकावे । यह घृत स्वरभेद,
कास, श्वास को नष्ट करता है ।
(२) दशमूल से साधित दूध से निकाले हुए नूतन घी को पिप्पली ओर
मधु के साथ खाने से स्वरभेद, शिर शूल, पार्श्वशूल, असशूल, कास श्वास और
ज्वर नष्ट होता है। अथवा पाचो पचमूलो से साधित दूध से निकाले ताजे घी
को पिप्पली और मधु के साथ खाने से स्वरभेद आदि सातो विकार नष्ट
होते है ॥ ६५-६७ ॥
पञ्चभिः पञ्चमूलैर्वा शृताद् यदुदियाद् घृतम् ॥ ६८ ॥
पञ्चानां पञ्चमूलाना रसे क्षीरचतुर्गुणे ।
सिद्धं सापेजयेत्येतद्यक्ष्मणः सप्तकं बलम् ॥ ६६ ॥
(३) पञ्च-पञ्चमूल घृत—ब्राह्म-रसायन मे कहे पाचो पचमूलो का क्वाथ
८ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ यथाविधि पकावे । यह घृत यक्ष्मा के
स्वरभेद, शिर शूल, असशूल, पार्श्वशूल, कास, श्वास और ज्वर को नष्ट
करता है ॥ ६८-६६ ॥
खर्जूरं पिप्पली द्राक्षा पथ्या शृङ्गी दुरालभा ।
त्रिफला पिप्पली मुस्तं शृङ्गाटगुडशर्कराः ॥ १०० ॥
वीरा शटी पुष्कराह्व्यं सुरसः शर्करा गुडः ।