भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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४२८ चरकसंहिता [ अ० ८ कहना ? उससे तो मर ही जायेगा । इसलिये बहुत ही विचार कर अमलतास, निशोथ आदि का मृदु विरेचक उपयोग करे ॥ ८८ ॥ योगान्संशुद्धकोष्ठस्य कासे श्वासे स्वरक्षये । शिरःपार्श्वांसशूलेषु सिद्धान्नेतान्प्रयोजयेत् ॥ ८९ ॥ बलाविदारिगन्धाद्यैर्विदार्या मधुकेन वा । सिद्धं सलवणं सर्पिर्नस्य स्यात्स्वर्यमुत्तमम् ॥ ९० ॥ प्रपौण्डरीकं मधुकं पिप्पली बृहती बला । क्षीरं सर्पिश्च तत्सिद्धं स्वर्यं स्यान्नावनं परम् ॥ ९१ ॥ शिरः पार्श्वान्सशूलघ्नं कासश्वासनिवर्हणम् । प्रयुज्यमानं बहुशो घृतमौत्तरभक्तिकम् ॥ ९२ ॥ जब कोष्ठ शुद्ध हो जाये तो कास, श्वास, स्वरक्षय मे, शिर शूल, पार्श्वशूल और असशूल मे निम्न लिखित सिद्ध योगो का प्रयोग करे । (१) बला, विदारीगन्धादिगण (स्वल्प पञ्चमूल), अथवा विदारीकन्द और मुलहठी इनके क्वाथ मे तथा सैन्धव नमक के कल्क से सिद्ध घृत का नस्य देने से स्वरभग मिटता है १ (२) पुण्डरीक काष्ठ, मुलहठी, पिप्पली, खरैटी और गाय का दूध इनसे साधित घृत का नस्य स्वरभेद को नष्ट करता है । (३) शिरःशूल, पार्श्वशूल और असशूल, कास और श्वास को नष्ट करने के लिये भोजन के पश्चात् प्राय घृतपान करे ॥ ८९-९२ ॥ दशमूलेन पयसा सिद्धं मांसरसेन च । बलागर्भ घृत सद्यो रोगानेतान्प्रबाधते ॥ ९३ ॥ (४) दशमूलाद्य घृत—दशमूल क्वाथ ८ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, मासरस २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, बला का कल्क १ शराव, इनसे यथाविधि सिद्ध किया हुआ घी शिरःशूल आदि रोगो को नष्ट करता है ॥ ९३ ॥ भक्तस्योपरि मध्ये वा यथाग्नि प्रविचारितम् । रास्नाघृतं वा सक्षीरं सक्षीरं वा वलाघृतम् ॥ ९४ ॥ (५) भोजन के मध्य मे या भोजन के पश्चात् यक्ष्मा के रोगी की अग्नि १ श्री गगाधर सेन ने पाठ निम्न पढा है—'बलाविदारीगन्धाभ्या पिप्पल्या मधुकेन च ॥' अष्टाग-सग्रह मे पिप्पल्या के स्थान पर 'विदार्या' है । विदारी- गन्धा से शालपर्णी का ग्रहण होगा । इस प्रकार से दो योग मानकर बला, शालपर्णी, पिप्पली, मुलहठी और सैन्धानमक इनसे घृत सिद्ध करना चाहिये, ऐसा योग माना है ।